एक मई: दुनिया भर के धन्नासेठ आज भी जिस दिन से डरते हैं!
अमेरिका में कमजोर पडऩे के बावजूद, दुनिया के हर देश के करोड़ों मजदूर मई दिवस को एक ऐसे दिन के तौर पर मनाते हैं जब वे मजदूर वर्ग के रूप में अपनी मांगों को उठाते हैं।
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अमेरिका में कमजोर पडऩे के बावजूद, दुनिया के हर देश के करोड़ों मजदूर मई दिवस को एक ऐसे दिन के तौर पर मनाते हैं जब वे मजदूर वर्ग के रूप में अपनी मांगों को उठाते हैं।
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ऐसे मौलिक समाधान पेश करने के लिए कायदे से दुनिया को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के प्रति समवेत स्वर में कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए, लेकिन हुआ इसके उलट क्योंकि हसदेव अरण्य में बसे आदिवासी भी प्रामाणिक रूप से छत्तीसगढ़ के नागरिक हैं और वे भी इस दिन की महिमा से परिचित होते ही मुख्यमंत्री के आह्वान पर अपने हसदेव जंगल को, उसकी मिट्टी को, उसकी ज़मीन को, उसके जल को और उसमें बसे वन्यजीवों की रक्षा के लिए सौगंध खाते हैं। यह अनुपालन मुख्यमंत्री को बेचैन कर देता है क्योंकि मिट्टी-पूजन के बहाने वो जंगल उजाड़ने का आह्वान कर रहे थे, लेकिन इस जंगल के आदिवासियों ने उनके आह्वान को वाकई सच्चा मान लिया।
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ऐसे कठिन दौर में मई दिवस हमें रास्ता दिखाता है कि हम चट्टानी एकता कायम करें और अपने वजूद की हिफाज़त के लिए एक ठोस रणनीति बनाएं और संघर्ष करें।
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रोजगार की तलाश में शहरों की ओर गये मजदूर महामारी के डर से, लॉकडाउन से, शहरों की कठिनाइयों से वापस अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। यह दुख ऐसा है कि शायद हमारे लोकगीतों में भी न समा पाये।
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ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।
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इंदौर में श्रम संगठनों, जन संगठनों, कला-संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संगठनों एटक, सीटू, सन्दर्भ, प्रलेस, इप्टा, एन. एफ. आई. डब्ल्यू. और रूपांकन के संयुक्त तत्वाधान में एक अनूठा और सार्थक कार्यक्रम आयोजित किया।
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मजदूरों ने अपने खून से लथपथ कपड़ों को अपनी बस्तियों में घरों के आगे व खिड़कियों पर टांग दिया था। इससे पूरी बस्ती लाल झंडे से शराबोर दिखाई देने लगी। और यहीं से पूरी दुनिया में लाल रंग, लाल झंडा और लाल सलाम हिंसक कार्यवाहियों, दमन व शोषण के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
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मज़दूरों से क्रांति या विरोध की उम्मीद करना. ऐसा कभी इतिहास में नहीं हुआ है. उसके लिए या तो क्रांतिकारी मज़दूर की विशेष पृष्ठभूमि होनी चाहिए या फिर उसे अन्य वर्ग से नेतृत्व मिले.
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क्या तुम्हें लेनिन के बारे में पता है? मुझे पता है। उनके संकलित कार्य 40 अंकों में प्रकाशित हुए हैं, एक का मूल्य 2,000 रुपए है। क्या कभी उनको, अपने भाग्यविधाता को पढ़ पाओगे? इसलिए अभागे हो तुम।
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भारत में पहली बार मजदूर दिवस पहली मई, 1923 को ‘मद्रास’ में ‘मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार’ के नेतृत्व में मनाया गया। एम. सिंगारवेलु ने उसी दिन मजदूर संघ के रूप में ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ की स्थापना की। इस दिन भारत में पहली बार ‘लाल झंडा’ भी इस्तेमाल किया गया।
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