उदासीनता की महामारी ने सरकार और समाज के खोखलेपन को उजागर कर दिया है

कोरोना महामारी ने हमारे समक्ष प्रवासी कामगारों के सम्बंध में कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिये हैं। इस पर विचार करने की तत्काल आवश्यकता है। सरकारों का उदासीन रवैया सिर्फ इस महामारी की उपज नहीं है।

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कर्नाटक और गुजरात सरकारों का प्रवासी मजदूरों को रोक लेना संविधान की अवमानना है

विदेश से आना तो फिर भी इस अखंड राष्ट्रवादी सरकार ने आसान कर दिया है लेकिन अपने ही देश में अपने ही घर लौटना सबसे ज़्यादा मुश्किल बना दिया गया है।

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राज्य के बरअक्स मुसलमानों का टूट चुका आत्मविश्वास किसकी देन है?

सवाल है कि आख़िर राज्य के हर संसाधन में नागरिक होने के कारण अपनी हिस्सेदारी के एहसास में कमी मुसलमानों में किन वजहों से आयी है? इसके लिए कौन राजनीतिक शक्तियाँ ज़िम्मेदार हैं?

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महाबंदी, महामारी, मज़दूर और मुग़ालते

ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।

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प्रेस की आज़ादी ही लोकतंत्र है!

स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है, विपक्ष के प्रति उदासीनता, सरकारों का निरंकुश और तानाशाही रवैया तोड़ने का काम भी मीडिया ही करती है।

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आला अदालत के आदेश के बाद भी जेलों की भीड़ क्यों नहीं कम की जा रही है?

डॉ. असगरी की दुर्दशा का किस्सा बरबस भारतीय जेल में बन्द एक दूसरे प्रोफेसर की उसी किस्म की स्थिति की तरफ ध्यान आकर्षित करता है, जिनका नाम है प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे

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प्रेस स्वतंत्रता दिवसः नौ महीने से लॉकडाउन कश्मीर के आईने में अभिव्यक्ति की आज़ादी का भयावह सच

हाल ही में जारी 180 देशों के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2020 में भारत 142वें स्थान पर पहुँच गया है, जबकि बीते वर्ष भारत इस सूचकांक में 140वें स्थान पर था।

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COVID-19: भूख का समंदर और बदलती दुनिया के संकेत

देश की सभी सरकारों को चाहिए कि वे देश के सभी इंजन व इसके थक चुके कलपुर्जे, निजी हस्पतालों का फ़ौरन राष्ट्रीयकरण कर इस राष्ट्रीय आपदा के समय हुकूमत चुनाव प्रचार स्टाइल से बचकर टीम इण्डिया बनकर काम करें

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