पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व


भारतीय लोकतंत्र का सबसे असहज दृश्य थाने के भीतर दिखाई देता है। एक तरफ वर्दी में खड़ी राज्य की शक्ति और दूसरी तरफ अपने अधिकार के लिए खड़ा नागरिक। कागज पर पुलिस नागरिक की सुरक्षा के लिए है लेकिन व्यवहार में नागरिक अक्सर पुलिस से ही अपनी सुरक्षा चाहता दिखाई देता है। यही भारतीय पुलिस और नागरिक के बीच का केंद्रीय द्वंद्व है।

जिस संस्था को नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करनी थी, वही संस्था नागरिक की स्वतंत्रता पर नियंत्रण की सबसे प्रत्यक्ष शक्ति बन जाती है। यहीं से समस्या शुरू होती है।

पुलिस नागरिक को अक्सर एक अधिकार-संपन्न व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि संभावित समस्या की तरह देखती है। नागरिक सवाल पूछे तो पुलिस को चुनौती महसूस होती है। नागरिक विरोध करे तो अव्यवस्था दिखाई देती है। नागरिक शिकायत करे तो प्रक्रिया का बोझ दिखाई देता है। नागरिक अपने अधिकार की बात करे तो कई बार उसे सहयोगी नहीं, असुविधाजनक व्यक्ति समझा जाता है।

दूसरी तरफ नागरिक पुलिस को कानून के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में नहीं बल्कि ऐसी शक्ति के रूप में देखने लगता है जिससे बचना है, जिसे प्रभावित करना है या जिससे अपने ऊपर कार्रवाई न होने की गुहार लगानी है। जहां नागरिक को पुलिस पर भरोसा होना चाहिए, वहां वह पुलिस से डरता है और जहां पुलिस को नागरिक का भरोसा चाहिए वहां वह नागरिक पर संदेह करती है। यह केवल आपसी अविश्वास नहीं है। यह लोकतांत्रिक संबंध का संकट है।


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पुलिस के पास राज्य की वैध हिंसात्मक शक्ति है। वह रोक सकती है, पकड़ सकती है, हिरासत में ले सकती है, तलाशी ले सकती है, बल प्रयोग कर सकती है और आपराधिक प्रक्रिया शुरू कर सकती है। नागरिक के पास इसके सामने मुख्यतः अपने अधिकार, संविधान और कानून का सहारा है। इसलिए पुलिस और नागरिक बराबर शक्ति वाले पक्ष नहीं हैं।

यही कारण है कि पुलिस की हर कार्रवाई पर नागरिक स्वतंत्रता की कसौटी लागू होनी चाहिए। पुलिस की एक गलती और किसी सामान्य नागरिक की एक गलती का प्रभाव समान नहीं होता। नागरिक की गलती का असर सीमित हो सकता है; राज्य की शक्ति की गलती किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और जीवन तक छीन सकती है।

इसलिए लोकतंत्र में पुलिस से केवल अपराध रोकने की अपेक्षा नहीं होती; उससे अपनी शक्ति पर संयम रखने की अपेक्षा होती है। हमारी पुलिस संस्कृति में अक्सर इसका उलटा दिखाई देता है। शक्ति का इस्तेमाल जितना स्वाभाविक है, शक्ति पर सवाल उतना ही असहज। यहीं औपनिवेशिक मानसिकता प्रवेश करती है।

औपनिवेशिक शासन में पुलिस का मूल संबंध जनता से नहीं, शासन से था। उसका काम जनता को अनुशासित रखना था। स्वतंत्र भारत में शासन बदल गया, संविधान बदल गया, नागरिक की स्थिति बदल गई, लेकिन पुलिस के भीतर ‘आदेश बनाम नागरिक’ का पुराना मनोविज्ञान पूरी तरह नहीं बदला। इस मानसिकता में अच्छा नागरिक वह है जो आदेश माने जबकि लोकतंत्र में अच्छा नागरिक वह है जो कानून माने और जरूरत पड़ने पर सत्ता से सवाल भी पूछे। यही दोनों व्यवस्थाओं के बीच मूल अंतर है।

एक लोकतांत्रिक पुलिस को असहमति से घबराना नहीं चाहिए। उसे विरोध को अपराध नहीं समझना चाहिए। उसे नागरिक के सवाल को अवज्ञा नहीं मानना चाहिए, लेकिन जब पुलिस कानून-व्यवस्था को नागरिक स्वतंत्रता के ऊपर रख देती है तब व्यवस्था स्वयं लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ केवल सड़क पर शांति होना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि नागरिक को बोलने, पूछने, विरोध करने और सत्ता से जवाब मांगने की स्वतंत्रता हो।


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पुलिस का काम उस स्वतंत्रता को कुचलकर शांति स्थापित करना नहीं, बल्कि कानून की सीमा के भीतर उसकी रक्षा करना है। यही वह जगह है जहां पुलिस और नागरिक का द्वंद्व सबसे तीखा हो जाता है।

नागरिक कहता है- “यह मेरा अधिकार है।”

पुलिस कहती है- “यह मेरा आदेश है।”

नागरिक कहता है- “कानून बताइए।”

पुलिस कहती है- “ऊपर से निर्देश है।”

नागरिक कहता है- “मैं विरोध करूंगा।”

पुलिस कहती है- “व्यवस्था खराब मत करो।”

और धीरे-धीरे संविधान पीछे हटने लगता है और आदेश आगे आ जाता है। यही लोकतंत्र की सबसे खतरनाक फिसलन है क्योंकि जिस क्षण पुलिस कानून से अधिक आदेश को महत्व देने लगती है, उसी क्षण नागरिक और राज्य के बीच संवैधानिक संबंध कमजोर पड़ जाता है।

राजनीतिक सत्ता के ऊपर पुलिस की निर्भरता इस समस्या को और गहरा करती है। यदि पुलिस अधिकारी को अपने पद, स्थानांतरण और भविष्य के लिए राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता महसूस होती है, तो नागरिक के अधिकारों की तुलना में सत्ता की इच्छा अधिक प्रभावशाली हो सकती है। तब पुलिस का प्रश्न यह नहीं रह जाता कि “कानून क्या कहता है?” प्रश्न बन जाता है- “ऊपर से क्या कहा गया है?” और यही वह परिवर्तन है जो पुलिस को लोकतांत्रिक संस्था से सत्तानिष्ठ संस्था में बदल देता है।

नागरिक के लिए इसका अर्थ बहुत सीधा है- कानून की किताब में अधिकार आपका है, लेकिन उसे व्यवहार में पाने के लिए आपको प्रभाव, पहुंच या संघर्ष की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि गरीब, कमजोर और राजनीतिक रूप से असंबद्ध नागरिक पुलिस व्यवस्था के सामने सबसे अधिक असुरक्षित होता है।

जिसके पास फोन करने के लिए कोई बड़ा आदमी नहीं, जिसकी शिकायत को आगे बढ़ाने वाला कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं, जिसके पीछे कोई राजनीतिक नेटवर्क नहीं, उसके लिए पुलिस और राज्य की पूरी शक्ति एकतरफा दिखाई देती है। यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है।

क्या पुलिस कमजोर नागरिक के सामने भी उतनी ही संवेदनशील है जितनी शक्तिशाली व्यक्ति के सामने सतर्क? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो समस्या किसी एक पुलिसकर्मी की नहीं, पूरी पुलिस संस्कृति की है।


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इस द्वंद्व का समाधान नागरिक को पुलिस का दुश्मन बनाना नहीं है। पुलिस भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और पुलिसकर्मी भी उसी समाज का नागरिक है, लेकिन संस्थागत शक्ति का असंतुलन वास्तविक है और उसे नज़रअंदाज करके बराबरी की बात करना छल होगा।

नागरिक के पास सवाल करने का अधिकार है। पुलिस के पास जवाब देने की जिम्मेदारी है। नागरिक को कानून जानने का अधिकार है। पुलिस को कानून के अनुसार काम करने की बाध्यता है। नागरिक पुलिस से सुरक्षा मांग सकता है। पुलिस नागरिक से अंधी आज्ञाकारिता नहीं मांग सकती। यही लोकतांत्रिक संबंध की बुनियाद है।

जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।

न पुलिस की मनमानी, न राजनीतिक सत्ता का आदेश और न नागरिक की भीड़तंत्र वाली शक्ति। लोकतंत्र में सर्वोच्चता संविधान और कानून की होनी चाहिए। यह तभी संभव है जब पुलिस नागरिक को शासित किए जाने वाला व्यक्ति नहीं, अधिकारों वाला नागरिक माने और नागरिक भी पुलिस को शत्रु नहीं, संविधान के अधीन काम करने वाली सार्वजनिक संस्था माने।

आज इस रिश्ते में दोनों तरफ अविश्वास है, लेकिन शक्ति का पलड़ा बराबर नहीं है। पुलिस के पास वर्दी, हथियार, हिरासत और राज्य का अधिकार है। नागरिक के पास अपने अधिकारों की आवाज है। इसलिए सुधार की पहली जिम्मेदारी पुलिस की है। जिसके हाथ में अधिक शक्ति है, उससे अधिक संयम की अपेक्षा भी होनी चाहिए। भारतीय पुलिस को अंततः यह तय करना होगा कि वह किसकी संस्था है, सरकार की या संविधान की? नागरिक को भी यह तय करना होगा कि वह पुलिस से दया नहीं मांगेगा बल्कि अपने अधिकार की भाषा में बात करेगा क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक पुलिस की प्रजा नहीं है और पुलिस नागरिक की मालिक नहीं है। वह नागरिक द्वारा बनाए गए गणराज्य की कानून-प्रवर्तक संस्था है। यही फर्क औपनिवेशिक पुलिस और लोकतांत्रिक पुलिस के बीच की अंतिम रेखा है। भारत की पुलिस को अभी यह रेखा पूरी तरह पार करना बाकी है।



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