असली देशभक्ति क्या है? महामारी के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद की याद
स्वामी जी द्वारा तय किये गये देशभक्ति के पैमाने पर उन पर दावे करने वाली और उनके नाम की माला जपने वाली संस्थाएं कहां खड़ी नजर आती हैं?
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स्वामी जी द्वारा तय किये गये देशभक्ति के पैमाने पर उन पर दावे करने वाली और उनके नाम की माला जपने वाली संस्थाएं कहां खड़ी नजर आती हैं?
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रोजगार की तलाश में शहरों की ओर गये मजदूर महामारी के डर से, लॉकडाउन से, शहरों की कठिनाइयों से वापस अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। यह दुख ऐसा है कि शायद हमारे लोकगीतों में भी न समा पाये।
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श की राजधानी दिल्ली की स्थिति और भी भयावह है, जो लगातार बद से बदतर होती जा रही है। दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से लोग छटपटा कर दम तोड़ रहे हैं। मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ऑक्सीजन के साथ एक अदद बेड की तलाश में भटक रहे हैं।
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लेनिन को याद करने का अर्थ सिर्फ मजदूर क्रांति के सपने को साकार करना नहीं है। अपने समाज को समझने का रास्ता भी है। राज्य की प्रकृति समझना है तो लेनिन को जरूर पढ़िए।
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गांव का शोषण, बदहाली और उपेक्षा यूं ही बदस्तूर जारी रहा तो क्या वह दिन दूर है जब हम दिल्ली, मुंबई के प्रवासी बन कर जीवन बिताने को मजबूर लोग वापस गांव की ओर लौटना चाहें और कहीं कोई गांव ही ना बचा हो तो?
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सुनने में ये जगह एक फेमिनिस्ट यूटोपिया की तरह लगती है लेकिन पितृसत्ता की धुरी के सहारे चलने वाली इस दुनिया में ऐसी एक जगह है जहाँ एक गाँव उसी सपने को लेकर जी रहा है जिसके ख़्वाब दुनिया भर की ना जाने कितनी औरतों की आँखों में हैं।
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मेरी भी इच्छा थी कि यदि मैं लिख दूंगा तो यह बातें आप तक भी पहुंच जायेंगी। सर, मेरी इच्छा रहती है कि मैं आपको अपना लिखा हुआ पढ़कर सुनाऊं और आप कहें कि ”तुम्हारी चिट्ठी सुनने का सुख मिला।”
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जैसे बोली से पता चलता है कि इंसान सभ्य है या असभ्य, पढ़ा-लिखा है अनपढ़। यह वर्गीय विभाजन गाली में भी है। पढ़ा लिखा शुद्ध भाषा में गाली देगा जबकि बिना पढ़ा-लिखा बेचारा ठेठ देशज अंदाज में गाली देता है।
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हमारे पड़ोस की ग्रामसभा में पिछली दो बार महिला प्रधान थीं लेकिन चुनाव प्रचार से लेकर सारे काम पति महोदय ने किया और एक साल तक तो अधिकारियों को भी नहीं पता था कि फ़लाँ प्रधान नहीं बल्कि प्रधान पति हैं। और गाँववाले तो आज तक ‘पति’ को प्रधान समझते हैं।
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‘लोगों के लिए’ होने की पहली शर्त है ‘लोगों के द्वारा’ होना। किसी भी संस्था को अपने स्वरूप में लोकतांत्रिक होने के लिए उसमें हर एक वर्ग, जाति, समुदाय की …
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