गाज़ा: नरसंहार के 1000 दिन और कुर्बानियों की दास्तानें

काव्यात्मक शुरुआत के बाद सभा को कुछ कड़वे और कठोर तथ्यों तथा मुनाफ़े की भूखी साम्राज्यवादी ताकतों के छिपे हुए राजनीतिक मंसूबों से अवगत कराया गया, जिनके कारण फ़िलिस्तीन की सुंदर धरती और जीवन, तबाही और संकट में बदल गया है। गोआ से आए वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रंजन सोलोमन इस दिन के मुख्य वक्ता थे।

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बहुत लड़े, बहुत हासिल किया, और बहुत लड़ाई बाक़ी है: NFIW का 72वाँ स्थापना दिवस

एनएफ़आईडब्ल्यू के 72वें स्थापना दिवस पर 4 जून 2026 को दिल्ली के राजेन्द्र भवन में लगभग आधे दिन तक चले केन्द्रीय इकाई के कार्यक्रम में शरीक होने का अवसर मुझे मिला और यह बहुत उम्मीद जगाने वाला तसलीबख्श अनुभव रहा।

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अजय भवन में विश्वनाथ त्रिपाठी: क्योंकि सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता…

विश्वनाथ जी का ही फोन था। मैंने खुद को उम्मीद करने से रोका। उन्होंने पूछा कि आपको तीन लोग लाने होंगे मुझे कुर्सी पर बिठाकर उतारने के लिए। मैंने कहा हम चार आ जाएँगे। उन्होंने कहा कि मैं एक घंटे से ज़्यादा नहीं बैठ सकूँगा। मैंने कहा अप दस मिनट बाद वापस जाना चाहेंगे तो आपको वापस ले चलेंगे। बोले- ठीक है, आ जाइए। 

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पुस्तक चर्चा: बदलती भू-राजनीति में रूस-अमेरिका के बीच मध्य एशिया पुल है या खाई? 

पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अजय पटनायक ने कहा कि पुस्तक का पहला संस्करण 2016 में आया था, परंतु इस भौगोलिक क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के मद्देनजर दूसरे संस्करण को लाने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्होंने कहा कि ये देश प्रारंभ में राष्ट्रवादी उत्साह के कारण पश्चिमी देशों और अमेरिका की ओर आकर्षित हुए थे, जिसका इस्तेमाल रूस के विरुद्ध किया गया।

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दो बरस बाद बेतलहेम में क्रिसमस : नया साल, नये सपने, उम्मीद और हौसले के नाम!

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शायद यह पहला नया बरस है और पहली क्रिसमस है जब मैं बहुत खुश हूँ। इसकी वजह है फ़लस्तीन से आया एक ईमेल जिसमें बेतेलहेम की एक दोस्त ने एक वीडियो भेजा है और साथ ही बताया है कि दो साल से ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार के चलते बेतेलहेम में और सारे फ़लस्तीन में क्रिसमस नहीं मनाया गया था। इस बार बेतेलहेम में क्रिसमस ट्री सजाई गई और क्रिसमस मनायी गई।

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कविता जीवन पर निर्बल की सच्ची पकड़ है : कुमार अम्बुज को कुसुमाग्रज सम्मान के सन्दर्भ में

मराठी के विशिष्ट कवि कुसुमाग्रज के नाम पर स्थापित सम्मान से हाल में कुमार अम्बुज को सम्मानित किया गया है। कुमार अम्बुज प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय और वरिष्ठ पदाधिकारी हैं। इस अवसर पर उन्हें बधाइयों के साथ उनकी रचनात्मक यात्रा पर संक्षिप्त टिप्पणी

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ग़सान कनाफ़ानी: फ़िलिस्तीन मुक्ति संघर्ष का राइटर और फाइटर

कनाफ़ानी ने जितना लिखा, उसका अभी तक कुछ अंश ही हासिल किया जा सका है। उन्होंने अनेक अखबारों में लिखा। अनेक नामों से लिखा। उनके लिए लेखन अपना नाम बनाने का नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीन की आज़ादी के मक़सद को हासिल करने के लिए तर्क का औजार था, दुश्मन के ख़िलाफ़ मोर्चा था और लोगों को लामबंद करने की पुकार थी।

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स्मृति शेष: बड़े भाईसाहब से कैसे साथी बने कॉमरेड केसरी सिंह

उनके ठीक होने की इच्छा, उनके अंतिम समय तक कुछ न कुछ सार्थक करने और सीखने का व्यक्तित्व हमेशा हमारी यादों में रहेगा। मौत तो सबको ही आती है लेकिन वे लोग मौत के बाद भी जीते हैं जो मौत के डर से जीते-जी हथियार नहीं डाल देते।

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पॉल रॉबसन – समुद्र, आकाश और मिट्टी की आवाज़

इंदौर, 15 अप्रैल 2023 पिछली सदी के महान गायक और  नागरिक अधिकारों के योद्धा पॉल रॉबसन की 125वीं जयंती के मौके पर भारतीय जन नाट्य सघ (इप्टा) की इंदौर इकाई …

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साम्राज्यवाद के विरुद्ध अडिग चट्टान थे फिदेल कास्त्रो: 96वें जन्मदिन पर विशेष आयोजन

इन फिल्मों को हिंदी में डब करके हिंदी के दर्शकों को दिखाना भी बहुत ज़रूरी है ताकि नयी पीढ़ी के लोग हाड़-माँस के बने फिदेल कास्त्रो, चे गुएवारा, सल्वादोर अलेंदे, शेख मुजीबुर्रहमान आदि जैसे अजूबे करिश्माई व्यक्तित्वों को जान सकें और उनसे ये सीख सकें कि लोग ऐसे करिश्माई पैदा नहीं होते बल्कि असाधारण हालात साधारण लोगों को भी करिश्माई बना देते हैं।

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