अफगानी महिलाओं के लिए क्या गुलामी का नया अध्याय साबित होगी अमेरिकी सेना की वापसी?

करीमी और अन्य युवा महिलाएं जो पार्लर में काम कर रही हैं, उन्होंने कभी तालिबान के शासन का अनुभव नहीं किया, लेकिन वे सभी यह चिंता करती हैं कि अगर तालिबान सत्ता हासिल कर लेता है, तो उनके सपने खत्म हो जाएंगे।

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प्रधानमंत्री राष्‍ट्रव्‍यापी लॉकडाउन के सवाल पर चुप क्यों हैं?

यह दावा कि पहला राष्ट्रव्‍यापी लॉकडाउन अनिवार्य था क्योंकि तब हम वायरस के विषय में कुछ जानते नहीं थे और इस 75 दिन की अवधि का उपयोग हमने तैयारी के लिए किया, जितना कमजोर है उससे भी ज्यादा नामुमकिन प्रधानमंत्री का आज का यह ख्वाब है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था की सेहत भी सुधारेंगे और देशवासियों की सेहत का भी ध्यान रखेंगे।

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एक बीमार स्वास्थ्य तंत्र में मुनाफाखोरी का ज़हर और कोरोना काल का कहर

कोरोना एक त्रासदी के साथ-साथ सबक भी है कि हम अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार में मुनाफा कमाने वाला एक उद्योग न बनायें, बल्कि राष्ट्र को स्वस्थ और मजबूत नागरिक प्रदान करने वाली एक इकाई के रूप में विकसित करें. निजी चिकित्सा संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण किये जाने की सख्त जरूरत है और इलाज के खर्चे का भी एक मानक बनाया जाना चाहिए.

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क्यूबा में कास्त्रो युग का अंत और समाजवाद के भविष्य से जुड़े कुछ सवाल

बीते 19 अप्रैल को कानेल राष्ट्रपति के साथ-साथ क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया यानि फर्स्ट सेक्रेटरी भी बन गए, जैसा कि विगत में फिदेल कास्त्रो और राऊल कास्त्रो थे। यह क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष स्थान है। कानेल से क्‍यूबा के लोगों की अलग अपेक्षाएं हैं।

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ब्रिटेन में रोजगार पैदा करने के लिए एक अरब पौंड का निवेश? ये कैसी देशभक्ति है?

अकेले अप्रैल माह में भारत में कम से कम 75 लाख नौकरियां चलीं गयीं। हक़ीकत यही है कि महामारी के दौरान और मोदी के कुशासन में भारत में कई करोड़ नौकरियां समाप्त हुई हैं। और मोदी हुकूमत का वरदहस्त पाए धन्नासेठ ब्रिटेन में दस हजार करोड़ रूपया निवेश करने वाले हैं ताकि वहां उन्नत तनख्‍वाह वाली ब्रिटिश नौकरियां पैदा हों।

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कोविड से आज ये हाल न होता यदि सरकार ने चेताने वालों की बात सुन ली होती…

फरवरी और मार्च 2021 में जब देश बड़ी तेजी से कोविड-19 की दूसरी लहर की गिरफ्त में आता जा रहा था तब सरकार को इस विषय पर सलाह देने के लिए गठित नेशनल साइंटिफिक टास्क फोर्स ऑन कोविड-19 की कोई बैठक तक आयोजित नहीं हुई।

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मोदी सरकार और स्वास्थ्य का अमेरिकी मॉडल

मोदी सरकार उस अमरीका की नीतियों को भारत में लागू करना चाहती है जो आज़ादी के बाद से ही भारत के विकास में रोड़े अटकाता और पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य की पुरानी सरकारी व्यवस्था में बजट को और बढ़ाने की ज़रूरत थी लेकिन मोदी सरकार सामाजिक सुरक्षा के खर्च में कटौती करके उसे बर्बाद करने में लगी है।

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कोरोना: रोज बनते मौतों के रिकार्ड के बीच अब गांवों से भी निकल रही हैं लाशें

24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के मौक़े पर पंचायत सदस्यों और प्रतिनिधियों के साथ वर्चुअल बातचीत और ‘पुरस्कार वितरण’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत प्रतिनिधियों से कहा- “पिछले साल की तरह इस साल भी कोरोना महामारी को गाँवों तक पहुँचने नहीं देना है”। इस बयान पर आप हंस भी सकते हैं, रो भी सकते हैं और चाहें तो अपना माथा भी पीट सकते हैं।

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चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन अब भी न संभले तो कहीं देश के साथ खेला न हो जाए!

दुनिया के जिन लोकतंत्रों ने तरक्की के नए मुकामों को हासिल किया, वहां नए विचारों का सृजन अनवरत रूप से हुआ। वहां कभी खोखलेपन की भक्ति नहीं की गयी, अंधानुकरण करते हुए ‘नीरो’ को अपना देवता नहीं माना गया।

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प्रेस की आज़ादी का सवाल अब पत्रकार बिरादरी की चौहद्दी के भीतर हल नहीं हो सकता

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

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