तन मन जन: कोरोना की दूसरी लहर का कहर और आगे का रास्ता

यदि वैक्सीन लगाने की रफ्तार नहीं बढ़ाई गई तो 70 फीसद आबादी को वैक्सीन लगाने में दो साल से भी ज्यादा का वक्त लग सकता है। एक अनुमान के अनुसार भारत में अब तक लगभग 30 करोड़ लोग कोरोनावायरस की चपेट में आ चुके हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अभी 100 करोड़ लोग कोरोना से संक्रमित नहीं हुए हैं और उन्हें बचाना सबसे बड़ी चुनौती है।

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दक्षिणावर्त: दूसरी लहर में किसके पास इतना नैतिक बल बचा है जो किसी को कुछ कहे?

चार महीनों में क्यों नहीं पत्रकारों ने बिहार के आइसोलेशन-सेंटर्स की फॉलोअप स्टोरी की? एकाध इंडियन एक्सप्रेस ने की, फिर सब खत्म! उस अवधि में दवाओं, अस्पतालों की तैयारी पर फॉलोअप स्टोरी क्यों नहीं हुई?

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पंचतत्व: वनों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों के हाथ में देने से कौन रोक रहा है?

उत्तराखंड की खासियत है कि हर वन पंचायत स्थानीय जंगल के उपयोग, प्रबंधन और सुरक्षा के लिए अपने नियम खुद बनाती है. ये नियम वनरक्षकों के चयन से लेकर बकाएदारों को दंडित करने तक हैं. सरमोली के विर्दी गांव में, जंगल की सुरक्षा के पंचायती कानून के तहत जुर्माना 50 रुपये से 1,000 रुपये तक है.

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बात बोलेगी: वबा के साथ बहुत कुछ आता है और जाता भी है!

महामारी की पैदाइश से लेकर आज की विभीषिका के इतिहास को जब लिखा जाएगा तो उनका भी नाम यहां आना चाहिए जो इसे लेकर आलोचनात्मक और तार्किक नज़रिये से बात करते आए। तब भी उन्हें संख्या बल के सामने हुज्जत झेलनी पड़ी, लेकिन गत एक सप्ताह के दौरान हम देख रहे हैं कि उन्हें लगभग बेइज्जती नसीब हो रही है।

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पंचतत्व: सतभाया का शेष

कानपुरू में 303 घर बचे हैं और उनमें अफरातफरी का, बेचैनी का आलम बना रहता है. पड़ोस के सतभाया गांव में भी परिस्थिति कमोबेश ऐसी ही है. हर साल समुद्र करीब 80 मीटर आगे बढ़ जाता है.

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दक्षिणावर्त: एक चुनाव मैनेजर और कुछ एलीट पत्रकारों के नक्कारखाने से रिसते दुख

यह बात समझने की है कि एपल का एचआर मैनेजर कभी भी स्टीव जॉब्स नहीं बन सकता है, उसी तरह सोशल मीडिया या चुनाव-प्रबंधन करनेवाला व्यक्ति कभी भी नेता की जगह नहीं ले सकता है और अगर नेता में, उसके कैंपेन में दम नहीं है तो कितना भी अच्छा मैनेजर हो, वह कुछ नहीं बिगाड़ या बना सकता है।

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देशान्तर: Tatmadaw को जेनरेशन Z की चुनौती और म्यांमार में लोकतंत्र की कठिन डगर

एक अस्थिर और अशांत म्यांमार इस क्षेत्र में शांति और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए चिंताजनक है और इसके लिए ज़रूरी है कि दुनिया भर के जनतांत्रिक देश और आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन का साथ दें।

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बात बोलेगी: जो संस्थागत है वही शरणागत है!

शादी-ब्याह या किसी सामुदायिक आयोजन में किसे जाना है, किसे बुलाना है, कितनों को बुलाना है जैसे मसले कभी इन संस्थाओं के अधीन नहीं रहे, लेकिन कोरोना महामारी के बहाने राजकीय संस्थागत प्रभावों से मुक्त इस नितांत अनौपचारिक कहे जाने वाले कार्य-व्यवहार को संस्थागत राजनैतिक ढांचे में ला दिया है।

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दक्षिणावर्त: संघ को अब बता ही देना चाहिए कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उसका रोडमैप क्या है!

यह बात कहने में दुःखद कितनी भी लगे, लेकिन संघ के पास लोग नहीं हैं। न तो शीर्ष पर बिठाने लायक, न ही मध्यक्रम के। जितनी भी ऊर्जा है, वह सब प्रारंभिक स्तर पर है, प्रवेश की है और इसीलिए इतनी भगदड़ हो रही है।

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बात बोलेगी: कश्मीर में बैठ के कश्मीर को समझने का अहसास-ए-गुनाह

आखिर को दिल्ली- जिसे देश की राजनैतिक राजधानी का दर्जा प्राप्त है और जिसके वैभव में कश्मीर से कम सभ्यताओं और शासकों के आवागमन का इतिहास दर्ज है- भी ठीक उसी गति को प्राप्त हुई है जिस गति को कश्मीर? क्या वाकई कोई नागरिक प्रतिरोध दिल्‍ली में देखा गया? याद नहीं पड़ता।

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