चुनावी पॉलिटिक्स की असाध्य वीणा को यात्रा से साधने की एक कोशिश

भविष्य राहुल गांधी का ही मगर इसके लिए राहुल गांधी को एक लकीर खींचनी पड़ेगी। यह लकीर तब तक नहीं खींच सकते जब तक कांग्रेस के वेटरन चाटुकारों की सरपरस्ती से राहुल खुद को निकाल कर अपनी एक अलग इमेज नहीं बना लेते। यह भारत जोड़ो यात्रा दरअसल राहुल की इमेज बनाने की कवायद ही है।

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‘अंतिका’ का पचपनिया विमर्श: ब्राह्मणों के हाथ से खिसक रही है मैथिली की सत्ता

ये सच है कि मैथिली भाषा पर जिनकी सत्ता है और इस भाषा के सरकारी और गैर सरकारी संस्थान पर जिनका वर्चस्व है वो इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली है। मगर जिस तेजी से मैथिली के सोशल डायनामिक्स का पहिया घूम रहा है तो वो दिन अब दूर नहीं जब मैथिली की सत्ता मैथिल ब्राह्मणों के हाथ से खिसक कर मैथिली भाषा के मूल हकदार बहुजन और दलितों के हाथ में चली जाएगी।

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यह विस्तीर्ण श्मशान है मेरा देश! क्यों?

क्या इतनी मौतें सच में बही-खाते में लिखी थीं? क्या ये मौतें पहले से तय थीं (थोड़ा भाग्यवादी होने की छूट लेते हुए)? एकदम से नहीं. जान बूझ कर मौत-मौत का तांडव और भयानक खेल चल रहा है. कौन रच रहा है ये मौत का खेल?

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क्या लालू और उनकी पार्टी का राजनीतिक शुद्धिकरण कर रहे हैं तेजस्वी?

ऐसा पहली बार है जब बिहार के चुनाव में बात नौकरी और रोजी-रोटी की हो रही है और ये सब उस पार्टी से हो रही है जिसके सरकार पर बिहार में जंगलराज लाने का आरोप लगाया जाता रहा है. अचानक से चुनावी पोस्टर-बैनर और पर्चे से लालू का गायब हो जाना क्या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर राजद में लालू युग का ‘द एंड’ हो गया है?

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मजदूरों के बाद अब कॉरपोरेट, मध्यवर्ग और पैसेवाले भी कहीं सड़क पर न उतर आवें!

अगर लॉकडाउन ही अंतिम सच बनता जाएगा तो खाए-पीए अघाए मिडिल क्लास से लेकर हाइ नेटवर्थ इंडीविजुअल्स से लेकर कॉरपोरेट-उद्योगपति भी सड़कों पर उतर आएंगे

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कामेश्वर-कैलू की ज़िंदगी और मुकेश की मौत में देखिए प्रवासी मजदूरों की पीड़ा का अक्स

कोरोना तात्कालिक एक महासंकट है मगर भूख तो एक स्थायी संकट है. कोरोना का संकट समय के साथ कम होता ही जाएगा, क्योंकि इससे बड़ों-बड़ों को अरबों का जो नुकसान जो हो रहा है और वो नहीं चाहेंगे उनका नुकसान इसी तरह होता रहे.

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