बिहार में एक लड़की और उसके पुरुष मित्र के साथ हुई यौनिक हिंसा तथा दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना, दोनों मामले उस सामाजिक वास्तविकता की ओर संकेत करते हैं जिसमें लड़कियों की आवाजाही, दोस्ती और यौनिकता पर निगरानी को सामान्य बनाया जाता है। महिलाओं का बलात्कार रोकने की जगह सरकार ने पार्क में सूर्यास्त के बाद उनके आने पर रोक लगा दी।
हम अगर महिलाओं के उत्पीड़न की शुरुआत पर रौशनी डालने की कोशिश करें तो जब समाज लुटेरे वर्ग और मेहनतकश वर्ग में बंटा तो निजी संपत्ति को परिवार में आगे बढ़ाने के लिए पुरुषों को संपत्ति पीढी दर पीढी दी जाने लगी और महिलाओ का काम मुफ्त में पिता, पति और बेटे की सेवा करना रह गया।
मनुवाद महिला को पैर की जूत्ती जैसे देखता है और उनको पीटने का आदेश देता है और फिर इस उत्पीड़न को “औरतों की किस्मत” कहता है। जिस उत्पीड़न का जन्म वर्ग समाज में हुआ है, उसका अंत भी इस गले सड़े समाज को बदलकर ही संभव है।
अर्धसामंती भारतीय समाज में मेहनतकश महिला उत्पादन में भी भाग लेती है और घर का काम भी करती है। खेत, कारखाना, निर्माण स्थल या घरेलू उत्पादन में उसका श्रम कम मूल्यांकित होता है और घर लौटने के बाद खाना पकाना, सफाई, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा पानी व ईंधन जुटाने का भार भी उसी पर डाल दिया जाता है। इस प्रकार महिलाओं से मुफ़्त में श्रम शक्ति पैदा करवाई जाती है जिसे “स्वाभाविक” मानकर छुपा देता है।
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सामंती पितृसत्तात्मक संबंध महिला को पर्दे, “इज्जत”, विवाह और परिवार की आज्ञा के घेरे में रखते हैं। दूसरी ओर साम्राज्यवादी बाजार उसके श्रम को सस्ता करता है और उसके शरीर, सौंदर्य तथा यौनिकता को वस्तु के रूप में बेचता है। एक ओर कहा जाता है कि “घर से बाहर मत निकलो” और दूसरी ओर कहते हैं कि “बाहर आओ, लेकिन अपनी देह और श्रम को बेचो।” भारत में इसके मेल से बना जहर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता है। ज्यादातर गरीब महिलाएं घर की चारदीवारी में रहकर बहुत सस्ते में बीड़ी बनाती हैं या दूसरों के घर साफ-सफाई का काम ही करती हैं।
हाल ही में हरियाणा के हिसार में खाप पंचायत ने नौजवानों के अपनी मर्जी से विवाह करने के खिलाफ फैसला सुनाया। आर्य नगर गाँव में की गयी पंचायत में 1000 गाँव शामिल थे। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है जो इस देश के लोगों को अपनी मर्जी से शादी करने का हक देता है।
भारतीय संदर्भ में पितृसत्ता को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जाति व्यवस्था की निरंतरता में अंतर्विवाह और महिलाओं की यौनिकता पर नियंत्रण की ऐतिहासिक भूमिका रही है। इसलिए महिला किससे मिलेगी, किससे प्रेम करेगी और किससे विवाह करेगी, इसे केवल निजी निर्णय नहीं रहने दिया जाता बल्कि गाँव के सामंती ठेकेदार दूसरी जाति में शादी करने पर मौत की भी सजा सुनाते हैं।
यौन हिंसा के मामलों में तत्काल न्याय, निष्पक्ष जांच, अपराधियों की जवाबदेही और पीड़िताओं की सुरक्षा अनिवार्य है, लेकिन केवल अपराधी को दंडित करने से वह समाज बदल नहीं जाता जो महिला को वस्तु जैसे देखता है।
महिला मुक्ति “पुरुष बनाम महिला” नहीं है और न केवल कानून और सुरक्षा का प्रश्न है। बलात्कार का अंत करने के लिए उसकी जड़ों को खत्म करना होगा। यह वर्ग, संपत्ति, परिवार, जाति और उत्पादन संबंधों का प्रश्न है इसलिए इसका अंत करने के लिए वर्ग समाज को खत्म करना होगा। महिलाएं आधी आबादी हैं और महिला मुक्ति के बिना सामाजिक मुक्ति अधूरी है। इस आधी आबादी की जगह वर्ग संघर्ष में है।
रवजोत कौर दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और ऐक्टिविस्ट हैं

