भारतीय भाषाएँ, अंग्रेजी और औपनिवेशिक सत्ता के सांस्कृतिक वर्चस्व का सवाल


मानव निर्मित अब तक की सभी तकनीकों में भाषा का अपना अलग ही महत्त्व रहा है, लेकिन इसका एक पक्ष यह भी रहा है कि भाषा के विकास के साथ ही मानवीय शोषण और संघर्ष का भी विकास हुआ। यह संवाद और संचार से इतर शक्ति और सत्ता के खेल का भी सबसे मजबूत हथियार बना। सत्ता के इस खेल में अन्य यूरोपीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा का स्वरूप अधिक दमनकारी रहा।

भारत में दशकों से जो अंग्रेजी की आंधी चली आ रही है वह मूलतः औपनिवेशिक दासता का ही प्रतिबिम्ब है। स्वतंत्रता के उपरांत बनी सरकार रही हो या फिर आज की वर्तमान राष्ट्रवादी होने का दावा करने वाली सरकार, उन्होंने एक तरह से यह मान रखा है कि अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान का अंतिम स्रोत है और शेष भारतीय भाषाएँ अज्ञान और कूपमंडूकता के स्रोत। वर्तमान प्रधानमंत्री हिंदी और अन्य भाषाओँ को विभिन्न मंचों से बोलते रहे हैं, लेकिन अंग्रेजी के प्रति उनमें कोई कुंठा नहीं है ऐसा दावा करना गलत ही होगा, जिसे वे अपने कई अंग्रेजी के भाषणों में दिखा चुके हैं; अपनी हिंदी में भी अंग्रेजी के अनगिनत उन शब्दों का प्रयोग करते हैं जिसके सरल हिंदी शब्द भी खूब प्रचलन में हैं। और सरकारी नीतियों में देखें तो यह मात्र खाना-पूर्ति भर ही दिखायी देता है। साथ ही जिस तीव्रता से निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है और बाजार को अंतिम शक्ति प्रदान की जा रही है ऐसे में कितने भी दावे किये जाएं, कितने भी प्रयास किये जाएं, लेकिन वैश्विक बाजार की भाषा बन चुकी अंग्रेजी के समक्ष भारतीय भाषाएँ स्वतः घुटने टेक देंगी। ये भाषाएँ या तो मरेंगी और अगर जीवित भी रहीं तो सम्मानरहित होकर।

भाषा-चर्चा: तकनीक की ‘अंधाधुन’ गोलीबारी में टूटता हिंदी का संयुक्त परिवार

भाषा व्यापक जनसमुदाय की सामूहिक स्मृति का कोष है। किसी भी भाषा को उस भौगोलिक, सांस्कृतिक अथवा ऐतिहासिक परिदृश्य में रखकर पढ़ा-समझा जाना चाहिए जहां यह उपजती है। इसके संप्रेषक पक्ष को इसके सांस्कृतिक प्रतीकों से अलग कर देखना वस्तुतः उस भाषा की हत्या करने के समान है। जैसे अंग्रेजी भाषा टेम्स नदी से, फ्रेंच एफिल टावर से, इतालवी पीसा की मीनार से, चीनी चीन की दीवार से उसी तरह से भारतीय भाषाएँ भी अपने-अपने परिवेशों से जुड़ी हुई है। भारत की भाषाओँ को भी सिन्धु की गर्जना, गंगा की निर्मलता, हिमालय की विशालता, अजंता और खजुराहों के सौन्दर्य आदि असंख्य सांस्कृतिक प्रतीकों में देखा जाना चाहिए।

न्गुगी वा थ्योंगो

अफ्रीकी लेखक न्गुगी वा थ्योंगो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डी-कोलोनिज़िंग द माइंड’ में भाषा सम्बन्धी राजनीति के बारे में बड़ा विमर्श खड़ा किया था। उन्होंने लिखा कि कैसे औपनिवेशिक भाषाओँ ने अफ्रीका की अनगिनत भाषाओँ को उसके सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत के साथ तहस-नहस कर डाला। यही त्रासदी भारतीय भाषाओँ और समुदायों की भी रही है। थ्योंगो ने लिखा है-

नई भाषा अपनाने के साथ ही हमारी स्वयं की भाषाओँ के साथ अलगाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है, और भाषाई अलगाव महज भाषाई स्तर तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सांस्कृतिक कटाव का सबसे बड़ा कारण बन जाता है।

यही अलगाव सामाजिक विघटन का स्रोत है। भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग है जो अंग्रेजी को एक लोकतान्त्रिक और विश्व-बंधुता की भाषा के रूप में देखता है, लेकिन यह भी एक अकाट्य सत्य है कि अंग्रेजी और अन्य कुछ यूरोपीय भाषाओँ और इसके बोलने वालों ने भारत और विश्व के अन्य समाजों को क्रूरतापूर्ण तरीकों से रौंदा, और इस विजय के लिए भाषा उनका सबसे बड़ा संहारक शस्त्र थी। औपनिवेशिक भाषाओँ ने भारतीय भाषाओँ के साथ-साथ उसके वास्तविक इतिहास और धरोहर को भी कूड़े-कचरे की तरह फेंक डाला। अंग्रेजी और फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली आदि भाषाएँ विजेताओं की भाषा बनीं, जबकि भारतीय भाषाएँ पराजितों की पीड़ा बनकर रह गयी है।

थ्योंगो ने अपने बचपन के मिशनरी विद्यालयों के बारे में लिखा है-

केन्या के जिस विद्यालय में मै पढने गया, वहां हमें एक प्रार्थना सिखायी जाती थी जिसमें अंधकार से मुक्ति की चीख थी। प्रतिदिन प्रातः हमें यूनियन जैक के झंडे के सामने खड़े होकर पहले अपनी शारीरिक स्वच्छता की जांच करानी पड़ती थी और उसके उपरांत समूचा विद्यालय चर्च में प्रवेश कर जाता था जहां हम गाते थे- “चारों तरफ फैले अंधकार से निकलने का हमें प्रकाश दिखाएं, परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करें”… हमारी अपनी भाषाएँ उस अन्धकार का हिस्सा बन गयी थीं। हमारी भाषाओँ का दमन कर दिया गया था, ताकि गुलाम लोग अपने स्वयं के आईने में न तो स्वयं को देख सके और न अपने शत्रुओं को।

निसंस्देह भाषा के माध्यम से दमन की एक तरह से सहमति ले ली गयी थी। अन्तोनियो ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो यह ‘कॉन्सेंट-हेजेमनी’ है। औपनिवेशिक भाषाओँ ने हमारी जीवन-दृष्टि को हमारे ही मुख से अस्वीकृत करवाया, हमारे जीवन मूल्यों को हमसे ही अंधकारपूर्ण कहलवाया।

जिस भाषा में हम प्रतिकार नहीं कर सकते वह हमारी अपनी भाषा कभी नहीं बन सकती। आज अंग्रेजी जीवन दर्शन में पली-बढ़ी पीढ़ियों में प्रतिरोध की संस्कृति के कमजोर होने का भी यह एक बड़ा कारण माना जाता है। बड़ी आसानी से नयी पीढ़ी सड़ी-गली व्यवस्थाओं और बाजारवादी शक्तियों का गुलाम बनती जा रही है। बाजार ने उनकी चेतना का ही औपनिवेशीकरण कर दिया है। वे बाजार की उपलब्धियों को ही अपनी उपलब्धि मान बैठे हैं। बाजार का मुनाफा-केन्द्रित दर्शन मानवीय मूल्यों के दर्शन को कुचल चुका है। मूल भाषा प्रतिरोध की संस्कृति और बेहतर भविष्य का विकल्प रखती है और यही कारण है कि सत्ता परोक्ष रूप से ऐसी भाषा को विकसित होने से रोकती है।

भाषा-चर्चा: अंग्रेजी न जानने की औपनिवेशिक कुंठा हमारी अपनी भाषाओं को मार रही है

उदाहरण के लिए, अठारहवीं सदी में रूसी राजसत्ता ने उक्रेनी भाषा और संस्कृति का दमन करने के लिए उन्हें अपनी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित करने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था। इसी प्रकार औपनिवेशिक शाषन में भारत में वर्नाकुलर प्रेस एक्ट लाया गया था जिसमें भारतीय भाषाओँ में समाचारपत्र निकालने पर प्रतिबन्ध लगाया गया क्योंकि भारतीय भाषाएँ स्वराज की अलख जगाने में अधिक मजबूत माध्यम थीं। इसने वैचारिक-क्रांति की चेतना को विकसित कर दिया था। कोई भी सत्ता वैसे हर विचार का दमन करती है जो उसकी जनविरोधी वैचारिकी का रहस्योद्घाटन करती है।

भाषाई अस्तित्व को बचाने को लेकर यूरोप में भी अनगिनत संघर्ष हुए हैं। एक समय उक्रेन का एक बड़ा भाग गलेशिया नाम से ऑस्ट्रिया के अधिकार में हुआ करता था। वहां पर उक्रेनी भाषा और संस्कृति को दबा कर जर्मन भाषा का प्रभुत्व स्थापित करने का असफल प्रयास किया गया था। इसी तरह हंगरी के प्रमुख नगरों में एक समय में जर्मन का वर्चस्व था, लेकिन वहां भी माग्यार भाषा और जातीयता की पहचान ने जर्मन वर्चस्व को समाप्त कर दिया। भाषाओँ ने कैसे औपनिवेशिक भाषाओँ के सामने समर्पण करने से मना कर दिया ऐसे अनगिनत उदाहरण इतिहास के पृष्ठों में हैं।

हिंदी भाषा पर बातचीत: क्या हिंदी वालों को हिन्दी से प्यार नहीं है?

आज जिस मौलिक चिंतन-दर्शन का प्रलाप भारतीय बौद्धिक समाज कर रहा है- तो ध्यान देना चाहिए कि मौलिकता हमेशा मूल भाषा में ही विकसित होती है। हमारे पास शिक्षा की एक विशाल भ्रमित परियोजना है जिसमें एक तरफ भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कारों की बात की जाती है, और दूसरी तरफ पश्चिम के घनघोर उपयोगितावाद पर टिका आर्थिक और राजनीतिक तंत्र है। इस द्वन्द में कुछ मौलिक भला क्या पनप सकता है! एक भाषा में एक सांस्कृतिक समूह के सैकड़ों वर्षों का अनुभव और ज्ञान निहि‍त होता है और दुर्भाग्य से हमारी पीढियां समय के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से उखडती जा रही है या यूँ कहें कि वे इसके लिए बाध्य हैं।

निश्चय ही अंग्रेजी वैश्विक संचार की भाषा बन चुकी है और इसका विकास होना चाहिए, लेकिन किसी अन्य भाषा की मृत्यु की कीमत पर नहीं, अपितु अन्य सभी भाषाओँ के सम्मानपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ। आज अंग्रेजी के प्रति जो सनक पूरे भारतीय समाज में दिख रही है, ज्ञात हो कि अंग्रेजी को यूरोप में लम्बे समय तक दोयम दर्जे का भी स्थान प्राप्त नहीं था। आज भी दुनिया में जो भी श्रेष्ठ और मौलिक वैचारिक-दार्शनिक चिंतन हो रहा है उसमे अंग्रेजी का स्थान फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, स्पेनिश आदि यूरोपीय भाषाओँ की तुलना में बहुत कम है।

वर्तमान में अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के सन्दर्भ में जहां हैं वहां इसलिए नहीं है कि भारतीय भाषाएँ अपने मूल रूप में प्रतिगामी हैं, बल्कि इसलिए कि एक तरफ उत्पीड़न का इतिहास है और दूसरी तरफ उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का इतिहास। थ्योंगो के शब्दों में कहें तो:

भाषाएँ न तो कभी बूढी होती हैं और न मरती हैं। वे अपनी संरचना में किसी तात्विक दोष के कारण आधुनिक युग के लिए अप्रासंगिक नहीं होतीं। वे तब विलुप्त होती हैं जब समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग के पास उनकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती।

भारत की सभी भाषाएँ- चाहे दक्षिण की भाषाएँ हों या उत्तर की, सभी- अपने में भारत का वृहद् इतिहास और धरोहर के साथ ही श्रेष्ठ ज्ञान-परंपरा को भी समेटे हुए हैं। यह सत्ता पर निर्भर है कि वह इन धरोहरों को सुरक्षित रखना चाहती है या फिर इनकी कब्रों पर अंग्रेजी का महल बनवाना चाहती है, लेकिन नव-उदार होते अर्थ-तंत्र में भारतीय भाषाओँ का भविष्य बहुत अधिक सुरक्षित प्रतीत नहीं होता।


(डॉ. शशिकांत पाठक संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा से सम्बद्ध हैं और डॉ. केयूर पाठक लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)


About डॉ. शशिकांत पाठक I डॉ. केयूर पाठक

View all posts by डॉ. शशिकांत पाठक I डॉ. केयूर पाठक →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *