शहर से दूर जाते हुए शहर के भीतर आना… जैसे खुद को पाना! वकील लेन से जंतर-मंतर की सुरंग में…

सुरंग पार करके जब आप बाहर निकलते हैं तो खुद को एक कम्पाउंड में पाते हैं, जहां बड़े-बड़े पेड़ों और बहुत सी वनस्पति के झुरमुट के बीच चंद रिहाइशी मकान बने हैं. वहां दाखिल होते ही एक पल को आपको लगता है मानो सुंदरबन सरीखे वर्षावन के बीच बसा कोई गाँव हो. अपने आस-पास का नज़ारा देख कर जब आप विस्मय में धीरे-धीरे अपनी पलकें झपका रहे होते हैं तो खुद को जैसे किसी जलडमरूमध्य में पाते हैं.

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रफ़्तार: पिता दिवस पर एक लघुकथा

ट्रेन अपनी गति पकड़ चुकी थी। अब तक मुझे अपनी सीट नहीं मिल पायी थी। जो सीट मेरे लिए मुकर्रिर थी वो दूसरे कोच में थी। स्टेशन पर जब तक गाड़ी खड़ी रही मैं अपनी उसी सीट पर बैठा था। कुछ देर बाद एक बूढ़ा दंपत्ति मेरे पास आया…

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हमारी फरियादों को सुनने वाला अब कोई नहीं है: अरुंधति रॉय

ये एक छोटा सा वीडियो है, दिल्ली से। यहां हम सभी, जो जमा हुए हैं, वे लोग हैं, जो आपको लगातार सुन रहे हैं। हम लोग यहां कुछ साधारण सी …

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विनोद दुआ पर मुकदमे के बहाने ‘संशयवादी पत्रकारिता’ के अंत पर कुछ विचार: रॉबर्ट पैरी

‘संशय’ पत्रकारिता का बुनियादी उसूल है। सवाल करना लाज़िमी है, चाहे सामने कितनी बड़ी हस्ती क्यों न हो, लेकिन जहाँ बदनीयती हो वहाँ ऐसा करना अपराध मान लिया जाता है। …

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निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन

निरंकुशता और जन-समर्थन विरोधाभासी लग सकते हैं; लेकिन आभास से वास्तविकता का निषेध नहीं हो जाता। बेशक यह समर्थन झूठ बोलकर हासिल किया जाता है।

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COVID-19 संकट पर नोबेल विजेता अभिजित बनर्जी से राहुल गांधी की बातचीत यहां पढ़ें

जहाँ तक गरीबी का सवाल है, मैं स्पष्ट नहीं हूँ कि अगर अर्थव्यवस्था में सुधार होता है, तो गरीबी पर इसका प्रभाव पड़ेगा। वास्तविक चिंताएँ हैं- क्या अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित होगी और विशेष रूप से, कोई इस प्रक्रिया के माध्यम से इस महामारी के संभावित समय के बारे में कैसे सोचता है।

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नग़ीब माहफूज़ की कहानी “आधा दिन”

कायरो, मिस्र में 1911 में जन्मे नग़ीब माहफूज़ ने 17 वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. उनका पहला नाविल 1939 में शाया हुआ और 1952 में मिस्र की क्रांति से पहले उनकी लिखी दस और किताबें शाया हो चुकी थीं

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“एलीट के विद्रोह को जनता अपनी बग़ावत समझ बैठी है”!

इस बग़ावती एलीट के बीच कोई वर्ग एकता जैसी चीज़ नहीं है, सिवाय इसके कि इसकी पकड़ उन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक साधनों पर है जिसके सहारे वे दंडमुक्त रह सकते हैं।

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कोरोना वायरस की आड़ में बुनियादी रूप से बदल चुका पैसे का खेल समझें

यदि केंद्रीय बैंक ने बहुत सारा धन पैदा किया है इसे तंत्र में धकेल भी दिया है, बावजूद इसके किसी की आय नहीं बढ़ी, तो सारा पैसा गया कहां?

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“मैं प्रेम में भरोसा करती हूं. इस पागल दुनिया में इससे अधिक और क्या मायने रखता है?”

  एलिज़ाबेथ वुर्त्ज़ेल के शब्दों में उनकी मौत से पहले बीता वक्त     टूटी शादियों वाली इस अस्तव्यस्त धरती से मेरा सलाम. यह सराय अब टूटकर बिखर रहा है. …

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