प्रेस की आज़ादी का सवाल अब पत्रकार बिरादरी की चौहद्दी के भीतर हल नहीं हो सकता

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

Read More

जनादेश: 2024 की भाजपा-विरोधी पटकथा और ‘निजी महत्त्वाकांक्षाओं’ का सियासी रोड़ा

कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी आने वाले दिनों में स्टालिन, चंद्रबाबू नायडू, तेजस्वी यादव, तेलंगाना के टीआरएस, नवीन पटनायक और उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव के साथ मिलकर एक मोर्चा बना सकती हैं ताकि भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में टक्कर दी जा सके। अभी कई तरह की पटकथा लिखी जानी बाकी है क्योंकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है और इस चुनाव परिणाम ने उसे और कमजोर कर दिया है। सभी दलों के एक साथ आने में सबसे बड़ा रोड़ा उनकी अपनी “निजी महत्वाकांक्षा” है।

Read More

श्रद्धांजलि में ‘श्रद्धा’ ही मूल बात है!

रोहित पेशेवर पत्रकार नहीं थे। अगर होते तो उसकी पहली कसौटी यही होती कि सत्तापक्ष से उन्‍हें इतना संरक्षण न मिला होता। इसकी पुष्टि रोहित के तमाम धतकर्म भी करते हैं जो उन्होंने पत्रकार के रूप में किये। पत्रकारिता उनका पेशा था, वो पेशेवर पत्रकार नहीं थे। यह भेद ही उन्हें रोहित सरदाना बनाता था।

Read More

क्या कोविड-19 का अंतराल अध्यापकों के लिए नया अंधेरा लेकर आया है?

चुनाव में तैनात शिक्षकों के प्रशिक्षण से लेकर चुनाव किस तरह संपन्न कराए गए, अगर किसी ने इन्हें देखा होता तो वह बता सकता है कि राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इन चुनावों के दौरान कितनी लापरवाही एवं बेरुखी का परिचय दिया।

Read More

‘मुफ़्त वैक्सीन’ का भ्रामक जुमला और सरकार की नीयत का मसला

एक ओर तो कई राज्य सरकारें इस बात का वादा कर चुकी हैं कि उनके राज्य में टीका मुफ़्त लगाया जाएगा। दूसरी तरफ़ टीके की एक बड़ी खेप निजी अस्पतालों को देने का प्रावधान किया गया है।

Read More

महामारी के बीच सम्पन्न हुए चुनाव, लेकिन चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका पर बात बाकी है!

जिस तरह से मद्रास हाईकोर्ट द्वारा चुनाव आयोग पर की गई तल्ख टिप्पणियों को मीडिया में स्थान मिला है और जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा इनका स्वागत किया गया है इससे यह स्पष्ट होता है कि आम जनमानस भी कोविड-19 की दूसरी लहर के प्रसार के लिए चुनाव आयोग के अनुत्तरदायित्वपूर्ण आचरण को उत्तरदायी समझता है।

Read More

लाशों की पिच पर दम तोड़ती मानवता का 20-20 खेल

जब लोग एक-एक सांस के लिए जूझ रहे हैं और अपने परिजनों को बचाने के लिए शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक ऑक्सीजन सिलेंडर और वैंटीलेटर की व्यवस्था की ख़ातिर दौड़ रहे होते हों तो उस दौरान क्या उन्हें किसी मनोरंजन की याद भी आ सकती है?

Read More

यह विस्तीर्ण श्मशान है मेरा देश! क्यों?

क्या इतनी मौतें सच में बही-खाते में लिखी थीं? क्या ये मौतें पहले से तय थीं (थोड़ा भाग्यवादी होने की छूट लेते हुए)? एकदम से नहीं. जान बूझ कर मौत-मौत का तांडव और भयानक खेल चल रहा है. कौन रच रहा है ये मौत का खेल?

Read More

विफल नेतृत्व की गलतियों का असर कम करने के लिए कब तक त्याग करती रहेगी जनता?

प्रधानमंत्री जी ने इस भीषण संकट काल में भी अपने मन की बात ही की। हो सकता है कि उनके काल्पनिक भारत की आभासी जनता को उनका यह एकालाप रुचिकर लगा होगा, लेकिन मरते हुए रोगियों और उनके हताश परिजनों के लिए तो यह एक क्रूर परिहास जैसा ही था।

Read More

महामारी की दूसरी लहर में भी उपेक्षित छात्र समुदाय पर बात कब होगी?

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को भी ‘परीक्षा पर चर्चा’ जैसे खोखले प्रवचन से आगे बढ़कर छात्र समुदाय के हित में कुछ ज़रूरी कदम उठाने चाहिए जो असल में उनके काम आएं। सरकार को आगे आकर ‘देश के भविष्य’ को बचाने की सख़्त ज़रूरत है।

Read More