शहर से दूर जाते हुए शहर के भीतर आना… जैसे खुद को पाना! वकील लेन से जंतर-मंतर की सुरंग में…


दिल्ली में नेपाल के दूतावास वाली तरफ से अगर फिरोज़शाह रोड पर चलना शुरू करें, तो दोनों तरफ जवान और बूढ़े पेड़ों की एक मुसलसल छायादार कतार है. बूढ़े पेड़ दायीं तरफ हैं और नेपाल दूतावास की सरहद के प्रहरी जान पड़ते हैं. बायीं तरफ वाले अभी बांके जवान हैं, तो ज़रा सी हवा चलते ही इठलाते छैलों की तरह लहकने लगते हैं. दायीं तरफ वालों में कुछ गूलर के पेड़ भी हैं, और पके हुए हों, तो हवा चलने पर आपके सिर के ऊपर ओलों की तरह बरस भी सकते हैं. इसी सड़क पर तकरीबन सौ मीटर बाद एक सड़क दायीं ओर मुड़ रही है.

यह वकील लेन है.

मुड़ते ही आपको पिलखन और बरगद के दो उम्रदराज़ दरख्त मिलेंगे, आप चाहें तो दुआ-सलाम करें. न भी करें, तो चलेगा. वे आपको आशीर्वाद फिर भी दे ही देंगे. थोड़ा आगे जाकर दायीं तरफ अगर दरवाज़ा खुला मिले तो एक मर्तबा अन्दर ज़रूर झांक लें, वहां एक हराभरा बसेरा है. और अगर कोई एतराज़ न करे, तो अन्दर भी चहलकदमी कर आयें. अच्छा लगेगा.

वापिस आकर इसी सड़क पर अगर सीधा चलते रहें, तो आगे चलकर वह अंग्रेजी का ‘Y’ बना देती है. आप दांया वाला डंडा छोड़ दें. वह आपको शहर के शोर-शराबे वाली दुनिया में ले जायेगा. वह बाराखंबा से जाकर मिलता है और वहीं अपनी पहचान खो बैठता है. वैसे भी, आप भला क्यों जाना चाहेंगे उस सड़क पर. अब तो वहां बारह खंबे भी नही हैं.

मेरी मानें तो बायें वाले डंडे को पकड़ लें. और पकड़े रहें. यह सड़क दिलकश भी है और वफ़ादार भी, जो सुरक्षित मोड़ आने तक, बिना आपकी उंगली छोड़े और बिना अपनी पहचान खोये, आपके साथ बनी रहेगी.

इस पर मुड़ते ही आपको कुछ दुकानें मिलेंगी. उनमें जीतू भाई की चाय की दुकान भी है. आप चाहें तो थोड़ा सुस्ताने और चाय पीने के लिए यहां रुक सकते हैं और उनसे बतिया सकते हैं. वे इस इलाके के पुराने बाशिन्दे हैं. उनके दादा यहां 1936 में ग्वालियर से आये थे और यहीं के होकर रह गये.

खैर, जीतू भाई की कहानी किसी और रोज़.

अभी बस कुछ यूं करें कि सीधे-सीधे इस सड़क पर खरामा-खरामा चलते रहें. शहर का घनघोर शोर भी यहां तक नहीं पहुँच पाता. यहां इक्का-दुक्का गाड़ी ही आती-जाती दिखेगी. हवा भी कम ज़हरीली मिलेगी. दोनों तरफ घने छायादार वृक्ष, चिलचिलाती धूप में धूप से बचायेंगे और बरसात में, हल्की-फुल्की फुहार से भी. सर्दियों में कम से कम, एक बार इस सड़क को कोहरे से ढंका देखने ज़रूर आएं.

और हां, जब आप इस सड़क पर चल रहे हों तो अपने अन्दर के शहरी मानुष का गला घोंट दें, जिसे हर जगह पहुँचने की जल्दी होती है. चलते-चलते पेड़ों की तरफ नज़र दौडाएं. उनके रूप, आकार और रंगों में खुद को घुल जाने दें. इनमें से कई, हम-तुम से भी पहले से हैं और हमारे-तुम्हारे बाद भी रहेंगे. इनका एहतराम करें. अगर कोई बरगद मिल जाए तो उसकी बिखरी जटाओं की एक लट पकड़ कर संवार दें.

इसी पंक्ति में नीम के कुछ पेड़ तो कुदरती शाहकारी की बेहतरीन मिसालें हैं. पल भर को रुक कर इन्हें नज़र भर ज़रूर देखें. थोड़ा आगे चलकर बायीं तरफ आपको, रशियन कल्चरल सेंटर का पिछला हिस्सा दिखेगा.

आप कहेंगे, ‘इसमें तो कुछ खास बात नहीं.’

‘मैं भी कहां कह रहा हूं कि इसमें कुछ खास है. बस, एक अलहदा सा परिप्रेक्ष्य है. खासकर, उनके लिए जिनका अस्सी के दशक में इस इमारत से कुछ लेना-देना रहा है.’

दायीं ओर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का हॉस्टल पड़ता है. उसकी दीवार के साथ सटकर इस्तरी वाली स्त्री बैठती है. वो शायद यहीं पल-बढ़ कर एक कमसिन लड़की से स्त्री बनी हो. घर की आमदनी में थोड़ा इजाफा हो पाये, इसके चलते उसने कपड़े इस्तरी करने का काम शुरू किया होगा. पता नहीं कितना उधार चलता होगा छात्रों का उससे.

सुनते हैं कभी यहां रहने वाले कुछ परिवारों ने बकरियां भी पाल रखी थीं, जो वहीँ आसपास सड़क के किनारे उगी घास को दिन भर चरती रहती थीं. वे इतनी गुस्ताख हो गयी थीं कि आते-जाते लोगों को अपने सिर से ठेल दिया करती थीं. हमको बकरियां नहीं दिखीं. शायद अब हों ही ना.

यहां से थोड़ा और आगे जाने पर कस्तूरबा गाँधी मार्ग आ जाता है. वकील लेन से अब विदा लेने का वक्त आ चुका है.


सड़क पार करते ही सामने मैक्सम्यूलर भवन दिखायी पड़ता है, वहां से दायें मुड़ जाएं और कोई बीस कदम चलने के बाद अतुल ग्रोव रोड पर बायें. अब आप फिर से एक बार शहर के अन्दर ही, शहर से दूर ले जाने वाले रास्ते पर हैं. यह सड़क वकील लेन से उतनी भर ही चौड़ी है, जितना कि एक सड़क को अपनी झेंप मिटाने के लिये चौड़ा होना चाहिए. वकील लेन की तरह सीधी-सपाट भी नहीं जान पड़ती है और अंग्रेजी का खूबसूरत ‘C’ बनाती हुई चलती है. यहां बरगद, नीम, अशोक, इमली, अमलतास, आपके आने के स्वागत में अपने चेहरों पर मुस्कान लिए खड़े मिलेंगे.

जब आप अपनी धुन में चलते-चलते आगे बढ़ रहे होंगे, तो अचानक लाल रंग की एक शानदार दुमंजिला इमारत दिखायी देगी. इस पर नज़र पड़ते ही यह अपने सम्मोहन का जाल बुनना शुरू कर देगी और बहुत मुमकिन है देर तक आप उसी में फँसे रहें. यह किसी ज़माने में, अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी ‘चमरी’ हुआ करती थी, जहां ‘छड़े’ अंग्रेज सिपाही और अफसरों को ठहराया जाता था. इसमें कभी, कुल मिलाकर सत्तर फ्लैट हुआ करते थे. अब भी शायद सत्तर ही हों पर अब कितने इस्तेमाल में हैं, पता नहीं.

कहा जाता है कि इसी चमरी में कभी रस्किन बॉण्ड का बचपन गुज़रा था. उनके पिता ने दूसरी आलमगीर जंग के दौरान जब फ़ौज की नौकरी की तो उन्हें यहां रहने की जगह मिली थी. उनके यहां आने की शायद एक वजह यह रही होगी कि तब तक वे ‘छड़े’ हो चुके अंग्रेजों में शुमार हो चुके थे. यानि तब तक उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका था और हालांकि उनका एक बेटा भी था, बावजूद इसके वे सामान्य परिवार वाले अंग्रेज अफसरों के लियए बने बंगलों में नहीं रह सकते थे. खैर, वो तब की बात थी. उस बात को बीते हुए भी अब एक अरसा हो चुका है. 

अब यह जगह ‘पोस्ट एंड टेलिग्राफ’ के कर्मचारियों के घरों से आबाद है. इसके प्रांगण में दिन के किसी भी वक़्त दो-एक कारें, चंद मोटरसाइकिलें और कुछ साइकिलें खड़ी हुई दिख जायेंगी. पार्क के साथ-साथ बनी रेलिंग पर कुछ रंग-बिरंगे कपड़े भी सूख रहे होंगे. शाम के वक्त कुछ बच्चे भी क्रिकेट खेलते हुए दिख जायेंगे.

यहां से आगे बढ़ने से पहले मैं, इस सफ़र में हमारी हमसफ़र बनी, ज्योति के बारे में बस इतना भर बता दूं कि वह इस वक्त हमारे गाइड का रोल अदा कर रही है. उसके बारे में हम किसी और रोज़ तफ़सील से बात करेंगे. वो एक अलग कहानी का पुलिन्दा है. किरदार के तौर पर वो अपने-आप में ही किसी ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ से कम नहीं. यहां उसके बारे में बात करने का एक ख़तरा यह है कि उसकी कहानी शुरू तो आसानी से हो जाती है पर खत्म होने का नाम नहीं लेती. कहीं उसकी कहानी के चक्कर में हम अपने रास्ते से ही न भटक जाएं. इसलिए उसे अभी हम रहने देते हैं और लौटते हैं अपने मूल सफ़र पर.

ज्योति ने चमरी की बायीं तरफ़ इशारा करते हुए बताया, ‘वोSSSS वल्ले दो फ्लैट्टों में भूत रहवे है.’ मामला अब रहस्यमय होने लगा था.

मैंने आँखें तरेरते हुए कहा, ‘अच्छा, तो यह बिल्डिंग ‘हॉन्टेड’ भी है?’

उसने जवाब दिया, ‘मुझे पत्ता था आप बिलकुल नी मन्नेके. इस बिल्डिंग की बहोत सी भूत्तों वाली कहाणियां तो ख़ुद मन्ने सुण रखी हैं.’

उसकी जुबान में सहारनपुरिया लहजा आ चुका था, जो कानों को सुनने में अच्छा लग रहा था. वो जब पुलकित होती तो उसे खुद पता नहीं चलता था कि कब उसकी दिल्ली वाली हिंदी छूटकर सहारनपुर वाली हो जाती थी.

मैंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘अच्छा तो बता, कैसी-कैसी कहानियां तूने ‘अपणे-इन्हीं-कन्नों-से-सुण-रखी-हैं?’

इतना कहने की देर थी कि वो शुरू हो गयी. उसने तुरंत ही दो-चार सनसनीखेज़ किस्से सुना डाले.

उसने बताया कि यहां लोगों ने कई बार छत पर सिपाहियों के परेड करने जैसी आवाजें सुनी हैं. एक अंग्रेज मेम के कॉरीडोर में अक्सर चहलकदमी करते हुए पाये जाने का किस्सा भी सुनाया और एक ऐसी औरत की कहानी भी, जिसकी बेटी पर एक अंग्रेज भूत का साया पड़ गया था.

‘अर्रे आपको पत्ता है… जब भी उस लड़की पर भूत चढ़े था तो वो अंग्रेज्जी में मर्दाणा आवाज़ में अनाप-शनाप बक्कण लगे थी, जबकि उसे अंग्रेज्जी का ‘A’ भी नी आवे था.’

कहानी में विश्वसनीयता लाने के लिए उसकी आवाज और चेहरे के हाव-भाव बदल रहे थे. उसने एक ऐसे परिवार की कहानी भी सुनायी जिसके घर की रसोई से भांडे-बर्तनों के गिरने की आवाजें आती रहती थीं, लेकिन वहां जाने पर किसी को कोई बर्तन गिरा हुआ नहीं मिलता था.

उसने चमरी के पीछे वाले रास्ते का भी ज़िक्र किया, जो हमेशा सुनसान रहता है.

‘यां रात कू हमेशा अँधेरा ही रहवे है. यू एकलौता बलब हमेशा खराब ही मिले है. उसे कित्ता भी ठीक करवा लो… ठीक ही नी होके देत्ता. बिजली विभाग से ठीक करण वाले तो आवे हैं, पर ये चौथ्थे-पांचवे दिन फेर खराब होले है. लोग कहवे हैं इस बलब के खम्बे पे एक भूत रहवे है. इत्ते सालों में मैंने इसे कदी-कदाब ही जला हुआ देखा होगा’, उसने बताया.

जब ज्योति को जितने किस्से पता थे वो बता चुकी तो मैं सोच में पड़ गया. उसकी बातें सुनकर मुझे लगा कि भूतों की ये कहानियां इतनी भी बेसिरपैर की नहीं थीं.

उसे चमरी का इतिहास नहीं पता था और मैंने भी अभी तक उसे कुछ नहीं बताया था. न अंग्रेज सिपाहियों के बारे में और न ही यह कि इस तरह की चमरी में अधेड़ उम्र की गैर-शादीशुदा या विधवा हो चुकीं वे अंग्रेज़ महिलाएं भी रहा करती थीं, जो सरकारी दफ्तरों में कलर्क या नर्स के बतौर काम करती थीं.

इस बीच जब हम भूतों की कहानियों में उलझे पड़े थे तो देखते क्या हैं कि शकील भाई मौक़ा-ए-वारदात से गायब हैं. इधर-उधर देखने पर, वो दूर खड़े नज़र आये.

छितरे बाल, छितरी दाढ़ी; कुछ सफ़ेद, कुछ काली. भरा हुआ चेहरा, रंग गेहुआं. दरम्याना कद, लंबा ढीला-ढाला कुर्ता; कुछ मुचड़ा सा, कुछ इस्तरी किया हुआ. पतलून बदरंग सी. पाँव में जूती सा जूता. एक कंधे पर बस्ता, दूसरे कंधे पर मटमैला सा अंगोछा. बस्ता ठसाठस भरा हुआ, जिसे दूर से देखकर ऐसा लगे मानो पेट से हो.

वे अपने फ़ोन कैमरे से पेड़ों की दनादन तस्वीरें लिए जा रहे थे.

जब हम बातें करते हुए धीरे-धीरे उन तक पहुंचे तो वे पिलखन के ‘फ्लोरोसेंट’ तने पर मुग्ध हुए जा रहे थे और तमाम ‘एंगल्स’ से उसकी तस्वीरें लेने में मशगूल थे. हमने भी देखा और हम भी मुग्ध हुए बिना न रह सके.

फिर उस फ्लोरोसेंट पिलखन के तने को देखकर सहसा ही ईरानी लेखिका शाह्र्नुष परसीपुर के उपन्यास ‘विमेन विदाउट मेन’ के किरदार माहदोख्त की याद ताज़ा हो गयी. मुझे याद आया कि किस तरह माहदोख्त ने ईरानी मर्दाने समाज के दमघोंटू माहौल से बचने के लिए खुद को एक बाग़ में पेड़ की तरह बोने का ख्वाब देखा था:

. . . उसने [माह्दोख्त ने] सोचा कि ‘क्यों न वो ऐसा करे कि वहीँ रुक जाए और जब सर्दियाँ आयें तो खुद को इसी ज़मीन में रोप दे. उसको यह भी ख्याल आया कि कितना अच्छा होता कि अगर उसने पहले से ही किसी ‘दरख्तों के डॉक्टर’ से इस मार्फ़त मशविरा कर लिया होता कि बीजों को रोपने का सबसे सही मौसम कौन सा होता है. यह बात उसे असल में नहीं मालूम थी. फिर उसने सोचा कि जब उसने ठान ही ली थी कि इस बार खुद को बो ही डालना है तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि उसे यह बात पता थी या नहीं. उसे तो हर सूरत में वहां रुकना ही था. अब तक तो वो यह ख्वाब भी देखने लगी थी कि… कैसे एक दिन वो एक नन्ही कली से विशालकाय पेड़ में तब्दील हो जायेगी. वो चाहती थी कि खुद को नदी के किनारे बोये और उसकी पत्तियां, ‘एल्जी’ यानि शैवाल से भी ज्यादा, गहरे हरे रंग की हों; ताकि वो एक दिन तालाब के गहरे हरे रंग को भी मुकाबले के लिए ललकार सके. वो सोचने लगी थी कि धीरे-धीरे, बतौर पेड़, वो एक दिन अपने बीजो को पूरे बाग़ में इस कदर फैला देगी कि वो इतनी फ़ैल जायेगी, इतनी फ़ैल जायेगी कि सब के सब ‘चेरी’ के पेड़ों को उसके लिए जगह बनाने की खातिर काटना पड़ जाएगा और वो – दरख़्त-ए-माह्दोख्त कहलाएगी!

फिर यह पेड़, आहिस्ता-आहिस्ता पूरे महाद्वीप में फ़ैल जाएगा. इस कदर धूम होगी इस पेड़ की… कि एक रोज़ अमरीकी भी इसकी कलियाँ खरीद-खरीद कर ले जायेंगे, कैलिफ़ोर्निया और अन्य ठंडे इलाकों में बोने के लिए. हालांकि, वे इसके नाम का ठीक से उच्चारण नहीं कर पायेंगे और इसे ‘मदोक्त’ कहकर बुलाने लगेंगे.

और फिर जल्दी ही ऐसा होगा कि यह पूरे विश्व भर में इतना फ़ैल जाएगा कि हर जगह इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाने लगेगा. कहीं यह ‘मेडोक’ होगा तो कहीं ‘मदोक’. और फिर चार सदियाँ बीत जाने के बाद एक दिन दुनिया भर के शब्दशास्त्री इस बात पर बड़ी शिद्दत से बहस कर रहे होंगे कि दोनों शब्दावलियों का स्रोत असल में एक ही है, और वह है: ‘मदीक’, जो मूलत: एक अफ्रीकी प्रजाति है. दूसरी तरफ वनस्पति वैज्ञानिक इस दावे को सिरे से ही खारिज कर रहे होंगे कि कैसे एक ठंडे प्रदेश में पाया जाने वाला पेड़, अफ्रीका से हो ही नहीं सकता.

शाह्र्नुष परसीपुर के उपन्यास ‘विमेन विदाउट मेन’ के अंश

तभी शकील भाई ने मेरे कंधे पर थपकी देते हुए कहा, ‘कहां खो गये आप… चलना नहीं है क्या?’ उनके अचानक इस तरह झिंझोड़ देने से मेरे ख्यालों की रेलगाड़ी अब पटरी से उतर चुकी थी. सो मैं उठा और हम आगे बढ़ चले.


पास ही दायीं तरफ एक स्कूल पड़ता है और एक रास्ता बायें मुड़ रहा है. हम उसी में दाखिल हो गये. यह एक छोटी-सी गली है. सामने ही चंद्रलोक बिल्डिंग का चोर दरवाजा और उस तक पहुँचने की सीढ़ियाँ नज़र आ रही हैं, जिससे गुज़र कर हमें उस पार जाना है. इस जगह के बारे में बताने लायक कुछ ख़ास नहीं है, इसलिए इसे हम चुपचाप ही पार कर जायेंगे. बायीं तरफ जो पीर बाबा कमरुद्दीन का मज़ार पड़ता है, उस पर एक बार सिर जरूर झुका लें. यहां के लोगों में वे बहुत बरक़त वाले पीर माने जाते हैं. अब चोर दरवाज़ा आ चुका है. सीढ़ियाँ चढ़ जायें. अधखुले लोहे के गेट को हाथ से थोड़ा ठेल दें. आप अब चंद्रलोक बिल्डिंग के परिसर में हैं. इसे जितनी जल्दी हो सके पार कर लें.

जैसे बार-बार शहर से बाहर, बार-बार शहर में दाखिल हुए बिना नहीं जाया जा सकता, वैसे ही हमें इस बार भी शहर से बाहर जाने के लिए शहर के अन्दर दाखिल होना ही पड़ेगा. सामने जनपथ रोड है. खासी चौड़ी और व्यस्त सड़क. घबराएं नहीं, आगे सड़क के ‘डिवाइडर’ पर लगी रेलिंग टूटी हुई है. आप बस अपने दायें देखें और मौका पाकर सड़क लांघ जाएं. डिवाइडर पर चढ़कर बायें देखें और ‘मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूं इस पार, मेरे मांझी अबकी बार, ले चल पार, ले चल पार’ गुनगुनाते हुए उस पार उतर जाएं. पेट्रोल पंप की बायीं तरफ से सीधे-सीधे चलते जाएं. अब आपके दायीं तरफ थापर बिल्डिंग है और बायीं तरफ कहीं-कहीं से टूटी दीवार; और कुछ पेड़, कुछ बहुत बड़े पेड़. कोने में फिर एक चाय की दुकान. यहां आकर सड़क ‘T’ पॉइंट बना देती है. आपको दायीं तरफ जाना है. यह जनपथ लेन है. यहां थोड़ी चहल-पहल है. चंद दुकानें हैं. चलते जाएं. बायीं तरफ छोटी-छोटी मीनारों और मेहराबों वाली वाली एक इमारत दिखेगी, जिसका गुलाबी रंग अब फीका पड़ चुका है. इसमें, जैसे किसी गुफा का प्रवेशद्वार होता है, वैसा-सा, एक दरवाज़ा है.

‘तू हमें ये कहां हैरी पॉटर’ डोर में घुसा रही है?’

उसने अन्दर धकियाते हुए कहा, ‘चल्लो तो सही….’

दरवाजे के अन्दर झाँका तो एक सुरंग सी नज़र आयी. झुटपुटे का वक्त हो चला था इसलिए थोड़ा अँधेरा सा भी होने लगा था. अन्दर घुसते ही लगा मानो किसी तिलिस्मी दुनिया में दाखिल हो गये हों और किसी भी पल, वहीँ कहीं किसी कोने में बैठे हुए आपको ‘डम्ब्लडोर’ दिख जायेंगे. झुर्रियों से भरे अपने चेहरे पर दोस्ताना मुस्कान के साथ. एक हाथ में जादुई छड़ी थामे और दूसरे हाथ से अपनी सुफैद मखमली दाढ़ी सहलाते हुए.

सुरंग पार करके जब आप बाहर निकलते हैं तो खुद को एक कम्पाउंड में पाते हैं, जहां बड़े-बड़े पेड़ों और बहुत सी वनस्पति के झुरमुट के बीच चंद रिहाइशी मकान बने हैं. वहां दाखिल होते ही एक पल को आपको लगता है मानो सुंदरबन सरीखे वर्षावन के बीच बसा कोई गाँव हो. अपने आस-पास का नज़ारा देख कर जब आप विस्मय में धीरे-धीरे अपनी पलकें झपका रहे होते हैं तो खुद को जैसे किसी जलडमरूमध्य में पाते हैं.

यह निर्वाण के पल को महसूस करने जैसा एहसास है.


उन जादुई पलों से बाहर आते ही आपको पता चलता है कि आप 7, जंतर मंतर के पिछवाड़े में खड़े हैं. थोड़ा सा आगे बढ़ते ही रहा-सहा भ्रम भी टूट जाता है, जब आपकी नज़र अपनी बायीं तरफ बनी इमारत की ओर जाती है.

इस इमारत का इतिहास भी विचित्र रहा है. पिछले कई दशकों से इस बिल्डिंग का कोई खैरख्वाह नहीं फिर भी इसके कई खैरख्वाह बने बैठे हैं. न जाने कितनी सियासी और समाजी तंजीमों के दफ्तर होंगे इसमें. यहां तक कि एक छोटी सी लाइब्रेरी भी चलती है यहां से, जिसमें करीब बीस हजार किताबें हैं. अलग-अलग अखबारों की ख़बरों के हवाले से पता चलता है कि 1969 तक इस पर अविभाजित कांग्रेस पार्टी का कब्ज़ा था. साठ हजार वर्ग मीटर में फैली इस इमारत का प्रांगण भी विशाल है. किसी सरकारी विभाग के पास इसके कागज़ात नहीं मिलते. बहरहाल, इस इमारत को किसने बनवाया इसका ज़िक्र तो अखबारी ख़बरों में नहीं मिलता. अलबत्ता, इतना जरूर पता चलता है कि 1920 में इसे किन्हीं सरदार धरम सिंह को लीज़ पर दिया गया था. बाद में इसे किन्हीं नवाब अब्दुल हसन खान ने खरीद लिया.

जब वे 1947 के बंटवारे के बाद मुल्क छोड़कर पाकिस्तान चले गये तो सरकार ने इसे विस्थापित प्रॉपर्टी घोषित कर दिया. फिर सन 1959 में सरकार ने इसे कोई छ: लाख दस हजार रुपयों में कांग्रेस पार्टी को बेच दिया. इसके ऊपर मिलकियत के सवाल को ले कर कहानी यहां तक तो कुछ हद तक समझ में आती है, लेकिन हो सकता है इसमें कई और भी पेच हों. इसके बाद से तो इस पर कानूनी मालिकाना हक़ की कहानी और भी पेचीदा हो जाती है.

कहते हैं 1969 में कांग्रेस के विभाजन के उस मनहूस दिन की आधी रात को डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा, जो बाद में उपराष्ट्रपति बने, यहां से पार्टी संबंधित बहुत सारे कागज़ात लेकर चम्पत हो गये थे, जिनमें सम्भवत: बिल्डिंग के कागज़ात भी शामिल थे. वे वहां से सीधे इंदिरा गांधी के निवास पर पहुँचे. इसी अफरा-तफरी में इसके कागज़ात कहीं खो गये होंगे, इसका अब क़यास भर ही लगाया जा सकता है.

आप जब सीधे चल रहे होते हैं तो सामने ही इस बंगले का मेन गेट दिखायी देता है. गेट के दायीं ओर बूढ़े बरगद की गोद में एक ढाबा आबाद है. उसकी छटा देखते ही बनती है. ऊँचा, घना एक विशाल दरख़्त. जमीन के एक बहुत बड़े हिस्से को अपनी छाँव की पनाह में लेता हुआ. एक पूरी दुनिया बस सकती है उसके साये में.

यहां से बाहर निकलते ही जंतर-मंतर रोड आ जाता है. यहां आपको विरोध करते लोग मिल जायेंगे. बैठकर देखें कभी इनके साथ. इनकी दास्तान सुनें.

कोई यहाँ बनने वाले बाँध से अपनी लुट जाने वाली दुनिया को बचाने आया है, तो कोई बन चुके बाँध से लुट गयी दुनिया का मुआवजा मांगने. कोई मांग कर रहा है कि सेना उन पर ज़ुल्म ढाना बंद करे, तो कोई कर्ज माफ़ी की गुहार लगा रहा है. कोई अपनी नौकरी बचा रहा है, तो कोई लगवा रहा है. कोई दंगों में हुए नुकसान की भरपाई मांग रहा है, तो कोई दोषियों के लिए सज़ा.

ये प्रजातंत्र की वो प्रजा है जो अपने तंत्र की तलाश में यहां आती है और निराश होकर लौट जाती है. मीर के उस शेर की तरह: ‘उनकी महफ़िल में तो वार नहीं पाता हूं/ दर-ओ-दीवार को अहवाल सुना आता हूं.’


राजेन्द्र सिंह नेगी लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं


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