पर्यावरण दिवस पर ओडिशा का नारा- ‘मिट्टी बेचने के लिए नहीं, पहाड़ मुनाफे के लिए नहीं’!


सभी दोस्‍तों और साथियों को जोहार!

अपनी जमीन, जंगल और पहाड़ियों को बचाने के हमारे संघर्ष को ओडिशा और पूरे देश से जैसा समर्थन मिला है और एकजुटता दिखाई गई है, उससे मां माटी माली सुरक्षा मंच गदगद है। बीते अप्रैल की 6-7 तारीख की दरमियानी रात कंटामाल गांव में हुई बर्बर पुलिसिया कार्रवाई के तुरंत बाद विभिन्न राजनीतिक दल, वाम-जनवादी संगठन, मुख्यधारा का मीडिया और सोशल मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा समूह और शोधकर्ता हमारे लोगों के साथ एकजुटता जाहिर करने के लिए सिजिमाली आए थे।  उस दौरान आप सबको 10 मार्च की घटना का पता चला जब तलाआमपदर गांव में आधी रात को छपा मार कर 10 औरतों सहित 21 ग्रामीणों को गिरफ्तार किया गया था। सिजिमाली का पूरा इलाका फरवरी के बाद से ही संघर्ष का क्षेत्र बन चुका था। आसमान में ड्रोन उड़ रहे थे, सड़कों पर पुलिस की गाड़ियां गश्‍त लगा रही थीं और हमारे गांवों में  पुलिस मार्च कर रही थी। सिजिमाली में वेदांता और कुटरुमाली में अदाणी को तीन साल पहले जब बॉक्साइट के भंडार पट्टे पर दिए गए थे, तभी से हमारे लोगों का लगातार दमन जारी है और उनके ऊपर मनगढ़ंत मुकदमे थोपे गए हैं। यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची में आता है, जहां हम आदिवासी, दलित और चरवाहा समुदाय के लोग हमेशा शांति के साथ एक होकर रहते आए थे, लेकिन आज यह इलाका नरक में बदल चुका है। हमारा संघर्ष फिर भी जारी रहेगा। आपका समर्थन और एकजुटता संघर्ष जारी रखने के हमारे संकल्प को मजबूत करती है।

हमारा संघर्ष केवल हमारे जीवन और आजीविका को बचाने तक सीमित नहीं है।  हमारा संघर्ष धरती माता की रक्षा के लिए है, पूरी पृथ्‍वी के लिए है। हमारी लड़ाई सभी जीव-जंतुओं, मछलियों और पक्षियों, भेड़ और बकरियों, जंगलों और जलधाराओं की रक्षा के लिए है। वे हमारे हैं और हम उनके। हम एक हैं, अभिन्‍न हैं।  

एक तरफ जलवायु संकट और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है, जिससे प्रकृति और पर्यावरण दोनों की रक्षा करना बेहद जरूरी हो गया है; दूसरी तरफ पूर्वी घाटों की सभी बॉक्साइट पहाड़ियों को एक के बाद एक पूंजीवादी लोभ और मुनाफे की भेंट चढ़ाया जा रहा है। ओडिशा में यह सिलसिला खंडुआलमाली, नियमगिरी, माली पर्वत, बालदा नागेश्वरीमाली, सेरुबांधा, कोडिंगामाली और नारायणपटना के कर्णकोंडामाली में चल रहा है। यदि इन जगहों पर खनन किया गया, तो पूर्वी घाट से निकलकर हमारी नदियों में मिलने वाली सैकड़ों बारहमासी जलधाराएं जल्द ही सूख जाएंगी। फिर ओडिशा रेगिस्तान और जहरीले कचरे के एक विशाल तालाब में बदल जाएगा। जब से बाफलीमाली की पहाड़ियों में खनन शुरू हुआ है और टिकरी के पास एल्‍युमिना रिफाइनरी लगाई गई है, तभी से हमने वहां गंभीर प्रदूषण देखा है- वहां की हवा में धूल और धुआं भर चुका है, और लाल मिट्टी के तालाबों से निकलने वाला जहरीला कचरा नदियों को गंदा कर रहा है, जिससे वे भी जहरीली हो चुकी हैं। लांजीगढ़ रिफाइनरी प्लांट के पास भी यही हो रहा है। इंसानों की तो बात छोड़िए, गाय और बकरियां भी अब पानी नहीं पी सकती हैं। मछलियां मर रही हैं। जाहिर है, ऐसे बॉक्साइट संपन्‍न इलाकों में हमारे जैसे समुदाय, जो काफी हद तक प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, आज विकास के नाम पर किए जा रहे विनाश का विरोध करते हुए पूरे दक्षिण ओडिशा में एक लंबा संघर्ष चला रहे हैं। ये सभी संघर्ष आपस में साझा हैं, एक हैं।


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विकास की इस कहानी का दूसरा पहलू हमारे रोजमर्रा के अनुभवों में छुपा है- वह है पुलिस और प्रशासन के अमानवीय और क्रूर कृत्य। यह कैसा विकास है जहां एक चुनी हुई सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ पुलिस और अर्धसैन्‍य बलों का इस्तेमाल कर रही है? लोकसेवक और सरकारी अधिकारी, जिन्हें हमारे पैसे से तनख्वाह मिलती है और इसीलिए उनका काम हमारी सेवा करना है, वे ही हमारे ऊपर दमन ढा रहे हैं। क्या विकास का मतलब झूठ बोलना, रिश्वत खिलाना और हमारे बीच फूट डालना है? शर्म की बात है कि गांव वालों से सहमति लेने के लिए कुछ दलाल  छिटपुट रिश्वत के सहारे हमारे बीच फूट डाल रहे हैं और समुदाय  को कमजोर कर रहे हैं।

हमारे खून, पसीने और श्रम से बनाए मामूली घरों को तोड़ने के लिए प्रशासन आधी रात को छापा मारता है और उल्टे हमारे ही ऊपर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाकर मुकदमा ठोंक देता है। एक ओर तो प्रशासन निषेधाज्ञा लगाकर हमारे दोस्तों और समर्थकों को यहां आने से रोकता है, दूसरी ओर हम पर हमला करने के लिए वह कंपनियों द्वारा भाड़े पर रखे नकाबपोश गुंडे खुद यहां लाता है। हमारे नौजवानों को पुलिस के हवाले करने से पहले उन पर भाड़े के गुंडों से हमला करवाया जाता है। वनवासी होने के नाते चूंकि हम लोग अपने हाथ में धनुष-बाण या कंधे पर पारंपरिक हथियार लेकर चलते हैं, तो इस बहाने वे हमारे ऊपर घातक हथियार रखने का आरोप मढ़कर शस्त्र अधिनियम की धारा लगा देते हैं। हमारे सोते हुए बच्चों पर आंसू गैस के गोले वे खुद चलाते हैं, हमारे बुजुर्गों के माथे पर वे लाठी-बंदूक से मारते हैं, लेकिन पलटकर हत्या के प्रयास का आरोप हमारे लोगों के ऊपर लगा देते हैं।

लगातार पुलिस और गुंडों की मौजूदगी के चलते हमारी कमाई और साप्ताहिक हाट पर असर पड़ रहा है। हमारे वजूद का आर्थिक आधार इतना नाजुक है कि वे उसे रौंदने में जुटे हैं। जिन परिवारों के लोग जेल में हैं उन्‍हें एक वक्‍त का खाना खाकर अपनी मामूली कमाई जेल के दौरों और जमानत आदि पर खर्च करनी पड़ रही है। फिर जब हम इंसाफ के लिए अदालतों का रुख करते हैं, तो जमानत की लंबी सुनवाइयों में फंस कर रह जाते हैं। अगर जमानत मिलती भी है, तो उसकी शर्तें इतनी अमानवीय और जातिवादी होती हैं कि हमारा और अपमान होता है। जब किसान और दिहाड़ी मजदूर महीनों जेलों में रहेंगे, तो उनके परिवार कैसे जिंदा रहेंगे?

हमारा गणतंत्र लोगों के लिए है या निगमों के लिए? अपने संवैधानिक अधिकारों, इंसाफ और अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवाज उठाना क्‍या अपराध है? शांतिपूर्ण तरीकों से असहमति को जाहिर करने का संवैधानिक अधिकार क्‍या हमारा भी नहीं है? कानून हमारी रक्षा के लिए है या केवल कंपनियों के हित में काम करता है? हम लोगों ने उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए पर्यावरण संबंधी जनसुनवाइयों में खनन परियोजना को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था। अपनी ग्राम सभाओं में हमने खनन के लिए जंगल की जमीन के इस्‍तेमाल को अस्वीकार कर दिया था। इसके बावजूद एक-एक कर के खनन कार्यों को मंजूरी दी जा रही है। खनन स्थल तक जाने वाली सड़क के निर्माण के लिए जंगल साफ करने को स्वीकृति दी जा रही है, जबकि यह मामला अदालत में लंबित है। अभी हाल ही में केंद्र सरकार के विशेषज्ञ पैनल ने पर्यावरणीय मंजूरी पर मुहर लगाई है।

हमें अकसर महसूस होता है कि हम लोग व्‍यवस्‍था नाम के एक ऐसे विशाल प्रेत से लड़ रहे हैं, जहां चुने हुए प्रतिनिधियों और अधिकारियों से संवाद का कोई मतलब नहीं है। हमारी सैकड़ों अपीलों पर वे कभी कोई जवाब नहीं देते, लेकिन किसी प्रेत की तरह वे अचानक आते हैं और हमारे पास जो कुछ भी है उस सब पर एक झटके में हमला कर देते हैं। हमारी आवाज को दबाने के लिए उन्होंने सभी पांच पंचायतों में हमारे लोगों के ऊपर सैकड़ों फौजदारी के मुकदमे थोप दिए हैं। पिछले तीन साल में गिरफ्तारियों, हिरासतों और मुकदमों की संख्या इतनी ज्‍यादा हो चुकी है कि अब हम गिनना भी भूल गए हैं। अब तो वे एफआइआर में ‘अन्‍य’ के तहत 100 या 300 की संख्‍या डालकर गिरफ्तारी की एडवांस बुकिंग कर रहे हैं। फिर भी हम लोग साहस और संकल्प के साथ संघर्ष में जुटे हुए हैं।

हमारा संघर्ष अतीत, वर्तमान और भविष्य के लिए है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और इतिहास के लिए है। यह हमारे तीज राजा के पवित्र निवास और हमारे सभी पवित्र उपवनों की सुरक्षा के लिए है। यह संघर्ष उस वर्तमान के लिए है जब प्रतिष्‍ठाजनक जीवन और श्रम को असंभव बनाया जा रहा है। हमारा संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखने का है। जमीन से कमाया गया मुनाफा और राजस्‍व ओडिशा के लोगों के पास आखिर कब और कहां वापस आया? हमेशा ही अमीर और ताकतवर लोग प्राकृतिक संसाधनों को बेतहाशा लूटते रहे जबकि हमारे लड़के मजदूरी करने के लिए दूरदराज पलायन करते रहे। आइए, हम पीढ़ीगत समानता के सिद्धांत को कायम रखते हुए उस दिशा में काम करें और अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करें। ये पहाड़ियां, जंगल और धाराएं हजारों वर्षों से वहां हैं।  उन्होंने हमारे पूर्वजों का पालन-पोषण किया है, वे हमारा पालन-पोषण करते रहे और वे उनका भी पालन-पोषण करेंगे जो अभी तक पैदा नहीं हुए हैं। क्या हमारे प्राकृतिक संसाधनों का बाजार में कोई मोल हो सकता है? न तो ये बिक्री के लिए हैं, न ही मुनाफे के लिए। ये जीवन और जीने के लिए हैं। यह मिट्टी बिक्री के लिए नहीं है!

  • हम अपने उन वीर सेनानियों को सलाम करते हैं जो जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए जेल की दीवारों में कैद कर दिए गए हैं।
  • हम सभी संघर्षरत लोगों और हाशिये पर रहने वाले सभी समुदायों को सलाम करते हैं जो अमीरों और ताकतवर लोगों के खिलाफ हैं।
  • हम पूर्वी घाट की पर्वत श्रृंखलाओं के सभी जन आंदोलनों के बीच एकता की अपील करते हैं।

हमारी आवाज में अपनी आवाज मिलाकर निम्‍न मांगें उठाएं:

  • सिजिमाली और कुटरुमाली में वेदांता लिमिटेड और अदाणी समूह की प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजनाओं और पूर्वी घाट में सभी खनन परियोजनाओं को वापस लिया जाए।
  • सभी कैदियों को जेल से रिहा किया जाए और हमारे लोगों के ऊपर लगे सैकड़ों फर्जी मुकदमों को रद्द किया जाए।
  • आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जाए।

अध्यक्ष, सुभाष सिंह माझी
उपाध्‍यक्ष, लाई माझी
सचिव, लक्ष्मण माझी

माँ माटी माली सुरक्षा मंच
(सिजिमाली-कुटरुमाली-माझिंगिमाली)
रायगड़ा – कालाहांडी, ओडिशा


About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

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