अरुणाचल प्रदेश में जेन ज़ी आंदोलन हिंसक हो गया है। वहां भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को निशाना बनाया गया है। अरुणाचल में हायर सेकेंडरी स्कूलों के विद्यार्थी इस आंदोलन में सबसे अधिक सक्रिय हैं। वहां की ‘मदर्स एसोसिएशन’ ने भी इसका समर्थन किया है। विभिन्न ट्राइब्स के अन्य युवा संगठन भी इससे जुड़े हैं।
अरुणाचल के पूर्वी सियांग, सियांग और ऊपरी सियांग जिलों में कुछ आंदोलनकारी संगठनों ने 23 अक्टूबर, 2026 को सुबह पांच बजे से शाम पांच बजे तक 12 घंटे के बंद का आह्वान किया था। बंद के दौरान सियांग और ऊपरी सियांग की सीमा पर स्थित डिते-दिमे तथा पूर्वी सियांग के रानेघाट पुल के पास पुलिस और प्रदर्शनकारियों में टकराव हुआ। सबसे व्यापक हिंसा पूर्वी सियांग जिले के मुख्यालय पासीघाट में हुई, जहां भाजपा नेताओं के आवासों, पुलिस थाने और एनएचपीसी कार्यालय को निशाना बनाया गया।
बंद की एक प्रमुख मांग बांध विरोधी आंदोलन में गिरफ्तार किए गए दस लोगों की रिहाई थी। इनमें चार कार्यकर्ताओं के खिलाफ अरुणाचल प्रदेश गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (APUAPA) के तहत कार्रवाई की गई थी। आंदोलनकारी संगठनों की मांग थी कि गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाए और इलाके से सुरक्षाबलों की तैनाती हटाई जाए।
आंदोलन के दौरान पुलिस ने माँओं को आगे बढ़ने से रोका तो उन्होंने बैरिकेड के सामने अपने ज्यादातर कपड़े उतारकर अर्द्धनग्न प्रदर्शन किया। वे गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों की रिहाई चाहती थीं। पुलिस ने उन पर आँसू गैस के गोले चलाए, जिससे कई महिलाएं घायल हो गईं। यह कोई सामान्य विरोध नहीं था। अपने लोगों की गिरफ्तारी और रास्ता रोके जाने पर माताएं जिस तरह सामने आईं, उससे पता चलता है कि आंदोलन अब केवल विद्यार्थियों या कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें परिवार और समुदाय भी शामिल होने लगे हैं।
बताया जाता है कि इन घटनाओं के बावजूद बंद दिन भर शांतिपूर्ण रहा, लेकिन शाम को खबर आई कि पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई हैं। भाजपा से जुड़े बाहरी लोगों द्वारा आंदोलन के प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले की खबरें भी आईं। उसके बाद आंदोलन हिंसक हो गया। यह हिंसा मामूली झड़प नहीं थी। लोगों का गुस्सा प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ इतना ज्यादा था कि चुन-चुनकर पार्टी के नेताओं को निशाना बनाया गया।
सैकड़ों लोगों की उग्र भीड़ अचानक भाजपा प्रदेश अध्यक्ष कलिंग मोयोंग, विधायक ओनी पांग्यांग और विधायक निनोंग एरिंग के आवासों की तरफ बढ़ी। प्रदर्शनकारियों ने इन नेताओं के घरों को चारों तरफ से घेर लिया। भीड़ ने घरों के फाटकों और चारदीवारियों को धक्के मारकर और पत्थरों से तोड़ डाला।
भीड़ इन नेताओं के घरों के भीतर दाखिल हो गई। लाठियों, डंडों और पत्थरों से लैस आंदोलनकारियों ने घरों की खिड़कियों के कांच, दरवाजे और लॉन में खड़े वाहनों को तोड़ना शुरू कर दिया। देखते ही देखते कमरों के भीतर रखे कीमती फर्नीचर, बिजली के उपकरण और घरेलू सामान को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया। बताया जा रहा है कि भाजपा से जुड़े कई नेताओं की बुरी तरह पिटाई भी की गई है।
प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय पुलिस थाने को भी आग के हवाले कर दिया और पुलिस के कम से कम सात वाहनों को फूंक दिया गया। डीएसपी सहित 40 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) समेत लगभग आधा दर्जन सरकारी कार्यालयों में तोड़फोड़ की गई और कई में आग लगा दी गई।
जल, जंगल, जमीन की लड़ाई
अरुणाचल के इस इलाके में भड़के जनाक्रोश के पीछे अपनी जमीन बचाने की लड़ाई है। साथ ही शिक्षा से जुड़ी परेशानियों और प्रशासन की अनदेखी से भी लोगों में गहरी नाराजगी है। विरोध की सबसे बड़ी वजह सियांग नदी पर प्रस्तावित विशाल बांध परियोजना (SUMP) है। स्थानीय जनजातीय समाज ‘आदि’ को डर है कि इससे उनके पुरखों की जमीनें, उपजाऊ खेत, जंगल और दर्जनों पारंपरिक गांव हमेशा के लिए पानी में समा जाएंगे। यह इलाका भूकंप के लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों (सिस्मिक जोन 5) में आता है। यहां इतना बड़ा कंक्रीट का बांध बनाना भविष्य में किसी बड़ी तबाही को दावत देने जैसा है। हाल ही में परियोजना के तकनीकी सर्वे के लिए पुलिस तैनात की गई तो स्थानीय लोगों का गुस्सा भड़क उठा।
‘आदि’ समाज के लिए सियांग केवल एक नदी नहीं है। उसके साथ इस समुदाय का इतिहास, स्मृतियां, खेती, गांव और सांस्कृतिक जीवन जुड़े हैं। इसलिए इस आंदोलन को केवल विस्थापन और मुआवजे के प्रश्न तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। यह उस प्राकृतिक और सांस्कृतिक दुनिया को बचाने की लड़ाई भी है जिसमें यह समाज सदियों से जीता आया है।
इस बांध विवाद के साथ यहां के छात्र संगठनों और आम लोगों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से गुस्सा है। पासीघाट में सरकारी ‘अरुणाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी’ (APU) की घोषणा काफी पहले हुई थी, लेकिन पर्याप्त धन, भवन और स्टाफ की कमी के कारण यह लंबे समय तक कागजों में ही उलझी रही। इसे पूरी तरह शुरू कराने के लिए छात्र लगातार आंदोलन करते रहे हैं। इलाके की निजी ‘एपेक्स प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी’ पर भी नियमों की अनदेखी और जरूरी सुविधाएं न देने के गंभीर आरोप लगे। इससे युवाओं को लगा कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। पुश्तैनी जमीन और प्राकृतिक दुनिया को बचाने की चिंता के साथ बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर गुस्सा भी जुड़ गया। इन्हीं चिंताओं और गुस्से ने मिलकर इस बड़े आंदोलन का रूप लिया।
अरुणाचल प्रदेश के इस जेन ज़ी विद्रोह का एक और पक्ष है। अक्टूबर के पहले सप्ताह में ही सियांग घाटी की बांध विरोधी खबरें देने वाले स्थानीय डिजिटल समाचार माध्यमों के फेसबुक पेज भारत में प्रतिबंधित किए जाने लगे। मानवाधिकार वकील और बांध विरोधी आंदोलन से जुड़े ईबो मिली का फेसबुक खाता भी भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया। अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के खातों पर भी ऐसी कार्रवाई की गई। इन कार्रवाइयों का विरोध अरुणाचल प्रेस क्लब और अरुणाचल प्रदेश यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने भी किया। सरकार ने आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने और उनकी खबरें देने वाले फेसबुक पेजों को प्रतिबंधित करने के साथ-साथ सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों पर भी पाबंदियां लगाईं। राष्ट्रीय मीडिया में भी आंदोलन की खबरों को खास जगह नहीं मिल रही थी। इससे अरुणाचल के लोगों में और नाराजगी थी।
भाजपा और उसके समर्थक अब इस आंदोलन को विदेशी धन और चीन के खतरे से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि चीन इस आंदोलन को पैसे दे रहा है। भाजपा का तर्क है कि चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से पर दुनिया की सबसे बड़ी, लगभग 60 हजार मेगावाट क्षमता वाली जलविद्युत परियोजना बना रहा है। चीन चाहे तो नदी का पानी रोककर भारत में सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़कर अरुणाचल और असम में तबाही मचा सकता है। भाजपा सरकार का दावा है कि भारत की प्रस्तावित 11,200 मेगावाट वाली सियांग परियोजना इसका जवाब होगी। मुख्यमंत्री पेमा खांडू के अनुसार, चीन की परियोजना की अनुमानित जल-भंडारण क्षमता लगभग 5.5 अरब घनमीटर है, जबकि भारत के प्रस्तावित बांध में लगभग 9.2 अरब घनमीटर पानी का उपयोगी भंडारण हो सकेगा।
चीन की गतिविधियां भारत के लिए चिंता का विषय हैं, यह बात सही है। भारत का जलाशय भी नदी के बहाव को कुछ हद तक नियंत्रित कर सकता है। लेकिन भारत अपने यहां बांध बनाकर चीन को उसके इलाके में पानी रोकने से नहीं रोक सकता। चीन यदि अचानक पानी छोड़ता है तो भारतीय बांध उससे पैदा होने वाली बाढ़ का असर कुछ हद तक कम कर सकता है, लेकिन यह उसकी भंडारण क्षमता, उस समय जलाशय में मौजूद पानी और बाढ़ की तीव्रता पर निर्भर करेगा। हर परिस्थिति में सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। उलटे, इतने संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र में विशाल जलाशय बनाने के अपने खतरे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इन खतरों से आंख नहीं चुराई जा सकती।
इस प्रचार में एक और तथ्य छुपाया जा रहा है। इससे चीन से पैसे मिलने के उनके प्रचार की पोल खुलती है। सियांग नदी पर बड़े बांध की योजना 1982 से चली आ रही है। 2008 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया था। स्थानीय आदिवासी समुदाय भी लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं। इसके उलट चीन की वर्तमान मेदोग परियोजना को दिसंबर 2024 में मंजूरी मिली और जुलाई 2025 में निर्माण शुरू हुआ। यानी भारत की बांध योजना और उसका आदिवासी विरोध, दोनों चीन की इस परियोजना से बहुत पुराने हैं। इसके बावजूद आज कहानी इस तरह सुनाई जा रही है मानो चीन ने बांध बनाना शुरू किया तो उसके जवाब में भारत ने बांध बनाने का निर्णय लिया और अचानक कुछ संदिग्ध लोग उसका विरोध करने लगे।
इतना ही नहीं, मई 2012 में भाजपा सांसद तरुण विजय ने राज्यसभा में बांध विरोधियों को चीन से जोड़ने के आरोप का विरोध किया था और इसे गलत बताया था। तब भाजपा के ही एक सांसद को जिस आरोप पर आपत्ति थी, वही आरोप आज भाजपा समर्थक आंदोलनकारियों पर लगा रहे हैं। विदेशी धन के आरोप की कहानी भी ऐसी ही है। इसका आधार पर्यावरण कार्यकर्ता और वकील भानु तातक के खिलाफ सीबीआइ द्वारा 20 अगस्त, 2026 को दर्ज एफआइआर है। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2022 से 2025 के बीच आवश्यक सरकारी अनुमति के बिना अपने बैंक खाते में लगभग 21 लाख रुपये विदेशी मुद्रा के माध्यम से प्राप्त किए। सीबीआइ का यह भी आरोप है कि विदेशी धन का इस्तेमाल बांध विरोधी गतिविधियों के लिए हुआ।
भानु तातक इन आरोपों से इनकार करती हैं। एफआइआर में जिन विदेशी संस्थाओं के नाम सामने आए हैं, वे फिलीपींस, आयरलैंड और ब्रिटेन की हैं। ये आदिवासी अधिकारों के क्षेत्र में काम करती हैं। इनमें चीन की कोई संस्था नहीं है, लेकिन भाजपा समर्थक चीन के बांध और विदेशी धन की एफआइआर को साथ रखकर यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि आंदोलन के पीछे चीन का हाथ है। भाजपा सरकार के दौर में विदेशी अंशदान संबंधी कानून सामाजिक कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाने का एक हथियार बनता जा रहा है। किसी एक कार्यकर्ता पर लगे आरोप को आधार बनाकर हजारों आदिवासियों के दशकों पुराने आंदोलन को विदेशी शक्तियों के इशारे पर चलने वाला आंदोलन बताना राजनीतिक बदनीयती है।

यहां भाजपा का अपना इतिहास भी देखिए। 22 फरवरी, 2014 को नरेंद्र मोदी ने पासीघाट की चुनावी सभा में बड़े बांधों का विरोध कर रहे अरुणाचल के लोगों की भावनाओं का सम्मान करने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि बिजली बनाने के लिए पर्यावरण को बचाते हुए छोटे बांधों का रास्ता अपनाना चाहिए। तब बड़े बांधों का विरोध करने वाले लोग मोदी के लिए सम्मान के पात्र थे। आज उसी विरोध को उनकी पार्टी की सरकार देश के रणनीतिक हितों के खिलाफ बताने लगी है।
भाजपा, कांग्रेस पर भी आरोप लगा रही है कि उसने ही इस बांध की योजना को आगे बढ़ाया था और अब राजनीतिक लाभ के लिए इसका विरोध कर रही है। योजना के कांग्रेसकालीन इतिहास की बात सही है, लेकिन इस आंदोलन को न तो कांग्रेस चला रही है, न ही कोई विदेशी शक्ति। इसकी अगुआई स्थानीय आदिवासी युवा कर रहे हैं। वास्तव में आदिवासियों का आंदोलन कांग्रेस की सरकार में भी था और भाजपा की सरकार में भी है।
अब भाजपा से ही पूछा जाना चाहिए कि 2014 में जो लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, वे आज देश के लिए खतरा कैसे बन गए? और यदि चीन के खतरे से देश को बचाना आवश्यक है, तो उसकी कीमत सियांग घाटी के आदिवासी ही क्यों चुकाएं? क्या देश की सुरक्षा का अर्थ यह है कि जिन लोगों की जमीन और पूरी सांस्कृतिक दुनिया दांव पर लगी है उन्हें अपने भविष्य के बारे में फैसला करने का भी अधिकार न रहे?
वैश्विक GenZ आंदोलनों की कड़ी
एक और बात सामने आती है। जंतर-मंतर पर कॉक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) और वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा के आंदोलन को पूर्वोत्तर भारत में सबसे अधिक समर्थन अरुणाचल प्रदेश से ही मिल रहा था। अरुणाचल में विद्यार्थियों ने उसके समर्थन में कई सभाएं की थीं। यहां के युवा सोशल मीडिया पर भी लोगों से उसे समर्थन देने की अपील कर रहे थे।
इसका एक ऐतिहासिक पहलू है। अरुणाचल समेत पूर्वोत्तर भारत के सभी आठों राज्यों में विभिन्न ट्राइब्स के छात्र संगठनों की राजनीतिक भूमिका का लंबा इतिहास रहा है। वे केवल शिक्षा संबंधी मांगें नहीं उठाते रहे हैं, बल्कि अपनी जमीन, भाषा, जातीय पहचान और राजनीतिक अधिकारों की लड़ाइयों में भी अग्रणी रहे हैं। अब देखने की बात यह है कि जेन ज़ी की नई राजनीतिक सक्रियता इन पुराने ट्राइबल छात्र संगठनों और उनके संघर्षों को किस तरह बदलती है।
अरुणाचल के आंदोलन को दुनिया के लगभग 40 देशों में चल रहे युवाओं के आंदोलन के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। इसे व्यापक अर्थ में जेन ज़ी आंदोलनों की वैश्विक लहर का हिस्सा माना जा सकता है। इन आंदोलनों में एक बात साझा है। ये अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों और बढ़ती असमानता का विरोध करते हैं। इनमें सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण और पर्यावरण सुरक्षा की मांगें उठ रही हैं। इन मांगों में समाजवादी विचारों की झलक मिलती है।
भारत समेत अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट संगठनों तथा श्रमिक यूनियनों ने इन आंदोलनों का समर्थन किया है। इसलिए इन आंदोलनों को केवल भ्रष्टाचार और निरंकुशता के विरोध तक सीमित करके देखना एक ऐतिहासिक भूल है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिणपंथ की जो वैश्विक हवा चली थी, जेन ज़ी आंदोलन उसकी प्रतिक्रिया में हैं। इस पहलू पर अभी तक लोगों का खास ध्यान नहीं गया है।
युवा पीढ़ी अपने भविष्य से जुड़े निर्णयों में अपनी हिस्सेदारी चाहती है। अरुणाचल में यह प्रश्न केवल युवाओं के भविष्य का नहीं, बल्कि उन आदिवासी समुदायों के सामूहिक अस्तित्व का भी है जिनकी जिंदगी सदियों से सियांग नदी के साथ जुड़ी हुई है।
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