प्रधानमंत्री राष्‍ट्रव्‍यापी लॉकडाउन के सवाल पर चुप क्यों हैं?

यह दावा कि पहला राष्ट्रव्‍यापी लॉकडाउन अनिवार्य था क्योंकि तब हम वायरस के विषय में कुछ जानते नहीं थे और इस 75 दिन की अवधि का उपयोग हमने तैयारी के लिए किया, जितना कमजोर है उससे भी ज्यादा नामुमकिन प्रधानमंत्री का आज का यह ख्वाब है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था की सेहत भी सुधारेंगे और देशवासियों की सेहत का भी ध्यान रखेंगे।

Read More

एक बीमार स्वास्थ्य तंत्र में मुनाफाखोरी का ज़हर और कोरोना काल का कहर

कोरोना एक त्रासदी के साथ-साथ सबक भी है कि हम अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार में मुनाफा कमाने वाला एक उद्योग न बनायें, बल्कि राष्ट्र को स्वस्थ और मजबूत नागरिक प्रदान करने वाली एक इकाई के रूप में विकसित करें. निजी चिकित्सा संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण किये जाने की सख्त जरूरत है और इलाज के खर्चे का भी एक मानक बनाया जाना चाहिए.

Read More

क्यूबा में कास्त्रो युग का अंत और समाजवाद के भविष्य से जुड़े कुछ सवाल

बीते 19 अप्रैल को कानेल राष्ट्रपति के साथ-साथ क्‍यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया यानि फर्स्ट सेक्रेटरी भी बन गए, जैसा कि विगत में फिदेल कास्त्रो और राऊल कास्त्रो थे। यह क्‍यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का शीर्ष स्थान है। कानेल से क्‍यूबा के लोगों की अलग अपेक्षाएं हैं।

Read More

ब्रिटेन में रोजगार पैदा करने के लिए एक अरब पौंड का निवेश? ये कैसी देशभक्ति है?

अकेले अप्रैल माह में भारत में कम से कम 75 लाख नौकरियां चलीं गयीं। हक़ीकत यही है कि महामारी के दौरान और मोदी के कुशासन में भारत में कई करोड़ नौकरियां समाप्त हुई हैं। और मोदी हुकूमत का वरदहस्त पाए धन्नासेठ ब्रिटेन में दस हजार करोड़ रूपया निवेश करने वाले हैं ताकि वहां उन्नत तनख्‍वाह वाली ब्रिटिश नौकरियां पैदा हों।

Read More

कोविड से आज ये हाल न होता यदि सरकार ने चेताने वालों की बात सुन ली होती…

फरवरी और मार्च 2021 में जब देश बड़ी तेजी से कोविड-19 की दूसरी लहर की गिरफ्त में आता जा रहा था तब सरकार को इस विषय पर सलाह देने के लिए गठित नेशनल साइंटिफिक टास्क फोर्स ऑन कोविड-19 की कोई बैठक तक आयोजित नहीं हुई।

Read More

मोदी सरकार और स्वास्थ्य का अमेरिकी मॉडल

मोदी सरकार उस अमरीका की नीतियों को भारत में लागू करना चाहती है जो आज़ादी के बाद से ही भारत के विकास में रोड़े अटकाता और पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य की पुरानी सरकारी व्यवस्था में बजट को और बढ़ाने की ज़रूरत थी लेकिन मोदी सरकार सामाजिक सुरक्षा के खर्च में कटौती करके उसे बर्बाद करने में लगी है।

Read More

कोरोना: रोज बनते मौतों के रिकार्ड के बीच अब गांवों से भी निकल रही हैं लाशें

24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के मौक़े पर पंचायत सदस्यों और प्रतिनिधियों के साथ वर्चुअल बातचीत और ‘पुरस्कार वितरण’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायत प्रतिनिधियों से कहा- “पिछले साल की तरह इस साल भी कोरोना महामारी को गाँवों तक पहुँचने नहीं देना है”। इस बयान पर आप हंस भी सकते हैं, रो भी सकते हैं और चाहें तो अपना माथा भी पीट सकते हैं।

Read More

चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन अब भी न संभले तो कहीं देश के साथ खेला न हो जाए!

दुनिया के जिन लोकतंत्रों ने तरक्की के नए मुकामों को हासिल किया, वहां नए विचारों का सृजन अनवरत रूप से हुआ। वहां कभी खोखलेपन की भक्ति नहीं की गयी, अंधानुकरण करते हुए ‘नीरो’ को अपना देवता नहीं माना गया।

Read More

प्रेस की आज़ादी का सवाल अब पत्रकार बिरादरी की चौहद्दी के भीतर हल नहीं हो सकता

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

Read More

जनादेश: 2024 की भाजपा-विरोधी पटकथा और ‘निजी महत्त्वाकांक्षाओं’ का सियासी रोड़ा

कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी आने वाले दिनों में स्टालिन, चंद्रबाबू नायडू, तेजस्वी यादव, तेलंगाना के टीआरएस, नवीन पटनायक और उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव के साथ मिलकर एक मोर्चा बना सकती हैं ताकि भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में टक्कर दी जा सके। अभी कई तरह की पटकथा लिखी जानी बाकी है क्योंकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है और इस चुनाव परिणाम ने उसे और कमजोर कर दिया है। सभी दलों के एक साथ आने में सबसे बड़ा रोड़ा उनकी अपनी “निजी महत्वाकांक्षा” है।

Read More