शब्द सृजन करते हैं, वे हत्या का हथियार नहीं हो सकते: प्रो. गणेश देवी


प्रगतिशील लेखक संघ का 14वाँ राज्य सम्मेलन 24-25 अक्टूबर को इंदौर के अभिनव कला समाज सभागृह में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में देश और प्रदेश के 150 से अधिक लेखकों ने शिरकत की। दो दिनों तक चले विभिन्न सत्रों में अनेक महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर विचार मंथन हुआ और अंतिम दिन प्रलेस की कार्यकारिणी का गठन हुआ।

सम्मेलन की पूर्व संध्या पर करीब 80 लेखक प्रतिनिधि आ चुके थे। उनके स्वागत में कबीर जन विकास समूह की ओर से विक्रम बोर्डिया और उनके साथियों ने मालवी शैली में कबीर गायन की प्रस्तुति दी। सम्मेलन के पहले दिन 24 अक्टूबर के मुख्य अतिथि थे प्रख्यात भाषाविद्, लेखक और सोशल ऐक्टिविस्ट गणेश देवी। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि शब्द तो सृजन का माध्यम हैं। शब्दों से यह सृष्टि बनी  है, यह कभी भी नफरत और हत्या के हथियार नहीं होना चाहिए। शब्दों के प्रति निष्ठा और प्रेम रखकर ही हमें अपनी लड़ाई जारी रखना होगी।

उन्होंने सवाल उठाया कि राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी,  टैगोर,  महात्मा फुले, इन सब में हम ही लोग तो थे फिर यह नफरत का तूफान अचानक कहां से आ गया। गणेश देवी ने भारत  के  स्वतंत्रता आंदोलन को खंगालते हुए बताया कि लोकतंत्र विरोधी, नफरत फ़ैलाने वाली शक्तियां उस दौर में भी सक्रिय थीं जो हिटलर-मुसोलिनी से प्रेरणा ले रही थीं। गणेश देवी के करीब एक घंटे के भाषण को श्रोताओं ने  बेहद धैर्य और शांति से सुना।  सत्र का संचालन विनीत तिवारी ने किया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र का विषय था ‘प्रतिरोध का अतीत और वर्तमान की चुनौतियां’। इस विषय पर प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव, चंडीगढ़ से आए सुखदेव सिंह सिरसा ने कहा कि  मध्यकाल में जब देश में हिंसा और नफ़रत बहुत  थी, उस दौर में भी भारत के सूफी संतों ने प्रेम को प्रतिरोध का हथियार बनाया था। बुल्ले शाह, निजामुद्दीन औलिया, सहित सभी सूफी संत और कवि कभी भी राजसत्ता के साथ अनुकूल नहीं रहे। उन्होंने कभी भी राज्य सत्ता के आश्रय को कबूल नहीं किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और कलाओं के प्रतिरोध का सिलसिला प्राचीन काल से लेकर मौजूदा समय तक लगातार जारी है, बस प्रतिरोध के तरीके बदल जाते हैं। सिरसा ने  ब्रिटिश काल में पंजाबी साहित्यकारों के प्रतिरोध के इतिहास पर भी रोशनी डाली। 



झारखंड से आए साहित्यकार रणेन्द्र ने कहा कि आदिवासी अंचलों में चल रहे प्रतिरोध के आंदोलन को भद्रलोक में नोटिस नहीं लिया जाता। आदिवासी अंचलों में प्रतिरोध के आंदोलन 18वीं सदी में प्लासी के युद्ध के समय से ही शुरू हो गए थे। रणेन्द्र ने सांप्रदायिक राजनीति की विस्तार से व्याख्या की और कहा कि भारत में सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद के जुड़वां भाई की तरह पैदा हुई। अंग्रेजों ने जब जातिगत जनगणना में  देखा कि पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या 70 से 90 फीसदी तक है तो उन्होंने लोगों को धर्म के आधार पर बांटने के लिए बंगाल का विभाजन किया। बंगाल विभाजन के विरोध में जो आंदोलन चला उसमें भी सांप्रदायिकता  शामिल थी। रणेंद्र ने कहा कि वर्तमान दौर में टेक्नोलॉजी के जरिये हर व्यक्ति सत्ता  की नजर में है।  साहित्य में इस खतरे की बात आना चाहिए।

दिल्ली से आए साहित्यकार जितेंद्र भाटिया ने बंटवारे की स्मृतियों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कराची के एक डॉक्टर देशराज बंटवारे के पहले वहां एक मुस्लिम मोहल्ले में गरीबों का मुफ्त इलाज करते थे। विभाजन में  दंगाइयों ने उन पर जानलेवा हमला किया। तब वे  किसी तरह बचकर भारत आए और यहां भी उन्होंने नागपुर में मुस्लिम बस्ती में गरीबों का मुफ्त इलाज जारी रखा। ऐसे ही लोगों ने भारत के  धर्मनिरपेक्ष स्वरूप निर्माण किया है।

अशोकनगर के हरिओम राजोरिया ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में लिखे हुए शब्दों का महत्व कम हो रहा है, इसे फिर से पुनर्जीवित करना हमारी  जिम्मेदारी है। सत्र का संचालन ग्वालियर के कवि पवन करण ने किया। 

दूसरे सत्र का विषय था ‘हाशिये का समाज और साहित्य’। इस विषय पर दिनेश भट्ट, असद अंसारी, आरती,  विजेंद्र सोनी और जितेंद्र बिसारिया ने विचार रखे। संचालन अनिल करमेले ने किया। 

सम्मेलन के मौके पर अनंत श्रोत्रिय स्मृति पुस्तक प्रदर्शनी और केसरी सिंह चिडार स्मृति कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसमें पंकज दीक्षित, अशोक दुबे, मुकेश बिजौले और ग्वालियर के चित्रकारों के चित्र और पोस्टर प्रदर्शित किये गए।  

शाम के सत्र की शुरुआत चालीस देशों में वायलिन बजा चुकीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति की वायलिन वादक अनुप्रिया देवताले के अत्यंत प्रभावी वायलिन वादन से हुई। उस्ताद अमजद अली खान की शिष्या  और चन्द्रकान्त देवताले की बेटी अनुप्रिया ने इस मौके पर राग भीमपलासी को बजाने के लिए चुना। उन्होंने मध्य और द्रुत लय में दो रचनाएं बजायीं। तबले पर संगत गांधार राजहंस ने की। उनके वादन के बाद सभागृह में कुछ पल सन्नाटा छाया रहा।  

सम्मेलन के दूसरे और अंतिम दिन का विषय था ‘लेखक संगठन: विचार और प्रतिबद्धता’। इस विषय पर ख्यात कवि कुमार अंबुज (भोपाल) ने कहा कि  लेखन में विचार शामिल होता है। विचार आपको जैसी दृष्टि देता है वैसा ही आप लिखते हैं। जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि। कुमार अंबुज ने कहा कि जब हम किसी वैचारिक संगठन से जुड़ते हैं तो कुछ चीजों को न्यूनतम वैचारिक सहमति के साथ स्वीकारते हैं।  उन्होंने कहा कि मार्क्सवाद लेखन के लिए एक दर्शन की तरह महत्वपूर्ण है पर वह राजनीतिक पार्टी के मार्क्सवाद से अलग है। संगठन में संख्या से ज्यादा विचार महत्त्वपूर्ण होना चाहिए। उदारता का मतलब विचलन नहीं होता।  



इसी विषय पर शैलेंद्र शैली (भोपाल) ने कहा कि लेखक संगठन जनता को फासीवाद के खिलाफ गोलबंद करें। इस दौर में फासीवाद और पूंजीवाद का गठजोड़ खतरनाक हो गया है। हरनाम सिंह (इंदौर) ने कहा कि फ़ासिज़्म के ख़िलाफ़ जो लड़ाई  हम लड़ रहे हैं, उसमें तटस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है। छिंदवाड़ा के मोहन कुमार डहेरिया ने कहा कि संगठन कोई सेल्फी प्वाइंट नहीं है। संगठन में प्रतिबद्धता और अनुशासन बेहद जरूरी है।

प्रलेस के महाराष्ट्र महासचिव राकेश वानखेड़े (महाराष्ट्र) ने कहा कि  लेखक की प्रतिबद्धता विचार और खुद के प्रति होना चाहिए। सत्यम पाण्डे (जबलपुर) ने संगठन में लोकतंत्र और असहमति के सम्मान पर ज़ोर दिया। सारिका श्रीवास्तव (इंदौर) ने कहा कि संगठन की प्रतिबद्धता वैचारिक मूल्यों के प्रति होना चाहिए। जो झूठ हमें दिखाया अथवा बताया जा रहा है उसकी जड़ तक पहुंचना जरूरी है। इस सत्र में लक्ष्मण प्रसाद डहेरिया (छिंदवाड़ा), पवित्र सलालपुरिया (गुना), शेखर मल्लिक (घाटशिला, झारखण्ड), और अभिषेक अंशु (भोपाल) ने भी संबोधित किया। संचालन शशिभूषण (उज्जैन) ने किया।

सम्मेलन का समापन नई कार्यकारिणी के गठन और जनसरोकारों से संबंधित प्रस्तावों को पारित करने के साथ हुआ। छिंदवाड़ा निवासी वरिष्ठ कवि मोहन कुमार डहेरिया को प्रदेश अध्यक्ष और भोपाल के कवि अनिल करमेले को महासचिव मनोनीत किया गया। अपने संबोधन में डहेरिया ने कहा कि वे प्रगतिशील लेखक संघ की गौरवशाली परंपरा को आगे ले जाने का प्रयास करेंगे।



सम्मेलन के अंतिम सत्र में जनसरोकारों से संबंधित अनेक प्रस्ताव पारित किए गए।  केन बेतवा नदी परियोजना के विस्थापितों के लिए न्याय की मांग का प्रस्ताव विनीत तिवारी ने प्रस्तुत किया‌; मणिपुर में शांति बहाली के साथ विस्थापितों के पुनर्वास का प्रस्ताव आरती ने; आदिवासियों सहित समाज के वंचित तबको पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ प्रस्ताव सत्यम पांडे ने; शिक्षण व्यवस्था के राजनीतिक दबाव से मुक्त करने का प्रस्ताव असद अंसारी ने; सांस्कृतिक राष्ट्रवाद थोपने के विरुद्ध प्रस्ताव शैलेंद्र शैली ने; टेलीविजन पर अंधविश्वास फैलाने वाले कार्यक्रमों के विरुद्ध प्रस्ताव दिनेश भट्ट ने; एसआइआर विरोधी आंदोलन के दमन के खिलाफ प्रस्ताव गिरीश पटेल ने; तथा डमी स्कूलों के खिलाफ प्रस्ताव शशिभूषण ने प्रस्तुत किया। सभी प्रस्तावों का अनुमोदन सदन में किया गया। 

ईरान की जनता पर अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा थोपे का युद्ध एवं फिलिस्तीन में इजरायल द्वारा किए गए नरसंहार की भी  सदन में निंदा की गई। सम्मेलन के अंत में साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ ईरान की जनता के संघर्ष से एकजुटता व्यक्त करने  के लिए ईरान के ख्यात फिल्मकार अब्बास कियोरोस्तामी की फ़िल्म “मेरे दोस्त का घर कहां है” का प्रदर्शन किया गया। अंतिम सत्र का संचालन विनीत तिवारी ने किया और आभार हरनाम सिंह ने माना।

कृष्णार्जुन, रवि शंकर, शुभम, नेहा दुबे, अभय लोधी, प्रमोद बागड़ी, रुद्रपाल यादव, विजय दलाल, युक्ता, अनुराधा, प्रज्ञा सहाय, आँचल तिवारी, मुस्कान और अन्य अनेक कार्यकर्ताओं के अनथक परिश्रम से यह सम्मेलन सफल हुआ।   




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