मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों में महिलाओं से बातचीत के दौरान एक अक्सर सुनने को मिलती है—“नाम तो पट्टे में है, लेकिन फैसला तो घर के आदमी ही लेते हैं।” यह वाक्य केवल घरेलू सत्ता संबंधों की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि वनाधिकार कानून और महिलाओं की वास्तविक स्थिति के बीच मौजूद दूरी को भी सामने लाता है। कानून ने महिलाओं को अधिकारों के भीतर जगह देने की कोशिश की, लेकिन क्या उन्हें निर्णय की शक्ति भी मिली? क्या कानूनी मान्यता सामाजिक बराबरी में बदल पाई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वनाधिकार कानून उस ऐतिहासिक अन्याय को सचमुच समाप्त कर पाया, जिसे वह स्वीकार करते हुए बना था? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। क्योंकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है और पूरी तरह संतोषजनक भी नहीं। बदलाव हुए हैं, लेकिन बराबरी अब भी अधूरी है।
मध्यप्रदेश के जंगलों में महिलाएँ आज भी सबसे अधिक दिखाई देती हैं—महुआ चुनते हुए, जलावन लकड़ी लाते हुए, चारा इकट्ठा करते हुए, जंगल से खाद्य सामग्री लाते हुए या औषधीय पौधों की पहचान करते हुए। जंगल उनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का विस्तार हैं। यही जंगल संकट के समय भोजन देते हैं, घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं और कई परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा का अनौपचारिक आधार भी बनते हैं। फिर भी, जंगलों पर अधिकारों की चर्चा में महिलाएँ अक्सर सबसे पीछे क्यों दिखाई देती हैं? यही प्रश्न वनाधिकार और जेंडर इक्विटी की बहस के केंद्र में है।
जंगल से रिश्ता महिलाओं का, अधिकार किसके?
मध्यप्रदेश भारत के उन राज्यों में है जहाँ जंगल केवल भूगोल नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन का हिस्सा हैं। मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, अलीराजपुर, झाबुआ, उमरिया और शहडोल जैसे जिलों में बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों पर निर्भर है। लेकिन यह निर्भरता महिलाओं के जीवन में और गहरी दिखाई देती है। आदिवासी और वन-आश्रित समुदायों की महिलाएँ यह जानती हैं कि किस मौसम में जंगल से क्या लेना है, किस पौधे को बचाकर रखना है, कौन-सी जड़ी-बूटी किस बीमारी में काम आएगी और जंगल का उपयोग इस तरह कैसे करना है कि वह खत्म न हो। कई परिवारों में महुआ, तेंदूपत्ता, जंगली फल, लकड़ी और चारा जैसी चीज़ें महिलाओं के श्रम से घर तक पहुँचती हैं।
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आज विकास और पर्यावरण नीति की भाषा में जिसे “सतत संसाधन प्रबंधन” कहा जाता है, उसका व्यवहारिक ज्ञान इन महिलाओं के जीवन का हिस्सा रहा है। लेकिन यहाँ एक विडंबना हमेशा दिखाई देती है—जिन महिलाओं का जंगलों से सबसे गहरा रिश्ता है, उन्हीं का अधिकारों की औपचारिक संरचना में सबसे कम स्थान रहा है।
“ऐतिहासिक अन्याय” आखिर था क्या?
वनाधिकार कानून को समझने के लिए उसके इतिहास को समझना जरूरी है। दरअसल, औपनिवेशिक शासन के दौरान जंगलों को राज्य के नियंत्रण में लाने की यह प्रक्रिया शुरू हुई। भारतीय वन अधिनियम, 1927 के बाद जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित किया गया और सदियों से जंगलों पर निर्भर समुदाय अपने ही संसाधनों से धीरे-धीरे दूर किये जाते रहे। जिस ज़मीन पर पीढ़ियों से खेती होती थी, वे अब कागज़ों में सरकारी भूमि हो गईं। लोग अपने ही जंगलों में “अतिक्रमणकारी” कहे जाने लगे।
स्वतंत्र भारत में भी यह ढाँचा बहुत हद तक बना रहा। वन संरक्षण के नाम पर सरकारी नियंत्रण मजबूत हुआ, लेकिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को पर्याप्त मान्यता नहीं मिली। विस्थापन, बेदखली और असुरक्षा कई वन समुदायों के अनुभव का हिस्सा बनी रही।
इसी पृष्ठभूमि में 2006 का वनाधिकार कानून (Forest Rights Act – FRA) आया। यह केवल अधिकार देने का कानून नहीं था; पहली बार यह स्वीकार करने वाला कानून था कि आदिवासी और वन-आश्रित समुदायों के साथ “historical injustice” यानी ऐतिहासिक अन्याय हुआ है।
लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि यह अन्याय सभी के लिए एक जैसा ही था। महिलाओं के मामले में यह अन्याय कहीं अधिक जटिल और गहरा था। महिलाएँ जंगलों का सबसे अधिक उपयोग करती थीं, लेकिन स्वामित्व उनके पास नहीं था। वे खेती में बराबर श्रम करती थीं, लेकिन भूमि पुरुषों के नाम पर ही होती थी। जंगल के बारे में उनका ज्ञान गहरा था, लेकिन निर्णय लेने की जगहों पर उनकी उपस्थिति कम थी।
दूसरे शब्दों में, महिलाओं के साथ दोहरा अन्याय हुआ—एक राज्य की वन नीतियों के कारण और दूसरा सामाजिक पितृसत्ता के भीतर।
जंगल उनका था, पहचान नहीं!
वनाधिकार कानून बनने से पहले मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में महिलाओं का जंगल से रिश्ता गहरा था, लेकिन अधिकारों की भाषा में उनका नाम लगभग नहीं था। गोंड, बैगा, भील, कोरकू और सहरिया समुदायों की महिलाएँ जंगलों से भोजन, जलावन, औषधीय पौधे और लघु वनोपज लाती थीं। परिवार की आजीविका का बड़ा हिस्सा उनके श्रम पर टिका होता था। सूखे, बेरोज़गारी या आर्थिक संकट के समय जंगल आधारित संसाधन ही परिवारों का सहारा बनते थे।
विशेष रूप से बैगा जैसी विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) समुदायों की महिलाओं के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। लेकिन वनाधिकार की प्रक्रियाओं में दस्तावेज़, साक्ष्य और प्रशासनिक औपचारिकताएँ कई बार उनके लिए अतिरिक्त बाधा बन जाती हैं।
लेकिन इस पूरे श्रम के बावजूद—
- जमीन पर महिलाओं का नाम नहीं होता था,
- ग्राम स्तर के निर्णयों में उनकी भूमिका सीमित थी,
- प्रशासनिक प्रक्रियाओं में महिलाएँ लगभग अनुपस्थित थीं,
- और उनके ज्ञान को अधिकार आधारित समझ नहीं, घरेलू अनुभव भर माना जाता था।
यहाँ एक बात समझना जरूरी है—महिलाएँ व्यवस्था के बाहर नहीं थीं; वे व्यवस्था के भीतर थीं, लेकिन शक्ति और निर्णय से बाहर थीं।
वनाधिकार कानून ने क्या बदलने की कोशिश की?
वनाधिकार कानून को केवल “पट्टा बाँटने का कानून” मानना उसकी सीमित समझ होगी। इसका उद्देश्य जंगलों पर निर्भर समुदायों को rights holders के रूप में मान्यता देना था।
- व्यक्तिगत वनाधिकार (IFR)- जो परिवार पीढ़ियों से वनभूमि पर खेती कर रहे थे, उन्हें व्यक्तिगत वनाधिकार देने की व्यवस्था की गई। कानून ने स्पष्ट कहा कि अधिकार पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर होने चाहिए। इसका उद्देश्य महिलाओं को भूमि पर वैधानिक पहचान देना था।
लेकिन यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शुरू होता है— क्या नाम जुड़ जाने भर से अधिकार सुनिश्चित हो जाते हैं? बातचीत के दौरान बहुत सी महिलाओं ने यह कहा कि अधिकार पत्रों में नाम जुड़ने के बावजूद भूमि से जुड़े निर्णय घर के पुरुष ही लेते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि कानूनी मान्यता और वास्तविक नियंत्रण के बीच दूरी अब भी मौजूद है।
- सामुदायिक वनाधिकार (CFR)- वनाधिकार की चर्चा अक्सर व्यक्तिगत भूमि तक सीमित हो जाती है, जबकि महिलाओं के लिए सामुदायिक वनाधिकार (Community Forest Rights – CFR) उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
ईंधन, चारा, जल स्रोत, जंगली खाद्य पदार्थ और औषधीय वनस्पतियों के लिए महिलाएँ सामुदायिक जंगलों पर अधिक निर्भर रहती हैं। ऐसे में CFR केवल संसाधन प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि महिलाओं की आजीविका, स्वायत्तता और सम्मान का प्रश्न भी है।
लेकिन यहाँ भी एक सवाल बना रहता है—यदि सामुदायिक जंगलों के उपयोग और प्रबंधन से जुड़े फैसलों में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी नहीं है, तो क्या CFR का लाभ बराबरी से उन तक पहुँच पाता है?
- वनाधिकार समिति (FRC): प्रक्रिया की सबसे अहम कड़ी है. वनाधिकार कानून के तहत वनाधिकार समिति (Forest Rights Committee – FRC) बनाई जाती है। ग्राम सभा द्वारा गठित यह समिति दावों की प्रारंभिक जाँच करती है, स्थानीय साक्ष्य एकत्र करती है और तय करती है कि कौन-सा दावा आगे बढ़ेगा।
वनों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों के हाथ में देने से कौन रोक रहा है?
वनाधिकार कानून में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि प्रक्रिया में लैंगिक पक्षपात कम हो और महिलाओं के अनुभवों को महत्व मिले। ज़मीनी हकीकत अधिक जटिल है। मध्यप्रदेश के कई क्षेत्रों में महिलाओं ने बताया कि बैठकों में दस्तावेज़ों और प्रक्रियाओं की जानकारी अक्सर पुरुषों तक सीमित रह जाती है। महिलाएँ मौजूद रहती हैं, लेकिन निर्णय प्रक्रिया से दूरी बनी रहती है। कई बार उन्हें बाद में जानकारी मिलती है कि किसका दावा गया, किसका नहीं।
यहाँ एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है—representation और participation एक जैसी चीज़ें नहीं हैं। यदि महिलाएँ केवल सूची में हैं, लेकिन निर्णय नहीं ले रहीं, तो वनाधिकार समिति की लोकतांत्रिक भावना कमजोर पड़ जाती है। विशेष रूप से विधवा, अकेली महिलाओं और महिला मुखिया परिवारों के मामलों में FRC की संवेदनशील भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि समिति gender-sensitive तरीके से काम नहीं करती, तो महिलाओं के दावे शुरुआती स्तर पर ही कमजोर हो सकते हैं।
कानून के बाद क्या बदला और क्या नहीं?
यह कहना गलत होगा कि वनाधिकार कानून के बाद कुछ भी नहीं बदला। महिलाओं के नाम कई अधिकार पत्रों में जुड़े हैं। ग्राम सभाओं में उनकी मौजूदगी बढ़ी है। अधिकारों की भाषा गाँवों तक पहुँची है। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में व्यक्तिगत दावे स्वीकृत हुए हैं, लेकिन सामुदायिक वनाधिकारों का क्रियान्वयन अब भी कई क्षेत्रों में असमान और धीमा दिखाई देता है। इसका असर महिलाओं पर और अधिक पड़ता है, क्योंकि उनका जंगल से रिश्ता सामुदायिक संसाधनों के स्तर पर ज्यादा गहरा है। यहाँ सवाल उठता है कि क्या केवल नाम जुड़ जाना बराबरी है?
यदि भूमि पर वास्तविक नियंत्रण पुरुषों के हाथ में है, यदि महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं, यदि सामुदायिक अधिकारों में उनकी भूमिका सीमित है—तो यह कहना कठिन होगा कि ऐतिहासिक अन्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है। बल्कि कई बार ऐसा लगता है कि वह नए प्रशासनिक और सामाजिक रूपों में जारी है।
प्रतिनिधित्व के साथ निर्णय की शक्ति भी आवश्यक
यदि वनाधिकार कानून को वास्तव में gender-just बनाना है, तो केवल महिलाओं की उपस्थिति पर्याप्त नहीं होगी।
- वनाधिकार समिति में महिलाओं की निर्णयकारी भूमिका मजबूत करनी होगी।
- CFR प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी संस्थागत रूप से सुनिश्चित करनी होगी।
- विधवा, एकल और महिला मुखिया परिवारों के दावों को प्राथमिकता देनी होगी।
- महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान को वन प्रबंधन की प्रक्रिया में शामिल करना होगा।
- और सबसे महत्वपूर्ण—वनाधिकार को केवल भूमि का प्रश्न नहीं, बल्कि महिला अधिकार, पहचान और सामाजिक न्याय के प्रश्न के रूप में देखना होगा।
मध्यप्रदेश में महिलाओं के संदर्भ में वनाधिकार की कहानी विरोधाभासों से भरी है। कानून ने रास्ता खोला है, लेकिन मंज़िल अभी बाकी है। शायद वनाधिकार की सबसे बड़ी परीक्षा यही है—क्या वह महिलाओं को केवल कागज़ पर नाम देता है, या जंगलों से उनके पुराने रिश्ते को बराबरी, निर्णय की शक्ति और सम्मान के साथ पहचान भी देता है?
यदि महिलाएँ जंगलों की सबसे बड़ी संरक्षक हैं, तो उन्हें केवल श्रम करने वाली नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली नागरिक के रूप में स्वीकार करना होगा। विशेष रूप से वनाधिकार समिति जैसी संस्थाओं में महिलाओं की वास्तविक भूमिका को मजबूत करना जरूरी है, क्योंकि अधिकारों की पूरी प्रक्रिया वहीं से शुरू होती है। क्योंकि जब तक जंगलों से सबसे गहरा रिश्ता रखने वाली महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं मिलता, तब तक यह कहना मुश्किल होगा कि इतिहास का वह अन्याय सचमुच पीछे छूट गया है।


