जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा छात्र संघ चुनाव कराने की मांग को लेकर जारी भूख हड़ताल और शांतिपूर्ण आंदोलन पर यूनिवर्सिटी प्रशासन और दिल्ली पुलिस द्वारा किए जा रहे दमनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई का नागरिक अधिकार संगठन जन हस्तक्षेप कड़ी निंदा करता है और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मांग करता है कि वह तत्काल पूरे मामले में हस्तक्षेप करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्र संघ चुनाव की बहाली का निर्देश दें। (महामहिम केंद्रीय विश्वविद्यालय के चांसलर होते हैं)
जन हस्तक्षेप की जांच टीम ने विश्वविद्यालय से संबंधित छात्रों, प्रोफेसरों व अन्य फैकेल्टी स्टाफ से मुलाकात कर उनकी समस्याओं को जाना, तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आई कि विश्वविद्यालय प्रशासन परिसर में किसी भी तरह का लोकतांत्रिक माहौल नहीं बनने देना चाहता। पूरा परिसर एक जेलखाने जैसा बना दिया गया है और वहां पढ़ने और पढ़ाने वाले छात्र और अध्यापक एक कैदी की तरह रह रहे हैं, जो सार्वजनिक तौर पर अपनी बात या विचार भी नहीं व्यक्त कर सकते।
जन हस्तक्षेप ने लगभग दो पखवाड़े से जामिया परिसर में चल रहे छात्रों की भूख हड़ताल और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर हो रहे दमन, रेगुलर क्लास बंद कर दीपावली तक ऑनलाइन क्लास चलाने, हॉस्टल कैंटीन, बिजली व पानी की सुविधा बंद करने, छात्रों के विश्वविद्यालय परिसर में आने-जाने पर रोक और पूरे परिसर को सुरक्षा बलों व दिल्ली पुलिस द्वारा बंधक बनाए जाने संबंधी खबरों को संज्ञान में लेते हुए 26 अक्टूबर 2026 को जामिया परिसर में हो रही घटनाओं की जांच के लिए एक टीम भेजने का फैसला किया। जनहस्तक्षेप के सहसंयोजक अनिल दुबे के नेतृत्व में पांच सदस्यीय जांच टीम ने परिसर का दौरा किया, जिसके सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार राजेश वर्मा, प्रणव प्रियदर्शी, जन हस्तक्षेप सीआर पार्क के सदस्य दीपक और सोनाली थीं। कोशिशों के बाद भी जांच टीम को विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने नहीं दिया गया। जांच टीम ने विश्वविद्यालय के बाहर मौजूद छात्रों, भूख हड़ताल के समर्थन में परिसर के अंदर मौजूद छात्रों से फोन अथवा परिसर बाउंड्री के पास से बातचीत की। कुछ प्रोफेसरों से भी जामिया प्रशासन के तानाशाही रवैए पर चर्चा की।
जांच दल ने स्पष्ट रूप से देखा और महसूस किया कि देश में भाजपा-आरएसएस की सरकार जिस तरह से संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थाओं और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों, विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विरोध करने के अधिकार को समाप्त कर रही है। उसी कड़ी में जेएनयू, जादवपुर, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया भी उसके निशाने पर हैं। यह सभी वो उच्च शिक्षण संस्थान हैं, जिनका सर्वोच्च अकादमिक इतिहास रहा है। आरएसएस-भाजपा के निशाने पर मुस्लिम शिक्षण संस्थान ज्यादा हैं, क्योंकि मुसलमानों के खिलाफ उसने पहले से ही एक देशव्यापी अवधारणा बना रखी है। छात्रों के आंदोलन के दौरान आरएसएस के गुंडे परिसर में घुसकर देश विरोधी नारे दीवारों पर लिख रहे हैं। इससे संबंधित कुछ लोगों को छात्रों ने पकड़ कर प्रशासन के हवाले भी किया। इससे साफ जाहिर है कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करना है।

जांच दल ने दिन भर में दर्जनों छात्रों और प्रोफेसरों से बातचीत की, लेकिन कोई भी अपने परिचय के साथ अपने ख्यालों का इज़हार नहीं करना चाहता था। विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने बताया कि बीते वर्षों में विश्वविद्यालय में ऐसे प्रशासनिक अधिकारी और फैकल्टी मेंबर नियुक्त किए गए हैं, जो अवसरवादी और चाटुकार हैं, जो सीधे सरकार के एजेंडे पर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि 1920 में विश्वविद्यालय की शुरुआत छात्र आंदोलन से हुई थी और आजादी की लड़ाई में भी इस परिसर का बड़ा योगदान था। इस परिसर से देश के नामी राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद निकले हैं। आज उस इतिहास को दफन किया जा रहा है। एक पीएचडी स्कॉलर ने यह पूछने पर कि देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव होते हैं, तो यहां कराने में प्रशासन को क्या दिक्कत है ? उन्होंने बहुत ही साफ़गोई से कहा कि 2014 से देश में अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशंस अपने समुदाय के लिए साइंटिफिक टेंपरामेंट और डेमोक्रेटिक बुद्धिजीवी, अध्यापक, साइंटिस्ट और इंजीनियर दे सकता है। यह सरकार नहीं चाहती ! वह नहीं चाहती कि भविष्य में मुसलमानों के बीच ऐसे इंटेलेक्चुअल और लीडरशिप उभरे, जो अपने समाज का नेतृत्व कर सकें। उन्होंने सवाल किया कि सच्चर कमेटी के बाद आखिर क्या कदम उठाए गए ? मुसलमान से संबंधित स्कॉलरशिप बंद हो गई !
जामिया से मास्टर्स करने के बाद अब पीएचडी कर रहे एक छात्र ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील है कि चुनाव में हिंसा होती है ! आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर, इलाहाबाद आदि विश्वविध्यालयों में चुनावी हिंसा होती है, तो वहां क्यों नहीं रोक लगती ? सीधी बात है कि सरकार नहीं चाहती की मुसलमान की अपनी प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक लीडरशिप उभरे ! वह जामिया के डेमोक्रेटिक स्पेस को समाप्त करना चाहते हैं और हमारी बौद्धिकता को छीनना चाहते हैं। आज बहुत सारे मुस्लिम, इंटेलेक्चुअल, छात्र वर्षों से जेल में बंद है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में यूनियन का फंड होता है उसका कोई पता नहीं चलता। सरकार ने जामिया टीचर्स एसोसिएशन को भंग कर दिया, लेकिन अब जामिया के बच्चों में साहस आया है। एनआरसी-सीए आंदोलन ने मुस्लिम समुदाय का लोकतांत्रिकरण किया है और बीते महीनों के “जैन जी” आंदोलन ने रास्ता दिखाया है। इसलिए अब छात्र पीछे नहीं हटने वाले। उन्होंने कहा कि यह केवल यूनियन की लड़ाई नहीं है। यह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है जो जारी रहेगी।
26 अक्टूबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों से संबंधित परिजनों और लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर रहमान किदवई, साईदा हामिद और समीना मिश्रा ने विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बड़े दुख के साथ कहा आज कैसा हिंदुस्तान बनाया जा रहा है, जहां छात्र यूनियन तक नहीं बना सकते। इन वक्ताओं ने कहा कि ऐसा लगता है कि क्या हम वाकई आजाद हिंदुस्तान में रहते हैं, जहां शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने और अपनी बात रखने की भी जगह नहीं बची है। वहां मौजूद कुछ छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर को खुली जेल बना दिया है। प्रशासन ने एक सुरक्षा सलाहकार नियुक्त कर रखा है। यदि किसी छात्र ने लाइब्रेरी, हॉस्टल या किसी सुविधा पर सवाल उठाए या मांग की तो वह सुरक्षा सलाहकार छात्रों के घर वालों को फोन कर उन्हें धमकी देता है। साथ ही उस छात्र का नंबर जामिया थाने को दे दिया जाता है और पुलिस छात्रों को धमकाती है।

जन हस्तक्षेप जांच टीम ने परिसर के आसपास का दौरा करने के बाद देखा कि वहां बड़े पैमाने पर पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स और इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस तैनात कर रखी गई है। जामिया के हर गेट पर बड़े पैमाने पर सुरक्षा बल हैं। वहां का वातावरण ऐसा है, जैसे की अर्ध सैनिक बल विश्वविद्यालय नहीं किसी दुश्मन देश पर धावा बोलने जा रहे हैं। परिसर में छात्र आमरण अनशन पर बैठे हैं और सैकड़ों की तादाद में अन्य छात्र भी उपस्थित हैं। परिसर के बाहर लगे बाउंड्री और ग्रिल के आसपास भी दिन भर छात्रों का हुजूम उमड़ता रहता है। देर शाम पुलिस ने दर्जनों छात्रों को डिटेन कर लिया।
इन परिस्थितियों को देखते हुए जन हस्तक्षेप मांग करता है कि-
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तत्काल हस्तक्षेप करें और छात्रों की छात्र संघ चुनाव कराने की लोकतांत्रिक मांग को अभिलंब स्वीकार करें।
- जामिया प्रशासन को निर्देश दें कि वह तय समय सीमा में छात्र संघ का संविधान लिखे और चुनाव कराए।
- आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई है। उसे वापस लिया जाए और भविष्य में आंदोलन से संबंधित छात्रों पर किसी भी तरह की कानूनी / प्रशासनिक कार्रवाई न की जाए।
- छात्रों की सबसे बड़ी मांग कि परिसर सुरक्षा सलाहकार का पद तत्काल समाप्त किया जाए, क्योंकि विश्वविद्यालय के लिए इस पद की कोई जरूरत नहीं है।
(प्रेस विज्ञप्ति – 27 अक्टूबर 2026)
सहसंयोजक
अनिल दुबे

