‘मृत्यु अचानक बंद हुआ दरवाजा नहीं…’ : कवि ऋतुराज की स्मृति में कुछ आत्मीय बातें


वरिष्ठ कवि ऋतुराज को याद करते हुए मैं जीवन के उस रस से भर उठता हूँ, जो उनके साथ बिताए समय की आत्मीयता में आज भी धड़कता है। उनसे मेरा संबंध लगभग साढ़े चार दशक पुराना था। यह इतना लंबा समय है कि इसमें जीवन के अनेक पड़ाव, बदलते शहर, यात्राएँ, मुलाकातें और असंख्य बातचीत के प्रसंग समाए हुए हैं। इस दौरान वे मेरे लिए केवल एक महत्त्वपूर्ण कवि नहीं रहे, बल्कि एक आत्मीय मित्र और विचारशील सहयात्री बन गए थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके साथ बिताए समय की स्मृतियाँ मेरे भीतर जीवित हैं। कभी बूंदी की पहली मुलाकात याद आती है, कभी महलों और जंगलों में साथ घूमने के प्रसंग, तो कभी घर में साथ बिताए वे दिन, जिनमें साहित्य और जीवन के प्रश्न सहज ही बातचीत का हिस्सा बन जाते थे। इन स्मृतियों को याद करना सुखद भी है और पीड़ादायक भी। सुख इस बात का कि जीवन में ऐसा आत्मीय साथ मिला; पीड़ा इस बात की कि अब वह साथ केवल स्मृति में उपलब्ध है।

किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति केवल उसके न होने का तथ्य नहीं होती। वह हमारे जीवन की उन संभावनाओं का भी अंत है, जिन्हें हम अक्सर तब तक पहचान नहीं पाते, जब तक वे हमेशा के लिए समाप्त नहीं हो जातीं। अब ऋतुराज जी से किसी नई पुस्तक पर बात नहीं हो सकती, किसी समसामयिक घटना पर उनकी राय नहीं जान सकता और न ही किसी यात्रा के दौरान अचानक उठे प्रश्न को उनके सामने रख सकता हूँ। बातचीत के वे रास्ते, जो वर्षों तक हमारे बीच खुलते रहे, अब आगे नहीं बढ़ सकते। स्मृतियों में उनका संवाद सुरक्षित है, लेकिन स्मृति उस जीवंत प्रत्युत्तर का विकल्प नहीं बन सकती, जिसमें दूसरा व्यक्ति अपनी स्वतंत्र दृष्टि, असहमति और अनुभव के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है। इसीलिए उनकी याद जितनी गहरी होती है, उनके न होने का एहसास भी उतना ही तीखा हो उठता है।

शायद इसी द्वंद्व में किसी आत्मीय संबंध की वास्तविक गहराई छिपी होती है। हम किसी व्यक्ति को केवल इसलिए याद नहीं करते कि वह हमारे अतीत का हिस्सा था, बल्कि इसलिए भी कि उसकी उपस्थिति ने हमारे वर्तमान को अर्थ दिया था। ऋतुराज जी मेरे जीवन के ऐसे ही हिस्से थे। उनके साथ बिताए वर्षों को याद करते हुए मैं केवल एक कवि के जीवन और साहित्य को याद नहीं करता, बल्कि अपने जीवन के उस समय को भी फिर से जीता हूँ, जिसमें उनके साथ संवाद संभव था। अब उन दिनों में लौटना संभव नहीं, लेकिन उन दिनों का मेरे भीतर बने रहना भी एक सच्चाई है। उनकी अनुपस्थिति ने स्मृतियों को समाप्त नहीं किया; उसने स्मृतियों का अर्थ बदल दिया है। अब वे बीते हुए समय के प्रमाण भर नहीं, उस आत्मीय संबंध की बची हुई धड़कनें हैं, जो उनके जाने के बाद भी मेरे भीतर निरंतर बनी हुई हैं।

किसी व्यक्ति के साथ संबंध की गहराई को केवल मुलाकातों की संख्या से नहीं आँका जा सकता। कुछ लोग बहुत कम समय में हमारे जीवन में ऐसी जगह बना लेते हैं, जो वर्षों तक बनी रहती है। कुछ संबंध समय और दूरी की परीक्षाओं से गुजरते हुए अधिक गहरे होते जाते हैं। ऋतुराज जी के साथ मेरा संबंध इसी तरह विकसित हुआ। अलग-अलग शहरों में रहने, स्थानांतरणों, नौकरी की व्यस्तताओं और जीवन की बदलती परिस्थितियों के बावजूद यह संबंध अपनी निरंतरता बनाए रहा। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हमारे बीच साहित्य ने परिचय का रास्ता खोला था, लेकिन उसे स्थायित्व देने का काम आपसी विश्वास, विचारों के आदान-प्रदान और सहज आत्मीयता ने किया।

ऋतुराज से मेरा पहला संपर्क 1981 में हुआ था। उन दिनों मैं महाराष्ट्र के नांदेड़ से प्रकाशित होने वाली अपनी पत्रिका ‘धरती’ के समकालीन जनकविता विशेषांक की एक प्रति उन्हें बूंदी भेजी थी। उस समय उनसे मेरा प्रत्यक्ष परिचय नहीं था। वे मेरे लिए एक वरिष्ठ और महत्त्वपूर्ण कवि थे, जिनकी रचनात्मक उपस्थिति से मैं परिचित था। स्वाभाविक रूप से उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रही होगी, लेकिन उनकी ओर से कोई उत्तर नहीं आया। उस समय यह एक छोटी-सी निराशा रही हो, तो आश्चर्य नहीं। किसी पत्रिका का संपादन करते हुए संपादक की इच्छा होती है कि उसकी मेहनत और वैचारिक सरोकारों पर पाठकों तथा लेखकों की प्रतिक्रिया मिले। विशेषकर जब कोई अंक समकालीन कविता जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर केंद्रित हो, तब उसकी स्वीकृति या अस्वीकृति जानने की उत्सुकता स्वाभाविक होती है।

लेकिन बाद में जब उनसे मुलाकात हुई, तब इस प्रसंग का एक दूसरा ही अर्थ खुला। वे ‘धरती’ के उस अंक को याद रखते थे। इस तरह बिना किसी औपचारिक संवाद के मैं उनकी स्मृति में दर्ज हो चुका था। यह मेरे लिए सुखद अनुभव था। किसी पत्रिका के संपादक के लिए इससे बड़ी संतुष्टि क्या होगी कि उसकी प्रकाशित सामग्री पाठक की स्मृति में बनी रहे, भले ही तत्काल कोई प्रतिक्रिया न मिली हो। इस प्रसंग को याद करते हुए मुझे यह भी लगता है कि साहित्यिक संबंध हमेशा पत्रों, प्रतिक्रियाओं और सार्वजनिक प्रशंसाओं से ही निर्मित नहीं होते। कभी-कभी किसी का ध्यानपूर्वक पढ़ना और उसे याद रखना भी संबंध की शुरुआत बन जाता है।

इसके कुछ वर्ष बाद मेरा स्थानांतरण कोटा हुआ। कोटा आने के बाद एक दिन मैं बूंदी में उनसे मिलने पहुँचा। यह हमारी पहली प्रत्यक्ष मुलाकात थी। किसी प्रतिष्ठित लेखक के बारे में मन में एक छवि बन जाती है। कभी-कभी वास्तविक मुलाकात उस छवि से मेल नहीं खाती, लेकिन ऋतुराज जी से मिलकर ऐसा कोई अंतर महसूस नहीं हुआ। वे अत्यंत सहजता और आत्मीयता से मिले। बातचीत के दौरान उन्होंने ‘धरती’ के विभिन्न अंकों का उल्लेख किया। यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। जिस पत्रिका का एक अंक भेजने पर मुझे कोई उत्तर नहीं मिला था, उसके दूसरे अंकों पर भी उनकी निगाह थी। इससे उनके पढ़ने के स्वभाव और साहित्यिक गतिविधियों के प्रति सजगता का परिचय मिला।

उस पहली मुलाकात के बाद बूंदी जाना मेरे लिए केवल किसी शहर की यात्रा नहीं रह गया। जब भी वहाँ जाना होता, उनसे मिलने की कोशिश अवश्य करता। उनके साथ बैठना, साहित्य पर बातचीत करना और फिर शहर के आसपास घूमने निकल जाना हमारी मुलाकातों का हिस्सा बन गया। हम कभी महलों की ओर जाते, कभी जंगलों में निकल जाते और कभी झीलों के किनारे घूमते। बूंदी की ऐतिहासिक इमारतें, उसकी भौगोलिक बनावट, आसपास का प्राकृतिक परिवेश और उन सबके बीच जीवन की अपनी गति—इन सबको देखने का अनुभव उनके साथ अलग तरह का होता था। इन यात्राओं में कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम नहीं होता था। बातचीत और घूमने का क्रम अपनी सहज गति से चलता रहता था।

ऋतुराज जी के साथ किसी स्थान को देखना केवल उसे देखना नहीं था; उसके इतिहास, भूगोल, समाज और सांस्कृतिक संदर्भों को समझने की संभावना भी उसमें शामिल रहती थी। वे बहुविध ज्ञान के धनी थे। किसी विषय पर बातचीत शुरू होती तो उसके कई पहलू खुलने लगते। उनकी जानकारी पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी। वे अपने अध्ययन को जीवन के अनुभवों से जोड़कर देखते थे। किसी स्थान की ऐतिहासिक महत्ता पर बात करते हुए वे वर्तमान की स्थितियों तक पहुँच सकते थे और किसी सामान्य दृश्य से सामाजिक जीवन की जटिलताओं पर विचार करने लगते थे। उनके साथ बातचीत का एक आकर्षण यह था कि विषय किसी एक दायरे में बंद नहीं रहता था।

उनके साथ बिताए समय में मैंने महसूस किया कि एक अच्छा लेखक केवल अपनी विधा का जानकार नहीं होता। उसकी दृष्टि जीवन के अनेक क्षेत्रों में जाती है। साहित्य, इतिहास, संस्कृति, राजनीति और समाज के प्रश्नों के बीच संबंध खोजने की क्षमता उसके लेखन को व्यापक बनाती है। ऋतुराज जी में यह गुण था। वे पढ़ते बहुत थे, लेकिन पढ़ने का उद्देश्य केवल जानकारी जमा करना नहीं था। वे विषयों को समझने, उनके भीतर उतरने और अपनी स्वतंत्र दृष्टि विकसित करने में रुचि रखते थे। उनकी बातचीत में जिज्ञासा और विचारशीलता दोनों थीं। किसी विषय को लेकर उनकी राय होती थी, लेकिन बातचीत का आनंद इस बात में था कि वह राय अध्ययन, अनुभव और विचार की प्रक्रिया से निर्मित हुई होती थी।

हमारे बीच का संबंध केवल बूंदी में होने वाली मुलाकातों तक सीमित नहीं रहा। जब वे कोटा आते, मेरे घर भी आते थे। इस तरह साहित्यिक परिचय धीरे-धीरे घरेलू आत्मीयता में बदलता गया। उनके साथ कई यात्राएँ करने का अवसर भी मिला। यात्रा में व्यक्ति का एक दूसरा रूप सामने आता है। औपचारिक बैठक में बातचीत प्रायः किसी निर्धारित विषय के आसपास घूमती है, लेकिन यात्रा में अनेक अनपेक्षित प्रसंग सामने आते हैं। रास्ते, दृश्य, स्थानीय जीवन, लोगों का व्यवहार और अचानक उठने वाले प्रश्न बातचीत को नई दिशाओं में ले जाते हैं। ऋतुराज जी के साथ यात्राएँ करते हुए मैंने उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को निकट से जाना। वे अपने आसपास की दुनिया के प्रति सजग रहते थे और किसी भी अनुभव को केवल सतही रूप में स्वीकार करने के बजाय उसके भीतर जाने की कोशिश करते थे।

यात्राओं की स्मृतियाँ समय के साथ अपना अलग भूगोल बना लेती हैं। किसी स्थान की तस्वीर या उसका नाम शायद बहुत कुछ याद न दिला सके, लेकिन वहाँ किसी मित्र के साथ बिताया गया समय अचानक अनेक दृश्य लौटा लाता है। कभी रास्ते में हुई बातचीत याद आती है, कभी किसी स्थान पर ठहरने का प्रसंग और कभी किसी विषय पर हुई बहस। ऋतुराज जी के साथ बिताई यात्राओं की स्मृतियों में भी ऐसा ही बहुत कुछ है। उन यात्राओं का महत्त्व केवल उन स्थानों तक पहुँचने में नहीं था, बल्कि उस साझा समय में था जिसमें हम एक-दूसरे को समझते हुए जीवन और साहित्य के अनेक प्रश्नों पर विचार करते थे। आज उन प्रसंगों को याद करता हूँ तो वे किसी व्यवस्थित यात्रा-वृत्तांत की तरह नहीं, बल्कि स्मृतियों में बिखरे दृश्यों की तरह सामने आते हैं।

1991 में मेरा स्थानांतरण जयपुर हो गया। भौगोलिक दूरी बढ़ गई, लेकिन हमारे संपर्क में कोई व्यवधान नहीं आया। मेरे स्थानांतरण होते रहे और वे अनेक बार मेरे कार्यस्थलों पर भी आए। भद्रावती, नागपुर और चंडीगढ़ के निकट नालागढ़ जैसे स्थानों पर उनसे मिलने और उनका सान्निध्य पाने का अवसर मिला। किसी मित्र का अपने मित्र से मिलने उसके शहर या कार्यस्थल तक पहुँचना अपने आप में एक आत्मीय घटना है। ऋतुराज जी के साथ यह आत्मीयता किसी औपचारिकता पर आधारित नहीं थी। हमारे संबंध में न साहित्यिक पदानुक्रम का दबाव था, न इस बात की अपेक्षा कि हर मुलाकात किसी साहित्यिक आयोजन के लिए ही हो। हम मिलते थे, बातें करते थे और साथ समय बिताते थे। यही संबंध की वास्तविक सहजता थी।

जीवन में स्थान बदलते रहते हैं। नौकरी और दूसरी जिम्मेदारियाँ मनुष्य को एक शहर से दूसरे शहर ले जाती हैं। परिचित परिवेश छूटता है और नए परिवेश में जीवन को फिर से व्यवस्थित करना पड़ता है। ऐसे में पुराने संबंधों को बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता। बहुत-से परिचय धीरे-धीरे पत्राचार तक सीमित हो जाते हैं और फिर समय के साथ उनका संपर्क टूट जाता है। ऋतुराज जी के साथ मेरा संबंध इस सामान्य गति का शिकार नहीं हुआ। हमारे बीच दूरी आती रही, लेकिन वह ऐसी दीवार नहीं बनी जिसे पार करना असंभव हो। जब भी मिलने का अवसर मिला, बातचीत वहीं से आगे बढ़ती प्रतीत हुई जहाँ पिछली मुलाकात पर रुकी थी। पुराने संबंधों की यह विशेषता मुझे हमेशा मूल्यवान लगी है।

2001 से 2004 तक का समय हमारी स्मृतियों में विशेष स्थान रखता है। उन दिनों मैं नागपुर में था और ऋतुराज जी जयपुर में मेरे घर रहे। किसी मित्र का कुछ समय के लिए घर आना और लंबे समय तक घर में रहना, दोनों अलग अनुभव हैं। लंबे साथ में व्यक्ति की दिनचर्या, उसकी रुचियों, उसके काम करने के ढंग और उसके स्वभाव के अनेक पहलुओं को निकट से जानने का अवसर मिलता है। इस अवधि में हमारे पुराने संबंध को और गहराई मिली। साथ रहने के दौरान आत्मीयता किसी विशेष अवसर या आयोजन की मोहताज नहीं रहती। सामान्य दिनों के छोटे-छोटे प्रसंग ही उसे पुष्ट करते हैं।

ऋतुराज जी के लिए साहित्य जीवन से अलग कोई गतिविधि नहीं था। पढ़ना, विचार करना, आसपास की घटनाओं पर ध्यान देना और अपनी समझ को लगातार विकसित करना उनके जीवन का हिस्सा था। उनके व्यक्तित्व में अध्ययन और जीवनानुभव एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते थे। वे किसी विषय को केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं मानते थे कि वह साहित्यिक चर्चा में लोकप्रिय है। उनकी रुचि का आधार विषय की वास्तविक प्रासंगिकता और उसे समझने की संभावना थी। उनके साथ समय बिताने पर यह स्पष्ट होता था कि बौद्धिक सक्रियता किसी उम्र या उपलब्धि पर आकर समाप्त नहीं होती। वह निरंतर जिज्ञासु बने रहने और अपने निष्कर्षों को परखते रहने से विकसित होती है।

2005 में उन्होंने जयपुर में ही मेरे घर के निकट एक मकान खरीद लिया। इससे हमारे बीच की भौगोलिक दूरी और कम हो गई। अब मुलाकातों के लिए किसी विशेष यात्रा या अवसर की आवश्यकता नहीं रह गई थी। फिर भी जीवन की अपनी गतियाँ होती हैं। 2007 में मेरा स्थानांतरण कोटा के निकट बाराँ हो गया। वहाँ पहुँचने के बाद उनसे मिलने का सिलसिला फिर शुरू हुआ। स्थान बदलते रहे, लेकिन हमारे संबंध की निरंतरता बनी रही। यह संबंध किसी एक शहर या एक समयखंड से बँधा हुआ नहीं था। हमारे जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों के बीच वह अपना रास्ता बनाता रहा।

2015 में सेवानिवृत्ति के बाद मैं स्थायी रूप से जयपुर आ गया। इसके बाद ऋतुराज जी का सान्निध्य अपेक्षाकृत अधिक सहजता से मिलता रहा। इतने लंबे परिचय के बाद किसी व्यक्ति के साथ संबंध का मूल्यांकन करते हुए केवल उसकी उपलब्धियों या सार्वजनिक प्रतिष्ठा की चर्चा करना पर्याप्त नहीं होता। मेरे लिए ऋतुराज जी का महत्त्व इस बात में भी था कि वे अपने साहित्यिक व्यक्तित्व के साथ एक सहज मनुष्य बने रहे। उनके साथ बैठने में किसी औपचारिकता का बोझ नहीं होता था। बातचीत में विचारों की गंभीरता थी, लेकिन संबंध में सहजता भी थी। वे अपने अध्ययन और अनुभवों के आधार पर बातें करते थे। किसी विषय पर उनकी रुचि जागती तो उसे विस्तार से समझने की कोशिश करते। उनकी सजगता केवल साहित्यिक दुनिया तक सीमित नहीं थी; वे अपने समय और समाज में घट रही घटनाओं के प्रति भी जागरूक रहते थे।

ऋतुराज जी के व्यक्तित्व को याद करते हुए उनके अध्ययनशील स्वभाव का उल्लेख करना आवश्यक है। वे पढ़ाकू थे, लेकिन केवल इस अर्थ में नहीं कि उनके पास पुस्तकों का बड़ा संसार था। वे लगातार कुछ जानने, समझने और अपने विचारों को परखने की प्रक्रिया में रहते थे। विचारशीलता का अर्थ उनके लिए किसी विषय पर राय बना लेना भर नहीं था। उसके लिए तथ्य, संदर्भ और व्यापक सामाजिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। उनके साथ हुई बातचीत से मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ कि साहित्यकार का बौद्धिक विकास एक सतत प्रक्रिया है। कोई भी लेखक अपने अर्जित ज्ञान पर रुक नहीं सकता। उसे अपने समय के नए प्रश्नों, बदलती परिस्थितियों और अनुभवों के प्रति खुला रहना पड़ता है। ऋतुराज जी में यह खुलापन था।

उनकी अध्ययनशीलता का उल्लेख करते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ज्ञान की सार्थकता केवल उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि में होती है। बहुत पढ़ लेने से कोई व्यक्ति अनिवार्य रूप से विचारशील नहीं हो जाता। अध्ययन तभी अर्थवान होता है जब वह प्रश्न करने, स्थापित धारणाओं की जाँच करने और अनुभवों को नए संदर्भ में समझने की क्षमता पैदा करे। ऋतुराज जी के साथ संवाद में मुझे इस प्रवृत्ति का अनुभव होता था। वे विषयों को सरल निष्कर्षों में समेट देने के बजाय उनकी जटिलता को समझने में रुचि रखते थे। साहित्य के लिए यह प्रवृत्ति विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जीवन स्वयं किसी एक सूत्र या व्याख्या में पूरी तरह समाहित नहीं होता।

ऋतुराज की रचनात्मकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे जीवन के सामान्य और स्वीकृत प्रतीत होने वाले प्रसंगों के भीतर छिपे सामाजिक अंतर्विरोधों को पहचानते हैं। उनके यहाँ कविता केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक अनुभव की आलोचनात्मक पड़ताल भी है। वे मनुष्य के जीवन को उसकी जटिलताओं सहित समझने का प्रयास करते हैं। उनकी कविताओं में विचार और संवेदना का संबंध इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। संवेदना उन्हें मनुष्य के अनुभवों के निकट ले जाती है और विचार उन अनुभवों के सामाजिक अर्थों को समझने का अवसर देता है। इस तरह कविता निजी अनुभूति की सीमा से बाहर निकलकर व्यापक मानवीय और सामाजिक संदर्भ ग्रहण करती है।

उनकी कविता पर विचार करते हुए मुझे लगता है कि किसी कवि की रचनात्मक पहचान केवल उसके विषयों से निर्धारित नहीं होती। यह भी देखना होता है कि वह विषय को किस दृष्टि से ग्रहण करता है, अनुभव को भाषा में किस तरह रूपांतरित करता है और पाठक के सामने कौन-से प्रश्न छोड़ता है। कविता की शक्ति कई बार उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, बल्कि उस अर्थ-क्षेत्र में होती है जिसे वह पाठक के लिए खोलती है। ऋतुराज की रचनात्मकता को समझने के लिए भी उनकी सामाजिक दृष्टि के साथ भाषा, शिल्प और काव्य-संवेदना के अंतर्संबंधों पर विचार करना आवश्यक है। उनके साहित्य का महत्त्व इस बात में है कि वह जीवन को किसी एक सूत्र में बाँधकर देखने के बजाय उसके अंतर्विरोधों के साथ समझने की कोशिश करता है।

ऋतुराज की दीर्घ साहित्यिक यात्रा और उनके कविता-संग्रह हिंदी कविता के विकासक्रम में उन्हें एक महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। लेकिन किसी कवि के साहित्यिक योगदान का आकलन केवल उसकी पुस्तकों की संख्या या प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि उसकी कविता अपने समय के अनुभवों से किस प्रकार संवाद करती है और मनुष्य तथा समाज को समझने में क्या नया जोड़ती है। ऋतुराज की कविता पर गंभीर चर्चा में उनके सामाजिक सरोकारों, स्वतंत्र विचार-दृष्टि और काव्य-भाषा की विशिष्टता को साथ रखकर देखना चाहिए। उनकी रचनाओं को पढ़ना अपने समय के अंतर्विरोधों और मनुष्य की स्थिति पर विचार करने का अवसर भी है।

एक लेखक और संपादक के रूप में मेरे लिए साहित्यिक संबंधों का अर्थ केवल रचनाओं की प्रशंसा या किसी विचारधारा के प्रति सहमति नहीं रहा है। साहित्य का वास्तविक संसार संवाद, असहमति, जिज्ञासा और विचारों की स्वतंत्रता से बनता है। किसी लेखक से आत्मीय संबंध होने का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रत्येक विचार से सहमत हुआ जाए या उसके साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन छोड़ दिया जाए। इसके विपरीत, वास्तविक आत्मीयता दूसरे व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता और विशिष्टता के साथ स्वीकार करने में है। ऋतुराज जी के साथ मेरा संबंध भी इसी व्यापक साहित्यिक अनुभव का हिस्सा था। उनके व्यक्तित्व और रचनात्मकता के प्रति सम्मान का आधार केवल उनका वरिष्ठ कवि होना नहीं, बल्कि उनके अध्ययन, सजगता और स्वतंत्र चिंतन के प्रति मेरा विश्वास था।

लगभग साढ़े चार दशकों के इस संबंध में अनेक ऐसी छोटी-बड़ी स्मृतियाँ हैं, जिन्हें किसी एक लेख में समेटना संभव नहीं। बूंदी की पहली मुलाकात, महलों और जंगलों में घूमना, झील के किनारे की यात्राएँ, कोटा में उनके साथ बिताया समय, जयपुर में उनका मेरे घर रहना और अलग-अलग स्थानों पर उनसे मिलना- ये सब मेरे जीवन के निजी अनुभव हैं। इनमें साहित्यिक उपलब्धियों की चर्चा से अधिक उस मनुष्य की उपस्थिति है, जिसके साथ समय बिताना अपने आप में एक अनुभव था। समय बीत जाने के बाद ऐसी ही स्मृतियाँ किसी संबंध की वास्तविक पहचान बनती हैं। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति की उपलब्धियाँ दर्ज होती हैं, लेकिन निजी जीवन में उसकी उपस्थिति उन छोटे-छोटे प्रसंगों में बची रहती है, जिनका कोई औपचारिक अभिलेख नहीं होता।

आज ऋतुराज जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए उनकी अनुपस्थिति का अर्थ और गहरा हो जाता है। किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसकी कमी केवल इसलिए महसूस नहीं होती कि अब उससे मुलाकात नहीं होगी। कमी इस बात की भी होती है कि बातचीत के वे अवसर समाप्त हो गए, जिनमें नए प्रश्न उठते थे, विचारों का आदान-प्रदान होता था और जीवन को देखने की दृष्टि कुछ और व्यापक बनती थी। अब कोई नया प्रसंग उनके सामने रखकर उनकी राय जानने की संभावना नहीं है। कोई यात्रा, कोई पुस्तक या समय की कोई नई घटना बातचीत का बहाना नहीं बनेगी। यह एहसास संबंध के उस पक्ष को सामने लाता है, जो सार्वजनिक स्मरण और साहित्यिक मूल्यांकन से अलग है।

मृत्यु किसी व्यक्ति की भौतिक उपस्थिति समाप्त कर देती है, लेकिन उसके साथ जिए गए समय को समाप्त नहीं कर सकती। स्मृतियाँ केवल अतीत की सुरक्षित तस्वीरें नहीं होतीं; वे वर्तमान में भी हमारे अनुभव का हिस्सा बनी रहती हैं। किसी पुराने स्थान पर पहुँचने, किसी पुस्तक को देखने या किसी परिचित प्रसंग का उल्लेख होने पर वे फिर जीवित हो उठती हैं। ऋतुराज जी की स्मृति भी मेरे लिए ऐसी ही है। बूंदी के वे रास्ते, जिन पर हम साथ चले थे, अब भी स्मृति में हैं। उन मुलाकातों की बातचीत और यात्राओं के दृश्य समय के साथ धुँधले होने के बजाय कई बार और अर्थवान हो जाते हैं। उनमें एक मित्र की उपस्थिति के साथ अपने जीवन के बीते हुए वर्षों की पहचान भी जुड़ी हुई है।

मैं उन्हें एक वरिष्ठ कवि के रूप में याद करता हूँ, लेकिन उतना ही एक ऐसे मित्र के रूप में भी, जिनसे मेरा संबंध समय, स्थान और परिस्थितियों की सीमाओं से गुजरते हुए निरंतर बना रहा। साहित्यिक संबंधों में कभी-कभी प्रशंसा और प्रतिष्ठा अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं, जबकि वास्तविक आत्मीयता पीछे छूट जाती है। ऋतुराज जी के साथ मेरा संबंध इस अर्थ में अलग था। उसमें साहित्य के प्रति साझा रुचि थी, विचारों का आदान-प्रदान था, यात्राओं का आनंद था और वर्षों से निर्मित विश्वास था। इन सबके बीच किसी औपचारिक परिभाषा की आवश्यकता नहीं थी। संबंध अपने व्यवहार और निरंतरता से अपना अर्थ स्वयं निर्मित करता रहा।

उनकी स्मृति मेरे लिए किसी औपचारिक श्रद्धांजलि का विषय भर नहीं है। वह मेरे जीवन के एक लंबे अध्याय की स्मृति है, जिसमें एक कवि, एक अध्ययनशील बुद्धिजीवी और एक आत्मीय मित्र लगातार उपस्थित रहा। उनके जाने से वह अध्याय समाप्त नहीं होता; वह स्मृतियों में खुला रहता है। उनकी कविताएँ पाठकों के बीच रहेंगी और उनका साहित्य नए पाठकों के सामने नए अर्थों में खुलता रहेगा। लेकिन मेरे लिए उनकी याद उन रास्तों, मुलाकातों, बातचीत और साझा समय में भी बसी रहेगी, जिन्हें हमने वर्षों तक जिया। साहित्य में किसी रचनाकार की उपस्थिति उसकी रचनाओं से बनी रहती है, जबकि निजी संबंधों में वह उन अनुभवों के माध्यम से जीवित रहता है, जिन्हें दो मनुष्यों ने साथ मिलकर जिया हो।

ऋतुराज जी को याद करते हुए मैं उनके साहित्यिक योगदान के साथ उस आत्मीय मनुष्य को भी याद करता हूँ, जिसने मेरे जीवन में इतने लंबे समय तक अपनी उपस्थिति बनाए रखी। किसी व्यक्ति को उसकी समूची मानवीयता के साथ याद करना मेरे लिए उसके प्रति सम्मान का अधिक सच्चा रूप है। मैं उन्हें किसी दूरस्थ साहित्यिक प्रतिमा में बदलने के बजाय उस सहज, विचारशील और जागरूक व्यक्ति के रूप में याद करना चाहता हूँ, जिसके साथ जीवन के इतने वर्ष साझा करने का अवसर मुझे मिला। उनकी स्मृति मेरे लिए केवल बीते हुए समय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि उस आत्मीय संबंध की निरंतरता है, जो अब मुलाकातों में नहीं, स्मृतियों और साहित्य में अपना स्थान बनाए रखेगा।

ऋतुराज जी को सादर नमन, अस्वस्थ्यता के दौरान अंतिम समय में उनसे हुए संवाद से प्रसूत एक कविता (रोशनी) के साथ:

एक दिन
देह से पहले
कमरे खाली होने लगते हैं।

कुर्सी वहीं रहती है
चश्मा भी
तकिये पर
सिर की थोड़ी-सी गर्मी।

बाहर
पेड़ अपनी जगह खड़ा रहता है
बस
उसकी छाया में
एक आदमी कम होता है।

तब समझ आता है
मृत्यु
अचानक बंद हुआ दरवाज़ा नहीं
भीतर से
धीरे-धीरे उतरती
एक रोशनी है।



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