हरियाणा: लोकतंत्र बचाने के नाम पर सत्ता को बचाने का भाजपाई अभियान


भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में 22 अक्टूबर से 5 नवंबर 2026 के बीच ‘लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ’ अभियान की घोषणा की थी। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत पदयात्राएं शुरू हुई हैं। इस अभियान पर सवाल उठ रहा है कि देश की सत्तारूढ़ पार्टी को लोकतंत्र बचाने का नारा लेकर सड़क पर उतरने की आवश्यकता आखिर क्यों महसूस हुई?

सवाल यह भी है कि भाजपा की अपनी राजनीतिक और राजकाज की कार्यशैली लोकतंत्र बचाने के उसके नारे से क्‍या मेल खाती है? इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विरोधाभास यह है कि जिस पार्टी के पास केंद्र में सरकार, संसद में प्रभावशाली संख्या, अनेक राज्यों में सत्ता और व्यापक प्रशासनिक तंत्र का राजनीतिक प्रभाव है तथा देश के बड़े पूंजीपतियों का सीधा समर्थन है, वही लोकतंत्र को खतरे में बताकर जनता के बीच अभियान चला रही है?

हरियाणा में भाजपा का अभियान 22 अक्टूबर से शुरू हुआ था। पार्टी ने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाने का आरोप लगाया। फिर विपक्षी इंडी गठबंधन ने दिल्ली के रामलीला मैदान में कथित वोट चोरी और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर बड़ी रैली की। उसी दिन भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने हरियाणा के रोहतक में पदयात्रा कर के पार्टी के देशव्यापी अभियान को और विस्तार दिया। अमित शाह सहित वरिष्ठ नेताओं की पदयात्राएं निर्धारित की गईं। दो दिन पहले 5 नवंबर को अमित शाह ने करनाल में इस अभियान के तहत पदयात्रा की।



लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, चुनावी प्रक्रिया पर आपत्ति करना, प्रदर्शन करना और जवाबदेही मांगना संवैधानिक अधिकार हैं। यदि इन गतिविधियों को ‘अराजकता’ का नाम दे दिया जाए, तो सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज को संदेह के घेरे में खड़ा करना आसान हो जाता है। भाजपा अपने पूरे शासनकाल में असहमति की आवाजों और जवाबदेही की मांग करने वालों को भिन्न-भिन्न खांचों में डालती रही है- देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, खान मार्केट गैंग, आन्दोलनजीवी, अर्बन/दिमागी नक्‍सल, आदि भाजपा द्वारा गढ़े गए अलंकार हैं। इनसे लोकतंत्र को ‘खतरे में’ बताना हमेशा से भाजपा के राजनीतिक प्रचार का पुराना और परिचित हथियार रहा है।

विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (एसआइआर) को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इससे भाजपा के सामने एक चुनौती खड़ी हो गई है। यदि चुनावी निष्पक्षता का प्रश्न व्यापक जनचर्चा बन जाता है तो इसका प्रभाव केवल चुनाव आयोग की छवि पर नहीं, बल्कि चुनावी जनादेश की स्वीकार्यता पर भी पड़ सकता है। भाजपा इसलिए विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ चुनाव आयोग और एसआइआर  प्रक्रिया का सार्वजनिक बचाव करने के लिए उतर  गई है।

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसका विश्वास और निष्पक्षता किसी एक राजनीतिक दल के समर्थन पर निर्भर नहीं होना चाहिए। लेकिन जब सत्तारूढ़ दल चुनाव आयोग के बचाव को अपना राजनीतिक अभियान बना लेता है, तो एक अलग सवाल पैदा होता है कि संस्थागत निष्पक्षता को आखिर राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता क्‍यों पड़ रही है।

लोकतंत्र में असहमति कोई अव्यवस्था नहीं है। असहमति लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। विपक्ष यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, मतदाता सूची में गड़बड़ियों की शिकायत करता है या मुख्य चुनाव आयुक्त से जवाब मांगता है, तो उसका तथ्यों के आधार पर न्यायसंगत जवाब मिलना चाहिए। सवाल यह है कि क्या चुनावी पारदर्शिता की मांग करना अराजकता है? क्या सत्ता से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना है? चुनाव आयोग, न्यायपालिका, संसद और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता उनकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनती है लेकिन उनकी आलोचना को लोकतंत्र के विरुद्ध षड्यंत्र बताना भी उचित नहीं है। यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी है तो उसके बारे में उठने वाले सवालों का जवाब दस्तावेजों, आंकड़ों और स्वतंत्र जांच से क्यों नहीं दिया जा रहा?

भाजपा केंद्र में सत्ता में है। उसके पास शासन चलाने, प्रशासनिक निर्णय लेने और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए राजनीतिक तथा संस्थागत जिम्मेदारी है। संसद में विपक्ष को पर्याप्त चर्चा और असहमति के अवसर सीमित कर दिए गए। संसदीय समितियों की भूमिका कितनी प्रभावी है इसका कोई आकलन सार्वजनिक नहीं है। विपक्ष-शासित राज्यों के प्रति केंद्र सरकार का व्यवहार कितना संघीय और निष्पक्ष है इस पर राज्यों के महामहिम राज्यपाल की भूमिका और चुनी हुई सरकार के कार्य में दखल के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे हैं।


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सरकारी नीतियों की आलोचना, चुनावी चंदे, राजनीतिक वित्तपोषण और चुनावी पारदर्शिता में कितनी जवाबदेही है इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना लोकतंत्र बचाने का दावा अधूरा है। भाजपा ने इस अभियान में विपक्ष को अराजकता फैलाने वाला बताया है, लेकिन लोकतंत्र किसी सरकार, पार्टी या नेता की राजनीतिक प्रतिष्ठा का दूसरा नाम नहीं है। यदि किसी राजनीतिक दल के लिए सरकार का विरोध करना, चुनाव आयोग से सवाल पूछना या सत्ता की नीतियों की आलोचना करना अराजकता बन जाए, तो लोकतंत्र और सत्ता के बीच का अंतर ही समाप्त होने लगता है। विपक्ष के वोट चोरी और चुनाव आयोग से जुड़े आरोपों का मुकाबला आयोग के बजाय भारतीय जनता पार्टी करना चाहती है।

संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की प्रभावी भागीदारी, नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और विरोध का सम्मान और संघीय व्यवस्था एवं राज्यों के अधिकारों और निर्वाचित सरकारों का सम्मान राजनीतिक जवाबदेही और सत्ता के निर्णयों पर सार्वजनिक जवाब आवश्यक तत्व है। लोकतंत्र में सत्ता को बचाना और लोकतंत्र को बचाना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है, न ही सत्ता पक्ष उसका अकेला संरक्षक है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा लोकतंत्र को बचाने निकली है या लोकतंत्र की ऐसी परिभाषा स्थापित करना चाहती है जिसमें सत्ता का विरोध करना ही अराजकता माना जाए? भाजपा के इस पूरे अभियान में राजनीतिक और संवैधानिक विरोधाभास मूल है।



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