स्कूली शिक्षा की प्रगति को आईना दिखाती है नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट


देश की आजादी से लेकर अब तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार और प्रगति के लिए विभिन्न शिक्षा नीतियों व आयोगों का गठन किया गया। उन नीतियों एवं योजनाओं के क्रियान्वयन से शिक्षा व्यवस्था में सुधार, बदलाव और व्यापक विस्तार हुआ। विगत दशकों के दौरान स्कूली शिक्षा व्यवस्था ने अपना लगातार विस्तार किया और दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था के रूप में ख़ुद को स्थापित किया है।

यू-डायस प्लस रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार देश में 14.71 लाख से ज्यादा स्कूल और लगभग 24.69 करोड़ छात्र हैं। यह व्यापक स्तर पर होने वाले रूपांतरण और स्कूली शिक्षा के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 द्वारा “सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने और जीवनपर्यन्त शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने” की बात की जाती है। स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सुधार और विस्तार इसी समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का निरंतर प्रयास है। स्कूली शिक्षा में किए जाने वाले गुणात्मक और संख्यात्मक प्रयासों के बावजूद नामाकंन दर, विद्यार्थियों के स्कूल में बने रहने, सीखने, जैसे अन्य आयामों में चुनौतियां बनी हुई हैं, जिनकी पुष्टि समय-समय पर आने वाली रिपोर्टों से होती रहती है।

हाल ही में आई नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार स्कूल में दाखिला लेने वाले हर दस में चार बच्चे हायर सेकेंड्री तक पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं। किसी न किसी कारण से बच्चे या तो ड्रॉपआउट हो जाते हैं या तो आउट ऑफ स्कूल हो जाते हैं। स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट के निम्न कारण हो सकते हैं- बच्चे की पारिवारिक पृष्ठभूमि, पलायन, शिक्षण अधिगम प्रक्रिया। स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट, सीखने की समस्या, संसाधनों की कमी, जैसी समस्याओं के अनेक पहलू मौजूद हैं।  


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स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता का संबंध बुनियादी संरचना और संसाधनों की उपलब्धता से है। शिक्षक, कक्षा, बिजली, पानी, शौचालय, उचित सीखने-सिखाने का माहौल, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आइसीटी) जैसे अन्य संसाधनों की उपलब्धता स्कूली शिक्षा में गुणात्मक सुधार का हिस्सा है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया है जिसके तहत स्कूली शिक्षा में संसाधनों की उपलब्धता के कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार स्कूली शिक्षा व्यवस्था का व्यापक विस्तार और सुधार हुआ है, इसके बावजूद अब भी संसाधनों का अभाव बना हुआ है। शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्कयता के लिए इन कमियों और चुनौतियों को किसी भी स्थिति में नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 91.9 प्रतिशत स्कूलों में बिजली उपलब्ध है, 92.4 प्रतिशत में लड़कों के शौचालय और 94 प्रतिशत में लड़कियों के शौचालय हैं। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि अभी देश में हजारों की संख्या में स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के 64.7 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर है, 63.5 प्रतिशत स्कूलों में इन्टरनेट और 30.6 प्रतिशत स्कूलों में स्मार्ट क्लास है। सेकेंड्री स्कूलों में STEM शिक्षा के लिए प्रयोगशाला होना आवश्यक है जबकि यू-डायस रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार 51.7 प्रतिशत सरकारी सेकेंड्री स्कूलों में ही प्रयोगशाला है। इसका मतलब कि देश में 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को ही प्रयोगशाला के उपयोग का अवसर मिलता है जबकि STEM शिक्षा में भौतिकी, रसायन विज्ञान, और जीवविज्ञान के लिए प्रयोगशाला का उपयोग आवश्यक है।    

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश में एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक है। यह आँकड़ा देश के कुल स्कूलों का सात प्रतिशत से भी अधिक बताया गया। ऐसे एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 33 लाख से भी अधिक है। इसको दूसरी तरह से कहें, तो एक शिक्षक के ऊपर पूरे स्कूल की जिम्मेदारी है, जहां उसे शिक्षण कार्य करना है, दस्तावेजीकरण करना है, मिड-डे-मिल भी बनवाना है, बच्चों को खिलाना भी है, साथ में अन्य शिक्षणेतर कार्य भी करने हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षक का मुख्य कार्य यानी ‘पढ़ाना’ गौण हो जाता है। वह स्कूल की संपूर्ण व्यवस्था को मात्र जिंदा रख सकता है। एकल शिक्षक को स्कूल की व्यवस्था बनाने, संचालित और नियंत्रित करने में ही पूरा समय व्यतीत हो जाता है जिसकी परिणति स्कूली शिक्षा से बच्चों के ड्रॉपआउट होने और सीखने के अवसर से वंचित होने के रूप में होती है। ऐसा तब है जब संसदीय स्थायी सीमित और शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में दस लाख से अधिक शिक्षकों के पद खाली है। यह एक संवेदनशील विषय है। इसमें सबसे अधिक पद प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर (7.5 लाख पद) खाली हैं।  


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सीखने की प्रक्रिया ठहरकर सोचने, करके के सीखने और निरंतरता की मांग करती है। ऐसी स्थिति में यह भी देखना होगा एक शिक्षक अपनी कक्षा में करता क्या है। क्या वह सिर्फ पढ़ाता है? या उसे और भी शिक्षणेतर काम करना पड़ते हैं? इन सवालों की तह में जाने पर पता चलता है कि शिक्षक केवल इन्‍हीं भूमिकाओं में नहीं होता, बल्कि स्‍कूल से बाहर के दूसरे काम भी करने पड़ते हैं। शिक्षक को जनगणना, चुनावी कार्य के साथ विभिन्न सरकारी मुहिमों, योजनाओं को सफल बनाने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। इन मुहिमों, योजनाओं के क्रियान्वयन, प्रचार-प्रसार में स्वयं के योगदान का सबूत, जैसे सेल्फी और स्क्रीनशॉट रखना पड़ता है जिसे संबंधित उच्चाधिकारियों द्वारा कभी भी मांगा जा सकता है।

फिर, बच्चों के साथ विभिन्न गतिविधियों को कराते हुए तस्वीर, विडियो, विभागीय कार्यालय में भेजने होते हैं या पोर्टल पर अपलोड करने होते हैं। आए दिन शिक्षक को विभागीय और विभागेतर आँकड़े भेजने होते हैं। यह उसके लिए एक आतंक (डेटा टेरर) जैसा होता है। यानी, स्कूली शिक्षकों को शिक्षणेतर कार्यों में इतना उलझा दिया जाता है कि शिक्षण के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार रखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसा तब है जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षकों को शिक्षणेतर कार्य करने की अनुमति नहीं देती है। उसमें पूरी तरह से शिक्षण अधिगम पर ध्यान देने का सुझाव दिया गया है।   

निस्‍संदेह, स्कूली शिक्षा व्यवस्था में प्रगति हुई है, लेकिन अब भी कुछ प्रश्न बने हुए हैं। ये प्रश्न हमारे समक्ष विभिन्न आँकड़ों और घटनाओं के रूप में आते रहते हैं। इनका समाधान बाकी है। इन समस्याओं और चुनौतियों का कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग तरह से कायम हैं। विकसित भारत बनाने और देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, बौद्धिक, तकनीकी  उन्नति की दिशा में समान गुणवत्तापूर्ण समतामूलक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए इन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है। इसके लिए सार्वजनिक शिक्षा में संसाधनों की वृद्धि करना जरूरी है, साथ ही केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच सामंजस्यपूर्ण, योजनाबद्ध तरीके से नीतियों, योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन व परिचालन करना पड़ेगा। शिक्षकों की कमियों को दूर करते हुए शिक्षण अधिगम गुणवत्ता को सुधारने के लिए कार्य करना होगा।


डॉ. जैनबहादुर शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं। ईमेल -jainbahaduryadav@gmail.com  


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