कवि होने की सादगी-भरी और संजीदा कोशिश
‘वसंत के हरकारे’ में सभी विधाओं पर आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियां और पुस्तक समीक्षा का समायोजन कर एक साथ प्रस्तुत करने का महती दायित्व सुरेंद्र कुशवाह ने गंभीरता से निर्वाह किया है।
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‘वसंत के हरकारे’ में सभी विधाओं पर आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियां और पुस्तक समीक्षा का समायोजन कर एक साथ प्रस्तुत करने का महती दायित्व सुरेंद्र कुशवाह ने गंभीरता से निर्वाह किया है।
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हिंदुस्तान टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस, द एशियन ऐज, द हिंदू, द इकनॉमिक टाइम्स, द पायनियर जैसे किसी भी बड़े अंग्रेजी अखबार की संपादक मंडली को किसान नजर नहीं आए।
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बिजन भट्टाचार्य का नाटक ‘नबान्न’ देखने के लिए जब अब्बास साहब 1943 गए तो वहां उन्होंने अकाल की वजह से पलायन करके कलकत्ता आए भीख माँगते किसानों और भूख की वजह से कचरे के ढेर से खाना तलाशते बच्चों, सड़कों पर गरीबों की लाशों तथा उसके बरक्स शानदार होटलों में चलते अमीरों के उत्सवों और जश्नों को देखा जिससे विचलित होकर और इसी विषय पर बने नाटक ‘नबान्न’, ‘अंतिम अभिलाषा’ और कृष्ण चन्दर की कहानी ‘अन्नदाता’ से प्रेरित होकर ‘धरती के लाल’ फिल्म बनाने की योजना बनायी।
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भारतीय इतिहास लेखन परंपरा में जिस तरह सबाल्टर्न गायब हैं या फुटनोट में दर्ज हैं वैसे ही इस फिल्म में दिल्ली व उससे बाहर के अंबेडकराइट या सोशलिस्ट आदि विभिन्न धारा के लोगों का योगदान एवं आंदोलन यहां गायब है।
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भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) द्वारा ख्वाज़ा अहमद अब्बास के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित ऑनलाइन कार्यक्रम की तीसरी कड़ी में अब्बास साहब द्वारा लिखी फिल्म “हिना” पर विस्तार से बात हुई जिसका प्रीमियर फेसबुक और यूट्यूब पर 27 जुलाई 2021 को किया गया।
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भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) द्वारा महान लेखक, पत्रकार, फिल्मकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की रचनात्मकता पर केंद्रित एक कार्यक्रम श्रृंखला 15 जुलाई 2021 को यूट्यूब और फेसबुक पर शुरू की थी। यह दूसरे कार्यक्रम का प्रीमियर था जिसमें फिल्म ‘’दो बूंद पानी’’ पर चर्चा करते हुए सूफ़ीवाद की विद्वान, योजना आयोग की पूर्व सदस्य और ख्वाजा अहमद अब्बास की भतीजी डॉ. सईदा हमीद ने अपने अब्बास चाचा के बारे में कई बातें बतायीं।
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हथियार आये कैसे? हरित क्रान्ति में क्रान्ति कहां थी? सीमा पर बसे लोगों को हम किस देश का नागरिक मानते हैं? इन समस्याओं को बने रहने देने में केंद्र या राज्य सरकारों का कितना योगदान है? ऐसे अनगिन प्रश्न इस किताब में हैं जो हमें पंजाब के साथ-साथ स्थानीय जगहों से जुड़े मसलों पर विचारने के लिए प्रेरित करते हैं।
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लेखिका सारा जोसेफ ने वापस जाकर बुधिनी के बारे में अधिक से अधिक पढ़ा। उनसे सम्बंधित सूचनाओं का संधान किया। उन्होंने उस जगह की यात्रा का निर्णय किया जहां उनकी नायिका बुधिनी रहती थी। उन्हें यह बताया गया था कि उसकी मृत्यु वर्षों पूर्व हो गयी, हालाँकि उनकी इस यात्रा में अप्रत्याशित और नाटकीय मोड़ तब आया जब वह सद्यः जीवित बुधिनी से स्वयं मिलीं।
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आज कथाकार अमरकांत की जयन्ती है। उनके लेखन का दायरा निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग की समस्याओं के आसपास केन्द्रित रहा है। इस समाज की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को अमरकांत ने व्यापक विस्तार के साथ चित्रित किया है।
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फ़िल्म की कहानी और इसके बीच स्थानीय राजनीति, अफ़सरशाही, प्रशासनिक नाकामी, पर्यावरण का दोहन और अवैध शिकार जैसे खलनायक शेरनी को बचाने का प्रयास करती फ़िल्म की ‘शेरनी’ विद्या बालन को बार-बार रोकते हैं और अंत में इसमें सफल भी हो जाते हैं।
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