कवि को सही-गलत की पहचान हो, इतिहास और मिथक का अंतर पता हो: कुमार अंबुज


प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा 10-11 अक्टूबर, 2026 को दो दिवसीय ‘युवा रचनाशीलता के साथ कविता-संवाद एवं कविता-पाठ’ का आयोजन किया गया जिसमें संभावनाशील नए युवा कवियों ने भाग लिया एवं भोपाल और अशोकनगर से आए वरिष्ठ आमंत्रित कवियों ने कविता-पाठ किया।

पहले दिन यह कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहला सत्र अभिनव कला समाज भवन में आयोजित हुआ जिसमें विभिन्न स्थानों से आए संभावनाशील युवा कवि प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए। इस सत्र की थीम “कविता से दोस्ती” रखी गयी। प्रारंभ में आपसी परिचय करके प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी कुछ कविताओं को वरिष्ठ कवियों की उपस्थिति में पढ़ा। साथ ही वरिष्ठ कवियों ने अपने-अपने पसंदीदा कवियों की कविता पढ़कर कविताओं के महत्व, उनके अर्थ और प्रासंगिकता पर चर्चा की। साथ ही उन्होंने जाना कि प्रतिभागी कौन-कौन से कवियों की कविताएं पढ़ते हैं एवं किस तरह की प्रेरणा, उद्देश्य और विचारों को लेकर कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश करते हैं।

इस सत्र में प्रतिभागी के रूम में कुसुम वागड़े, प्रज्ञा, अभय, रवि, गिरिराज, मुस्कान आदि शामिल हुए। वरिष्ठ कवियों में भोपाल से आए कुमार अंबुज, अनिल करमेले, आरती और अशोक नगर से आए हरिओम राजोरिया शामिल हुए। इनके अलावा उज्जैन से आए लेखक शशि भूषण, प्रलेसं इंदौर के अन्य सदस्य भी शामिल हुए। इस सत्र के अंत में प्रलेसं इंदौर के साथी विनीत तिवारी ने कहा कि कवि के लिए उत्सुकता होना जरूरी है जिससे हम चीजों को जानें और समझें। बिना जाने हम कुछ अभिव्यक्त नहीं कर सकते। साथ ही उन्होंने इस सत्र के बैनर में लगे तरबूज के फोटो का अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि तरबूज फ़िलिस्तीन के संघर्ष का प्रतीक है। उसके झंडे के तीनों रंगों को समेटे हुए है। यह हमारी फ़िलिस्तीन के प्रति एकजुटता को दर्शाता है।



बता दें कि 7 अक्टूबर, 2023 से इजराइल लगातार फिलीस्तीन पर हमला और बर्बरता किए जा रहा है जिसकी बरसी हाल ही में 7 अक्टूबर को थी। उसी संदर्भ को कविताओं के द्वारा एकजुटता से जोड़ा गया। दूसरा सत्र वरिष्ठ कवियों के कविता पाठ का रखा गया। यह सत्र इंदौर प्रेस क्लब में आयोजित हुआ जिसमें हिंदी भाषा क्षेत्र जाने-माने साहित्यकार और वरिष्ठ कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इन आमंत्रति कवियों में भोपाल से कुमार अंबुज, आरती, अनिल करमेले और अशोक नगर से हरिओम राजोरिया शामिल हुए। सत्र के आरंभ में मंच का संचालन कर रहीं सारिका श्रीवास्तव ने सभी कवियों का संक्षिप्त परिचय कराते हुए स्वागत किया। उसके बाद कविता पाठ हुआ। जिसमें कुमार अंबुज ने अपनी प्रतिनिधि कविताएं याचिका, श्रृंखला, क्योंकि, अलिखित, खतरा, ब्याहता बहनें, खाना बनाती स्त्रियाँ, यहाँ तक आते हुए आदि का पाठ किया।

हरिओम राजोरिया ने एक तरह से, हैसियत, पैसा, जो है सो है, प्रश्न-अभ्यास, पता न था, गाने वाली औरतें, डर-डर कर रहने का समय है आदि कविताएं पढ़ी। अनिल करमेले ने बाकी बचे कुछ लोग, रोना, हमारे यहां दुख, सुरक्षित रास्ते, उपस्थित, सारांश, गुरुवार, टेलीग्राम जैसी कविताओं का वाचन किया। कवयित्री आरती ने पोस्टर बंद पोस्टर शुरू, मृत्युशैया पर एक स्त्री का बयान, दासियां किस स्थिति में थीं, रामराज्य की तैयारी का प्रोग्राम, धर्म का वास्ता है जैसी प्रतिनिधि कविताओं का पाठ किया। इन कविताओं में न केवल स्त्री, मज़दूर, युवा और शोषितों की आवाज़ सुनाई देती है बल्कि कवि इनके संघर्ष, श्रम, पीड़ा और वंचना से जुड़े प्रश्नों को हमारे सामने रखता है। ये कविताएं अन्याय, गैर बराबरी, असमानता और शोषण पर खड़े समाज पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। कविताओं में व्यवस्था के प्रति असहमति और प्रतिरोध का स्वर दिखाई देता है। ये कविताएं श्रोताओं को काल्पनिकता से परे वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियों को सोचने और मनन करने का अवसर देती हैं।

इस सत्र के अंतिम चरण में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रलेसं इंदौर के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर ज़ाकिर हुसैन ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया और कहा कि वरिष्ठ कवियों द्वारा ताज़ा हालातों पर कविताओं को सुनना हमारे लिए महत्वपूर्ण अनुभव रहा। ज़ाकिर हुसैन ने अपनी एक गज़ल भी सुनाई। अंत में प्रलेसं इंदौर के सचिव हरनाम सिंह ने आमंत्रित कवियों, हॉल में उपस्थित शहर भर के श्रोताओं, पत्रकारों और इंदौर प्रेस क्लब का आभार व्यक्त किया।

दूसरे दिन का कार्यक्रम भी अभिनय कला समाज सभागृह में संपन्न हुआ। इसमें प्रारंभ में चंद्रशेखर सांकल्य और छत्रपाल कुशवाह ने अपनी कविताएं पढ़ीं। तत्पश्चात् पिछले दिन के प्रतिभागियों की कविताओं पर बातचीत करने के लिए आरती ने एज़ाज अहमद का लेख पढ़ा। यह लेख कविता या कोई भी रचना की सृजनप्रक्रिया समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह लेख बताता कि कोई भी रचना लिखने से पहले कवि या लेखक की स्मृति, उसकी प्रेरणा तथा उसके पूर्व की परंपरा रहती है। इसके बाद वरिष्ठ कवि हरिओम राजोरिया ने अपने जीवन अनुभवों का उदाहरण देते हुए कविता की रचना प्रक्रिया पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कविता केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि वह व्यक्ति को अपने खुद के अनुभव और विचार व्यक्त करने का माध्यम है। और इसके लिए केवल भाषा अर्जन नहीं बल्कि अधिक से अधिक पढ़ना जरूरी है।



अनिल करमेले ने एक संक्षिप्त नोट पढ़ा जिसमें उन्होंने हिंदी साहित्य के लेखकों और प्रसिद्ध विदेशी लेखकों के उदाहरण देकर कहा कि कविता सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डालती है और यदि कोई कविता ऐसा नहीं करती तो वो सतही या केवल मनोरंजन के लिए हो सकती है, समाज के लोगों की बेचैनी, आकांक्षा की अभिव्यक्ति नहीं। इनके बाद वरिष्ठ कवि कुमार अंबुज ने प्रतिभागियों की कविताओं पर व्यक्तिगत टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कविता कई तरह की होती है लेकिन आपको तय करना होगा कि कविता किस तरह की है। कोई भी कविता विचारहीन नहीं होती। यदि उसकी उपयोगिता और महत्व है तो उसे साहित्य की कोटि में रखा जाएगा। कविता जीवन के बारे में होती है। एक कविता लिखने के लिए आपको हर तरह के अनुभव के साथ इतिहास, विज्ञान आदि की समझ होनी चाहिए। आपको सही और गलत की पहचान के साथ इतिहास और मिथक का अंतर का पता होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कवि या लेखक का काम असमाप्त नहीं होता, वह अपने देश-काल, परिस्थिति के अनुसार किसी भी बात को नए ढंग से कहता है। इस नए ढंग से कहने के लिए पढ़ना होगा, डिस्कस करना होगा और कविता की परंपरा को समझना होगा।

इस विचार चर्चा के अंत में कविता एवं इसकी रचना प्रक्रिया पर सवाल-जबाव किये गए जिसमें सारिका श्रीवास्तव, शशि भूषण, चंद्रशेखर सांकल्य, अभय, हरनाम सिंह, नेहा, मुस्कान, छत्रपाल, गिरिराज आदि ने सवाल किए एवं उपस्थित वरिष्ठ कवियों ने जबाव देने के प्रयास किए। विनीत तिवारी ने प्रश्नों के जबाव में अपनी बात भी रखी। उन्होंने कहा कि कविता लिखने से पहले आप तय करें कि कविता किसे संबोधित करके लिख रहे हैं अर्थात उसके पाठक और आलोचक कौन हैं। कविता लिखने के आपके उद्देश्य क्या हैं। उन्होंने कहा कि कई बार व्यक्ति बहुत पढ़ा-लिखा नहीं होता लेकिन उसकी कविताएं अपने जीवन अनुभवों से निकली होने के कारण मार्मिक होती हैं।


(गिरिराज की रिपोर्ट)


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