श्रद्धांजलि में ‘श्रद्धा’ ही मूल बात है!
रोहित पेशेवर पत्रकार नहीं थे। अगर होते तो उसकी पहली कसौटी यही होती कि सत्तापक्ष से उन्हें इतना संरक्षण न मिला होता। इसकी पुष्टि रोहित के तमाम धतकर्म भी करते हैं जो उन्होंने पत्रकार के रूप में किये। पत्रकारिता उनका पेशा था, वो पेशेवर पत्रकार नहीं थे। यह भेद ही उन्हें रोहित सरदाना बनाता था।
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