सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं…

शमशेर में जहां नित-नूतनता है वहीं निरन्तर बढ़ाव या उठान भी। नित-नित परिष्कृत होती उनकी शैली अपने वैशिष्ट्य के चलते एक जीवित मिथक गढ़ती है। शमशेर स्थूल के आग्रही किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अपवादवश भले रहे हों, मूलतः सूक्ष्म संवेगों की छटी हुई अनुभूतियों का खाका उनकी कविताओं में विद्यमान है।

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पत्रकारिता @2021: निरंकुश सत्ताओं के बर्बर उत्पीड़न के बीच अदम्य साहस की गाथाएं

सीपीजे ने 1 दिसंबर 2021 तक ऐसी 19 हत्‍याओं को दर्ज किया है जिसमें पत्रकारों को उनके काम के बदले में मारा गया। इसमें शीर्ष स्‍थान भारत का रहा जहां चार पत्रकार अपने काम के चलते मारे गए। एक और की मौत एक प्रदर्शन कवर करने के दौरान हुई। कुल छह हत्‍याएं भारत में दर्ज की गयीं जिसके बाद पत्रकारिता के लिए चार सबसे खराब देशों में भारत का नाम भी शामिल हो गया।

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अंबेडकर और कम्युनिस्ट विचारधारा के रिश्तों को समझने की एक दस्तावेजी खिड़की

डॉ. अम्बेडकर की एक अधूरी पांडुलिपि का हालिया प्रकाशन हमें अम्बेडकर के साम्यवाद के साथ संबंधों की अधिक सूक्ष्म समझ प्राप्त करने में मदद करता है। इस पुस्तक का संपादन अंबेडकर के परिवार से जुड़े एक प्रसिद्ध दलित विद्वान आनंद तेलतुम्बडे ने किया है।

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मंगलेश डबराल का घोंसला और लोक संस्कृति की मृत चिड़िया

मंगलेश जी के पास पहाड़ी राग से लेकर मारवा और भीमपलासी सब कुछ था। उनके पास बिस्मिल्‍लाह खान की शहनाई थी। उनके पास पहाड़ी लोकगीत थे। वे ‘नुकीली चीजों’ की सांस्‍कृतिक काट जानते थे लेकिन उनका सारा संस्‍कृतिबोध धरा का धरा रह गया क्‍योंकि उन्‍होंने न तो अपने पिता की दी हुई पुरानी टॉर्च जलायी, न ही दूसरों ने उनसे आग मांगी। वे बस देखते रहे और रीत गए। उन्‍होंने वही किया जो दूसरों ने उनसे करवाया। कविताओं में वे शिकायत करते रहे और बाहर मुस्‍कुराते रहे, सड़कों पर तानाशाह के खिलाफ कविताएं पढ़ते रहे।

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खड़ी बोली काव्य के स्तम्भ पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय

बीसवीं सदी के प्रथम दशक में खड़ी बोली और ब्रज का संघर्ष जोरों पर था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नये विषयों, नई शैली और भाषा योजना द्वारा नवयुग का शंखनाद किया। वे गद्य में तो खड़ी बोली के पक्षपाती थे, परन्तु पद्य रचना में ब्रज माधुरी का मोह छोड़ नहीं सके। एक जगह उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, चाहने पर भी उनसे खड़ी बोली में सरस कविता नहीं बनती लेकिन भारतेन्दु युग में श्रीधर पाठक ने अंग्रेजी की अनूदित रचनाओं द्वारा काव्य रचना के लिए खड़ी बोली का द्वार खोल दिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, पं. रामचरित उपाध्याय तथा लोचनप्रसाद पाण्डेय ने उन्हीं का अनुगमन किया।

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लेखक संगठन और आत्मालोचन का सवाल: हिरन पर घास कौन लादेगा?

प्रो. अब्दुल अलीम, जिनका संबंध प्रगतिशील लेखक संघ के पुरोधाओं से है, उन्होंने लेखकों की एक बड़ी मीटिंग में कहा था कि लेखक संगठन बनाना उतना ही कठिन है जितना कि हिरन पर घास लादना, लेकिन हिरन पर घास लादने का कार्य प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तराधिकारियों का काम है। इसे कोई दूसरा नहीं कर सकता है।

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एक देश बारह दुनिया: एक पत्रकार के भीतर बैठे साहित्यकार का शोकगीत

यह किताब यात्रा की तो है, लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!

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न्गुगी वा थ्योंगो : जिनके पात्र से डर कर सरकार ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया था…

न्गुगी वा थ्योंगो का कालजयी उपन्यास ‘मातीगारी’ अब मराठी भाषा में भी उपलब्ध हो गया है। अनुवाद नितीन सालुंखे ने और प्रकाशन मोहिनी कारंडे ने (मैत्री पब्लिकेशन, 267/3, आनंद नगर, मालवाडी रोड, हडपसर, पुणे 411 028) किया है। 2019 में हिन्दी पाठकों तक इसे गार्गी प्रकाशन ने पहुंचाया। हिन्दी अनुवाद राकेश वत्स का है।

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सुकेत के विद्रोह: हिमाचल में सामंतवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्षों का एक आख्यान

यह पुस्तक उन लोगों को सामने लाती है जो जो अब तक के इतिहासकारों से अनछुए रह गए। यह हिमाचल में सामंतवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों की गौरवशाली परंपरा को सामने लाती है। यह हिमाचली मानुष के दिल में गर्व और अपनेपन की भावना को भरने की कोशिश करती है, जो महान सुकेत विद्रोह और पुस्तक में वर्णित ऐसे अन्य सामंतवाद विरोधी संघर्षों पर गर्व कर सकते हैं।

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कवि होने की सादगी-भरी और संजीदा कोशिश

‘वसंत के हरकारे’ में सभी विधाओं पर आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियां और पुस्तक समीक्षा का समायोजन कर एक साथ प्रस्तुत करने का महती दायित्व सुरेंद्र कुशवाह ने गंभीरता से निर्वाह किया है।

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