‘अंतिका’ का पचपनिया विमर्श: ब्राह्मणों के हाथ से खिसक रही है मैथिली की सत्ता


मैथिली अब बदल रही है। मैथिली भाषा और साहित्य पर जो संस्कृतनिष्ठ कृत्रिम अभिजात्य और क्लिष्ट पांडित्य थोपा गया था वो अब धीरे-धीरे फिर से लोकोन्मुखी हो रही है। अर्थात मैथिली अपने मूल यानि लोकभाषा की ओर लौट रही है। बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है और ये अपरिहार्य भी है। ये सच है कि मैथिली भाषा पर जिनकी सत्ता है और इस भाषा के सरकारी और गैर सरकारी संस्थान पर जिनका वर्चस्व है वो इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली है। मगर जिस तेजी से मैथिली के सोशल डायनामिक्स का पहिया घूम रहा है तो वो दिन अब दूर नहीं जब मैथिली की सत्ता मैथिल ब्राह्मणों के हाथ से खिसक कर मैथिली भाषा के मूल हकदार बहुजन और दलितों के हाथ में चली जाएगी। और इसके संकेत आने भी लगे हैं। संघर्ष लंबा जरूर है मगर प्रतिसत्ता का मॉडल अपने रूप और आकार को लेने के लिए अकुलाने लगी है। बस जरूरत है इस असली अस्मितावादी विमर्श को मूल मैथिली भाषी बहुजन समाज के वैचारिक अंतस में जाग्रत करने का।   

कैसे मैथिली बदल रही है, कैसे मैथिली संस्कृतनिष्ठ पांडित्य के कृत्रिम चोला को त्याग कर अपने लोकभाषा के मूल रुप में लौट रही है और कैसे मैथिल ब्राह्मणों के संस्कृतनिष्ठ मैथिली से आम जन दूर होते जा रहे हैं, इसे जानना-समझना हो तो आपको पिछले महीने सितंबर में अंतिका प्रकाशन की ओर से फेसबुक पर छह सत्रों में आयोजित पांच दिवसीय ऑनलाइन परिचर्चा (वेबीनार) के वीडियोज़ को देखना चाहिए। अंतिका के इस ऑनलाइन परिचर्चा के सभी वीडियोज़ के रिकॉर्डतोड़ व्यूज़ आए हैं। हाशिया अर्थात दलित बहुजन समाज की भाषा जिसे कुलीन मैथिली भाषी राड़ की भाषा, सोलकन की भाषा कह कर अपमानित करते रहती है, उसी राड़ और सोलकन की भाषा को इस पांच दिवसीय परिचर्चा में मैथिली के भाषाविद्, भाषाविज्ञानी, आलोचक, लेखक, समाजशास्त्री, पत्रकार और शोधार्थियों ने माना है कि राड़ और सोलकन की लोकभाषा ही मैथिली की मूल भाषा है जिसे मिथिला का पचपनिया समाज सदियों से बोलता आ रहा है। सिर्फ लिखने भर के लिए मजबूरी में सभी को संस्कृतनिष्ठ कुलीन मैथिली लिखनी पड़ती है। अंतिका प्रकाशन के इस पांच दिवसीय परिचर्चा/विमर्श का विषय ही था- ‘’वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाज उर्फ पचपनियाक संघर्ष”।

बता देना जरूरी है कि अंतिका के ऑनलाइन परिचर्चा के तीसरे सत्र के वीडियो का व्यूज़ 25 हजार को पार कर चुका है। जबकि चौथे सत्र के परिचर्चा को 20 हजार लोगों ने अभी तक देखा है। वहीं दूसरे सत्र के विमर्श को देखने वाले लोगों की संख्या 15 हजार को पार कर चुका है। मैथिली के किसी भी ऑनलाइन आयोजन को आज तक इतने व्यूज़ नहीं मिले हैं। अंतिका प्रकाशन के ऑनलाइन पचपनिया विमर्श ने ये रिकॉर्ड बनाया है। अंतिका के इस पचपनिया विमर्श के बढ़ते दर्शक और बहुजन समाज में लगातर बढ़ रही स्वीकार्यता से कुलीन मैथिल समाज हतप्रभ है। पचपनिया विमर्श की स्वीकार्यता ने मैथिल ब्राहमण समाज को ऐसी स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया हैं जिसे कहते हैं न निगलते बन रहा है और न उगलते। बेचारे कुलीन ब्राह्मण क्या करे!  उनकी सत्ता जो डगमगा रही है।

यहां एक बात बताना और भी महत्वपूर्ण है कि अंतिका के पचपनिया विमर्श के साथ-साथ और एक दिन बाद मैथिली में एक और आयोजन हुआ था मैथिली साहित्य महोत्सव। ये भी ऑनलाइन आयोजन था। इस फेस्टिवल के भी कई सत्र थे। लेकिन इसके सभी सत्रों के वीडियोज़ के व्यूज़ को भी जोड़ दें तो वो 5 हजार के भी आंकड़े को पार नहीं कर सका है जबकि अंतिका के सिर्फ एक सत्र के वीडियो का व्यूज 25 हजार से भी ज्यादा हो चुका है। मतलब पांच गुना ज्यादा। अगर अंतिका के सभी वीडियो के व्यूज़ को जोड़ दें तो वो मैथिली साहित्य महोत्सव के वीडियोज से 100 गुना ज्यादा हो जाएगा। यहां ये बताना जरूरी है कि ये सभी व्यूज़ ऑर्गेनिक हैं। वीडियो पर कोई पैसा लगाकर बूस्ट कर व्यूज़ नहीं हासिल किया गया है। मैथिली प्रकाशक को कहां से इतना पैसा होगा कि वो पैसा फंसा के वीडियो के बूस्ट कर सके। हां, कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल जिसके बैनर तले मैथिली साहित्य महोत्सव (युवा) का आयोजन किया गया था वो जरूर अपने वीडियो पर पैसा लगाकर यानी बूस्ट कर व्यूज़ हासिल कर सकते थे, मगर उन्होंने भी ऐसा नहीं किया। कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के आयोजकों को कोई पैसे की कमी थोड़े ही है। उनके पास प्रायोजक भी होते हैं। कोरोना से पहले जब उनका फेस्टिवल होता था तो लेखकों को आने-जाने का किराया, होटल के खर्चे से लेकर सम्मानजनक राशि भी दी जाती थी।

अंतिका के पचपनिया विमर्श और मैथिली साहित्य महोत्सव (युवा) के ऑनलाइन मंच के बीच के सामाजिक अंतर का तुलनात्मक अध्ययन करें तो ये बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि क्यों अंतिका के पचपनिया विमर्श को फेसबुक पर हजारों लोगों ने देखा वहीं मैथिली साहित्य महोत्सव के आय़ोजन को फेसबुक पर सौ लोगों ने भी नहीं देखा। अंतर स्पष्ट है अंतिका के पचपनिया विमर्श में दलित बहुजन की विशाल आबादी को मुख्यधारा में ला कर उनके समाज के लेखकों के लिए ही पूरा मंच समर्पित था अर्थात अंतिका का पूरा कार्यक्रम ही दलित-बहुजन समाज के लोगों के जिम्मे था, जबकि मैथिली साहित्य महोत्सव का आयोजन सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मणों का, ब्राह्मणों के द्वारा और ब्राह्मणों के लिए आयोजित था। एक आध सत्र में विध पूरने अर्थात औपचारिकता के लिए दलित-बहुजन समाज के एक-आध लोगों को आमंत्रित किया गया था। 95 फीसदी आबादी दलित बहुजनों की है तो स्वभाविक है उनके लिए आयोजित किए गए अंतिका के कार्यक्रम के व्यूज़ ज्यादा आएंगे ही।

अंतिका के पचपनिया विमर्श में जो सबसे महत्वपूर्ण और आंख खोलने वाली बात सामने आयी वो थी पत्रकार और शोधार्थी अमित आनंद की वो शोधपरक सर्वे और रिपोर्ट जिसमें उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि कुलीन मैथिली जो सदियों से मिथिला की बहुजन संस्कृति को गेहुमन सांप की तरह अपने नागपाश में बांधे हुए थी वो गेहुमन सांप इस धरती से विलुप्त होने के कगार पर है। अर्थात ब्राह्मणों की कुलीन मैथिली बहुत जल्द विलुप्त हो जाएगी। क्योंकि बहुसंख्यक आबादी ब्राह्मणों की संस्कृतनिष्ठ मैथिली न तो पहले कभी बोलती थी और न अब बोलती है। मैथिली कुलीनवर्ग उर्फ उच्चवर्ग उर्फ सवर्ण जो मूलतः मैथिल ब्राह्मण के वर्चस्व का प्रतिबिंब है, वो मिथिला क्षेत्र की आबादी का दस प्रतिशत भी नहीं है। लेकिन कितनी अजीब बात है जो महज 10 प्रतिशत हैं मतलब माइनॉरिटी मे रहते हुए भी वो लोग मिथिला क्षेत्र के 90 फीसदी बहुसंख्यक आबादी को अपना मानते ही नहीं हैं। बहुसंख्यक आबादी को मैथिल ब्राह्मण राड़, सोलकन, पचपनिया, दछिनाहा, पछिमाहा, गुआर, दुसाध, चमार कह के अपमानित करते आ रहे थे और आज भी करते हैं। मैथिल ब्राह्मणों की ओर से दी जाने वाली ये जातिसूचक और इलाका सूचक गालियां रेसिज्म का विलक्षण उदाहरण है।

शोधार्थी-पत्रकार अमित आनंद लिखते हैं कि अखंड मिथिला देश की चर्चा तो अब नहीं होती है लेकिन मिथिला राज्य की चर्चा अभी तो खूब हो रही है। मिथिला राज्य को लेकर मैथिली अभियानी सब देसकोस से ले कर दिल्ली तक खूब आयोजन करते रहते हैं। लेकिन उन्हें इस वास्तविकता से कोई मतलब ही नहीं हैं जो मिथिला है ‘कहां’ तक और मैथिली है ‘कहां’ तक। जाहिर है यहां ‘कहां’ से तात्पर्य है औकात की। अमित आनंद अपने शोध का आधार और प्रस्थान बिंदु भाषाविज्ञानी ग्रियर्सन को मानते हैं लेकिन उससे पहले वो मैथिलों के उस दावे और जमींदारी वाले भौगोलिक नक्शे की भी पूरी पोल- पट्टी खोल देते हैं जिसके मुताबिक मैथिल ब्राह्मण नेपाल के तराई से लेकर झारखंड के संथाल परगना तक मिथिला राज्य का सपना देखते आ रहे हैं। वो लिखते हैं कि आपके इतिहास और आपके दावे के हिसाब से मिथिला मतलब समूचा नेपाल का तराई और इधर चंपारण से लेकर नीचे संथाल परगना तक सब मिथिला है। आज के हिसाब से देखें तो बिहार-झारखंड के 30 जिलें शामिल है इसमें, यथा – पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर, बांका, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़, दुमका और जामताड़ा।

अमित अपने सर्वे में फिर ग्रियर्सन के Linguistic Survey of India 1903 के हवाले से तथ्यों और डेटा के दम पर बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं कि मिथिला किस तरह सिकुड़ कर महज 3-4 जिलों में बस सिमट गई है। कहां 30 जिलों के दावे के दम पर मिथिला राज्य का सपना देखा जा रहा था और कहां धरातल पर तो मिथिला दरभंगा-मधुबनी और बस थोड़ा बहुत सुपौल जिले में ही सिमट कर रह गई है। क्या इतने भर से बन जाएगा मिथिला राज्य?

अमित लिखते हैं कि आज Linguistic Survey of India1903 को एक बार फिर से अपने पूरे संपूर्णता में पढ़ा और समझा जाना चाहिए। क्योंकि उसमें साफ-साफ दिखाई देता है कि वृहत्तर वर्ग की भाषा कौन सी थी और उस समय भी आपके कुलीन मैथिली से ज्यादा राड़, सोलकन या कहें तो पचपनिया और ठेठी मैथिली बोली जा रही थी। Linguistic Survey of India1903 के नक्शे के आधार ग्रियर्सन ने बताया था कि उस मिथिला की आबादी 1 करोड़ थी जिसमें से स्टैंडर्ड मैथिली (कुलीन मैथिली) भाषियों की संख्या 42,46,800 थी, मतलब 42.47 प्रतिशत।  इस स्टैंडर्ड मैथिली अर्थात कुलीन मैथिली के चारो तरफ फैली हुई सघन आबादी जो मैथिली बोलती थी उनकी संख्या थी 57,53,200 मतलब 57.53 प्रतिशत। ये 57.53 फीसदी लोग जो मैथिली बोलते थे वो कौन लोग थे और उनकी मैथिली कौन सी मैथिली थी। ये लोग गैर ब्राह्मण और गैर कर्ण कायस्थ समाज से थे अर्थात बहुजन समाज से थे और इनकी मैथिली थी बहुजन यानी पचपनिया मैथिली। अर्थात भाषायी आधार पर भी बहुजन समाज उस समय भी बहुसंख्यक थे और ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ उनसे कम।

ग्रियर्सन ने उस समय अपने सर्वे के हिसाब से मिथिला का एक नक्शा पेश किया था (चित्र ऊपर देखें)। इसमें नेपाल के तराई के हिस्से को छोड़ दें तो आज के समय के हिसाब से वो आपको अर्थात मैथिल ब्राह्मणों के मिथिला राज्य को उनके दावे के 30 जिलों में से पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, शेखपुरा, लखीसराय आ जमुई को हटा के 25 आपको देते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन उस 25 जिले में से 7 जिलों में से आपको कुछ कांट-छांट के ही दिया जाएगा। जो 7 जिलों का हिस्सा कटता है वो है- मुंगेर का दक्षिण-पश्चिम हिस्सा, किशनगंज और पूर्णिया का पूर्वी हिस्सा और संथाल परगना के छह जिला (देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़, दुमका और जामताड़ा) का आदिवासी बहुल हिस्सा। ग्रियर्सन ने जो ये नक्शा दिया था वो बहुत रियलस्टिक नक्शा था। मैथिली कहां तक बोली जाती थी उसे इस नक्शे में बहुत सुंदर तरीके से कैप्चर किया गया था। एकदम वैज्ञानिक ढंग से कई उदाहरण के साथ। और पचपनिया मैथिली का मूल भी इसी नक्शे में छिपा है।

ग्रियर्सन लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया मे जनगणना के आधार पर 1903 ई. में प्रमाणित करते हैं कि जो चंपारण अब आपका हिस्सा नहीं रहा, वहां अब मधेशी (जिसे वो भोजपुरी की उपबोली कहते हैं) बोली जाती थी। फिर वो लिखते हैं कि वैशाली के पश्चिमी हिस्से और मुंगेर के उत्तरी-पश्चिमी (मतलब आज के लखीसराय, शेखपुरा, जमुई) में मैथिली नहीं बोली जाती थी। मैथिली के बदले वो मगही भाषी क्षेत्र था। ठीक उसी तरह पूरब में वो नोट करते हैं कि किशनगंज और पूर्णिया के पूर्वी हिस्से में मैथिली नहीं बोली जाती थी और वहां बांग्ला की प्रधानता थी औऱ वहां सिरीपुरिया (आज का सूरजपुरिया) बोली जाती थी। ठीक उसी तररह संथाल परगना के पठारी इलाका को वो मिथिला और संथाली/आदिवासी सबों का प्राकृतिक सीमा कहते थे।

ग्रियर्सन का नक्शा ढंग से देखने पर पता चलता है कि (‘Linguistic Survey of India’, 1903 ई. में प्रकाशित है) इसमें वो मैथिली को पांच प्रकार में गिनते थे। स्टैंडर्ड मैथिली (जो ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ बोलते थे), सदर्न (दक्षिणी) स्टैंडर्ड मैथिली (जो बेगुसराय-समस्तीपुर के कुछ हिस्से-खगड़िया-मुंगेर से सटे हुए इलाके के लोग बोलते थे), ईस्टर्न (पूर्वी) मैथिली ऊर्फ गंवारी (जो अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार, भागलपुर के हिस्सा, मधेपुरा से सटे हुए इलाके के लोग बोलते थे), छिक्का-छिक्की मैथिली (भागलपुर का दक्षिणी हिस्सा, बांका-देवघर-दुमका-गोड्डा-साहेबगंज वाला बेल्ट) और वेस्टर्न (पश्चिमी) मैथिली (जो आज वज्जिकाक रूप में है)। इसके अलावे इसमें वो एक और प्रकार जोड़ते थे– जोलहा बोली। जिसके बारे में वो बोलते थे कि जो मैथिल मुसलमान यही जोलहा बोली बोलते थे। मतलब छह रंग की मैथिली।

ग्रियर्सन के हवाले से अमित लिखते हैं कि यदि आप इस छह तरह की मैथिली को सम्मान दिए होते तो संभव था आपके मिथिला राज्य का सपना साकार हुआ रहता। लोगों का कहना है कि अलग मिथिला राज्य का मांग तो सबसे पहले दरभंगा महाराज ने ही किया था। लेकिन जितनी बड़ी उनकी जमींदारी थी और जितना उनका प्रभाव था तो फिर क्यों न मिला मिथिला राज्य?  मिथिला राज्य नहीं मिलने का कारण था मैथिल ब्राह्मणों का श्रेष्ठता भाव जिसके तहत वो चंपारण से लेकर संथाल परगना तक हड़पना चाहते थे और मैथिली के सभी छह डायलेक्ट को खारिज करते हुए सिर्फ दरभंगा-मधुबनी की कुलीन मैथिली को ही सब पर थोपना चाहते थे।

अब आते हैं 2011 के जनगणना पर, जिससे मिथिला और मैथिली दोनों की पोल-पट्टी खुल जाती है। मिथिला राज्य का दावा करने वाले मैथिल ब्राह्मण 30 जिलों पर अपना दावा ठोकते हैं। लेकिन भारत के जनगणना 2011 को ढ़ंग से पढ़ा जाए तो साफ-साफ पता चलता है इस 30 जिलों में से 18 जिला ऐसा है जहां के एक प्रतिशत लोग भी मैथिली नहीं बोलते हैं और न ही उन्होंने मैथिली को अपनी मातृभाषा में लिखा कर दर्ज किया हुआ है। 4 जिला ऐसा है जहां मात्र 1 से 3 प्रतिशत लोग मैथिली को अपनी मातृभाषा मानते हैं। पूरा सी-सीरीज डेटा जनगणना आयोग के वेबसाइट से आप डाउनलोड कर सकते हैं।

मिथिला राज्य के मांग करने वाले मैथिल ब्राह्मणों के दावे के हिसाब से मिथिला राज्य के 30 जिलों में मैथिली बोलने वालों का हाल देखिए और तब फिर बात कीजिए ।

भारत की जनगणना 2011 के आंकड़ों के आधार पर

मतलब मैथिल ब्राह्मणों के दावा किए गए मिथिला मे अब सिर्फ 8 जिला मात्र है जहां मैथिली बोलने वालों का तादाद थोड़ी ठीक-ठाक है लेकिन वहां पर भी आप सौ फीसदी नहीं है। ये जिला हैं- मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया और पूर्णिया। आइए देखते हैं वहां क्या हैं मैथिली की हैसियत।

भारत की जनगणना 2011 के आंकड़ों के आधार पर

अब बड़ा सवाल है कि 30 जिलों में से घट कर कुलीन मैथिली भाषी सिर्फ 8 जिलों में आ कर सिमट गई। इसकी क्या वजह है। वजह साफ है आपने मैथिली के सभी छह बोलियों को अपने परिवार में जोड़ कर कभी नहीं रखा और सभी बोलियों को हेय नजर से देखते थे। नतीजा हुआ कि आपके पश्चिमी सीमे पर वज्जिका को मान्यता देने की मांग और पूरब मे अंगिका को मान्यता देने की मांग जोर पकड़ चुकी है और इसे आप रोक भी नहीं सकते। आज वज्जिका और अंगिका को भले हिंदी की बोली मानी जा रही है लेकिन कुछ ही समय की बात है। जल्द ही दोनों बोली को भाषा की मान्यता मिलेगी और मिलना भी चाहिए। 2011 के जनगणना के आंकड़े को देखें तो इसके मुताबिक वज्जिका भाषी तकरीबन 70 लाख से ज्यादा हैं और अंगिका बोलेने वाले 57 लाख। अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार बेल्ट के लोग अपनी मातृभाषा को ठेठी कहते हैं और उनकी अनुमानित संख्या है 18.64 लाख।  या फिर सूरजापुरी (ग्रियर्सन के मुताबिक सिरपुरिया) जिसके बोलने वालों की अनुमानित संख्या है 18.53 लाख।

देखते रहिए अगले 5 से 10 साल में वज्जिका और अंगिका को मान्यता मिल ही जाना है और उसके बाद हो सकता है ठेठी भी आपसे अलग हो जाएगी अथवा उसे भी अंगिका का हिस्सा मान लिया जाएगा। फिर आप कहीं के नहीं रहेंगे। बस दरभंगा-मधुबनी और सुपौल के ब्राह्मण कायस्थों के पोथी-पंजी में ही सिमट कर रह जाएंगे।


(इनपुट सहयोग- अमित आनंद)


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