इतिहास के सिलेबस में UGC का किया ताज़ा बदलाव उर्फ RSS का ‘आइडिया ऑफ भारत’

यह पहली बार हुआ है कि यूजीसी ने पूरे का पूरा पाठ्यक्रम ही नए सिरे से गढ़ने की कोशिश की है, जिसमें से विश्वविद्यालय मात्र 20-30 प्रतिशत की ही काट-छांट कर पाएंगे। इससे पहले यूजीसी सिर्फ कुछ सामान्य निर्देश देता था।

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बिखर गया संतोषी का परिवार, पांच साल पीछे चली गई लीलावती! लॉकडाउन की बरसी पर…

यह ऐसा समय था कि गांव के लोग किसी की भी मदद नहीं करते थे जबकि करोना से पहले गाँव में ऐसा नहीं होता था। लोग एक दूसरे की मदद बडे़ ही सरलता से करते थे, लेकिन यह करोना तो हम मजदूरों की स्थिति को एक दम से झकझोर दिया। हम गरीब मजदूर इस करोना की मार खाकर कम से कम पाँच साल पीछे हो गये।

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पवन ऊर्जा ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र को 110 मिलियन कारों के धुएं से दी निजात

उम्मीद है कि एशिया पैसिफिक क्षेत्र अगले पांच सालों में विंड एनर्जी उत्पादन क्षमता विकास को यूँ ही गति देता रहेगा और 2021-2025 दुनिया की अनुमानित विंड एनर्जी क्षमता की आधी से ज़्यादा अपने नाम कर लेगा, लेकिन GWEC की ताज़ा रिपोर्ट चेतावनी देती है कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अगले दशक में तीन गुना तेज़ी से नई पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करनी होगी।

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UP: जातिगत गोलबंदियों में बंटे पूर्वाञ्चल के मतदाता के पास भाजपा के अलावा क्या कोई विकल्प है?

पूर्वांचल में अतिपिछड़ी और अति दलित जातियों में लोगों के पास कोई खास कृषि योग्य भूमि नहीं है. इसलिए पूर्वांचल की इन बहुसंख्य जातियों के बीच किसान आन्दोलन का यह सवाल ‘जमींदारों का सरकार से संघर्ष’ बनकर बहुत छोटे स्तर पर कैद हो गया है.

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‘आपदा में अवसर’ को भांप लेने का तजुर्बा और मेघालय से आती एक आवाज़!

सत्यपाल मलिक अपने विवादास्पद बयानों के कारण चर्चा में आते रहे हैँ! जम्मू कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने करगिल में एक सभा में विवादित बयान दे दिया था।

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…हिंदी साहित्य में हिंदू नाजीवाद का स्वीकरण: भाग-2

चित्रा मुद्गल ने अनामिका की खूब और जायज़ तारीफ़ की, लेकिन उन्होंने भी माना कि निशंक की किताब नहीं पढ़ी है. जिस किताब को ज्यूरी के मेंबरान ने भी पढ़ने लायक नहीं समझा, वो किताब हिंदी साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार के लिए चयनित अंतिम 13 किताबों के बीच कैसे पहुंच जाती है? क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं?

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यदि आप भगत सिंह के तीसरे रिश्तेदार हैं, तो उनसे सीखने का यह सही वक्त है!

भगत सिंह का तीसरे रिश्तेदार वो है, जो शोषणविहीन समाज का सपना देखते हैं। जिन्हें अन्याय पल भर के लिए बर्दाश्त नहीं। अपने समय को जीते हुए हम किसी बड़े परिर्वतन की जरूरत शिद्दत से महसूस तो कर रहे हैं, शोर और नारों की क्षणिक उत्तेजना के बीच भगतसिंह तक नहीं पहुंचा जा सकता। अवसरवाद और मतलबपरस्त राजनीति के उलट-फेर में फंसे हम लोगों के लिए भगत सिंह के विचार रोडमैप की तरह है। इंकलाब से परिवर्तन तक पहुंचने के लिए पहले भगत सिंह को समझना होगा, सीखना होगा।

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आज के दौर में भगत सिंह को देखने का संदर्भ और दृष्टि क्या हो?

भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है- खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं।

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स्थायी समिति की संस्तुति की रोशनी में ‘भाजपा हराओ’ का नारा कहीं गलत तो नहीं साबित हो गया?

किसान आंदोलन को अब यह भी महसूस करना होगा कि सरकार के अड़ियल रवैये के पीछे उसके सामने मौजूद यह तथ्य भी रहे होंगे कि कम या अधिक पूंजीपतियों की झूठन से अन्य राजनीतिक दलों के हाथ भी गंदे हैं।

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बढ़ता हुआ एकाधिकार लोकतांत्रिक सुधार नहीं, सत्ता के वर्चस्व को स्थायी बनाने का नुस्खा है!

वी डेम की रिपोर्ट में भारत पिछले वर्ष की तुलना में सात स्थानों की गिरावट के साथ कुल 180 देशों में 97वें स्थान पर है। ‘’ऑटोक्रेटाइजेशन टर्न्स वायरल’’ शीर्षक रिपोर्ट में यह संस्थान भारत को थर्ड वेव ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन के अंतर्गत आने वाले देशों में शामिल करता है।

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