गोवा: चौपट धंधा, सूने पड़े बीच और ओमिक्रॉन के साये में चुनावी पर्यटकों के सियासी करतब

खूबसूरत समुद्री किनारोंवाला गोवा सभी को लुभाता है लेकिन कोरोना की कसक के बीच खराब आर्थिक हालात से लोग हैरान हैं। धंधा चौपट है, फिर भी चुनाव तो होना ही है, सो दुष्कर हालात में भी गोवा अपनी राजनीति के नये प्रतिमान गढ़ने की तरफ बढ़ रहा है।

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मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के अचानक उमड़े आदिवासी प्रेम के पीछे क्या मामला है?

मनावर से कांग्रेस विधायक और जसय के संस्थापक हीरालाल अलावा के अनुसार राज्य सरकार ने औपचारिकता के नाते जनप्रतिनिधियों से पेसा नियम पर सुझाव और आपत्तियां बुलायी तो थीं मगर उन्हें शामिल नहीं किया गया। भाजपा के आदिवासियों पर अचानक उमड़े प्रेम को वे राजनीति से प्रेरित बतलाते हैं।

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संविधान दिवस की गूंज और लोकतंत्र को कमजोर करने के सुनियोजित प्रयास

संवैधानिक प्रजातंत्रों पर संकट विश्वव्यापी है- ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, पोलैंड, हंगरी, तुर्की और इजराइल इसके उदाहरण हैं, लेकिन इन देशों की तरह हमारे देश में न तो आपातकाल लगा है न ही सेना सड़कों पर गश्त कर रही है, न ही नागरिक अधिकारों को निलंबित रखा गया है बावजूद इसके हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र पर संकट है।

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संविधान पर चल रहे विमर्श के निहितार्थ

क्या संविधान से हमें कुछ हासिल नहीं हुआ? जब हमारे साथ स्वतंत्र हुए देशों में लोकतंत्र असफल एवं अल्पस्थायी सिद्ध हुआ और हमारे लोकतंत्र ने सात दशकों की सफल यात्रा पूरी कर ली है तो इस कामयाबी के पीछे हमारे संविधान के उदार एवं समावेशी स्वरूप की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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हर जनसंहार दास्तान-ए-लापता है! भोपाल गैस कांड की याद में एक कविता, एक शिल्प

2-3 दिसंबर, 1984 को घटित इस जघन्य कांड के पचीसवें वर्ष प्रकाश चन्द्रायन ने ‘राष्ट्रीय स्मृतिलोप’ शीर्षक से लंबी कविता रची और गोपाल नायडू ने एक मूर्तिशिल्प ‘भोपाल गैस काण्ड’ शीर्षक से रचा था। कविता 2017 में जारी हुई।

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जातिगत भेदभाव का शिकार जेलों में पिसते दलित और पिछड़े वर्ग के कैदी

जिन मामलों में गिरफ्तारी किये बिना छानबीन पूरी हो सकती हो वहां आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों में भी यही हिदायत दी गयी थी।

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किसान अन्दोलन का एक साल: प्राप्तियों का मूल्यांकन

संयुक्त किसान मोर्चा एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है जिसका राजनीतिक दल अभी मूल्यांकन नहीं कर पा रहे हैं। किसान अन्दोलन ने जहां एक ओर जनता को उनकी ताकत का अहसास करवा दिया है तो दूसरी ओर सत्‍ता की जवाबदेही को भी सुनिश्चित कर दिया है।

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नये श्रम कानूनों के खिलाफ मजदूरों की आवाज क्या सरकार के कान में पड़ रही है?

हरियाणा श्रम मसौदा 2021 जो कायदे से अक्टूबर 2021 में लागू होना चाहिए था पर कुछ माह रुक कर उसे पूरे राज्य में लागू कर दिया जाएगा। सरकार ने मसौदा पेश करते हुए कहा कि इससे मजदूरों के हितों की रक्षा होगी, वे ज्यादा कमाई कर सकेंगे, उनका रोजगार सुरक्षित होगा। कुल मिलाकर वही झुनझुने बजाए जा रहे हैं जो कृषि कानून लाते समय बजाए गए थे। दिक्कत ये है कि जब से मसौदे की बारीकियां श्रमिकों के कानों में पड़नी शुरू हुई हैं तब से बस विरोध हो रहा है।

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मूल्य आधारित पत्रकारिता की पांच दशक से बह रही ‘बयार’ में ठिठका एक अपार दुख

पता नहीं बयार कार्यालय की भौतिक रूप से टिमटिमाती रोशनी से उपजता पवित्र, आत्मीय और आत्मिक उजियारा अब हमारा पथ प्रदर्शन करेगा या नहीं। शोक संतप्त सुभाष भैया अपने जीर्ण शरीर और विदीर्ण हृदय के साथ “बयार” की यात्रा को अनवरत रख पाएंगे या नहीं।

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किसान आंदोलन गवाह है कि गांधीजी की अहिंसा ही इस देश में सबसे कारगर और उपयोगी रास्ता है!

जब हम लोग गांधी के रास्ते पर ही चल सकते हैं तो हमें इस बात को खुलकर स्वीकार करना चाहिए। जब हम जान रहे हैं कि गोली चला कर या बम फेंककर अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ जा सकता, सिर्फ शहीद हुआ जा सकता है, तो फिर हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी का रास्ता बाकी के लोगों के रास्ते से ज्यादा कारगर और उपयोगी था।

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