भारत की जेलों में कैद औरतों की अनकही कहानियां

आज़ादी का ख्वाब दिल में पाले देश की जेलों में कैद महिलाओं की अनगिनत कहानियां हैं। इनमें से कितनी गुनाहगार हैं और कितनी बेगुनाह हैं, यह आमतौर पर कानून नहीं, बल्कि पुलिस के गढ़े गये सबूतों के साथ-साथ समाज और अदालतों का पितृसत्तात्मक नज़रिया तय करता है।

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जनसंख्या के विमर्श में धर्म का प्रवेश और प्रस्तावित कानून पर बहस के निहितार्थ

आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव एक ऐसा अवसर है जब जनसंख्या नियंत्रण जैसे आवश्यक मुद्दे का चुनावी उपयोग करने की कोशिश में उसे विवादित और गैर-जरूरी बना दिया गया है। इससे यह बोध होता है कि सरकार जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रति जरा भी गंभीर नहीं है और उसका सारा ध्यान वोटों की राजनीति पर है।

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यूपी में बाकी जातियों की नाराजगी पर क्यों नहीं सवाल कर रहा है मीडिया?

मीडिया जब जाति पर चर्चा करने ही लगा है तो उसे एक जाति-विशेष के बजाय उत्तर प्रदेश की तमाम जातियों की नाराजगी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर चर्चा करनी चाहिए।

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भाषा चर्चा: त्रिभाषा की जगह द्विभाषा फॉर्मूले को रखने में ही क्या दिक्कत थी?

अंग्रेजी के सर्वमान्य आधिपत्य से हमारा फायदा होने की जगह नुकसान अधिक हुआ है, यह तो इतिहास ने ही साबित कर दिया है। आप संपर्क भाषा हिंदी को बनाते और बाकी भारतीय भाषाओं को जरूरत के मुताबिक ‘न्यूमिरो ऊनो’ बनाते।

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भारतीय भाषाएँ, अंग्रेजी और औपनिवेशिक सत्ता के सांस्कृतिक वर्चस्व का सवाल

वर्तमान में अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के सन्दर्भ में जहां हैं वहां इसलिए नहीं है कि भारतीय भाषाएँ अपने मूल रूप में प्रतिगामी हैं, बल्कि इसलिए कि एक तरफ उत्पीड़न का इतिहास है और दूसरी तरफ उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का इतिहास।

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‘जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाये उनकी बला से…’!

वह भली-भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानि बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उन पर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले कुछ थोड़े से पूंजीपति, जमींदार, व्यवसायी ही नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग/मध्यवर्ग (सेवक/नौकर) भी उतना ही दोषी था।

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तकनीक, समाज और राजनीति: जासूसी प्रकरण से उपजे कुछ बुनियादी सवाल

क्या पेगासस जैसे प्रकरणों में तकनीकी के सम्पूर्ण नकार का संदेश निहित है? समय उस पुरानी अवधारणा पर भी सवाल उठाने का है जो यह विश्वास करती है कि तकनीकी अविष्कार निष्पक्ष, निरपेक्ष और स्वतंत्र होते हैं तथा मनुष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनका अच्छा बुरा उपयोग करता है।

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उत्तर प्रदेश में विपक्ष क्या संगठित होकर चुनाव को चेहरे से हटा कर मुद्दों पर खड़ा कर पाएगा?

अगला चुनाव बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा होगा जिसमें जीत कम सीटों के फासले से होगी, हालांकि भाजपा की जीत की संभावना प्रबल है लेकिन बिना अथक प्रयास किये यह भी आसान नहीं है।

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कोरोना-काल में बढ़ा प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार जनता के लिए कोई मुद्दा नहीं है?

। हाल ही में स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक ने वार्षिक डाटा जारी किया है जिसमें बताया गया कि 2020 में स्विस बैंकों में भारतीयों का पैसा बढ़कर 20700 करोड़ रुपए जमा हुआ है जो पिछले 13 साल में सबसे अधिक है।

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कोरोनाकाल में स्कूली शिक्षा के अभाव ने बच्चों का भविष्य अंधेरे में छोड़ दिया है

आभासी कक्षा उनके लिए वरदान सिद्ध हुई हैं जो घर बैठे पढ़ना चाहते हैं-जैसे विवाह के बाद तमाम लड़कियों की शिक्षा बाधित हो जाती है, तो वे इसका लाभ ले सकती हैं। पैर टूट जाए तो भी कोई छात्र घर पर कक्षाएं कर सकता है पर सामान्‍य स्थिति में बच्चों के लिए यह बिल्कुल कारगर नहीं है। गाँधी जी ने जो ट्रिपल एच (मस्तिष्क, हृदय और हाथ) के विकास की अवधारणा दी है उसमें यह बिल्कुल असफल है। ऑनलाइन कक्षा केवल विकल्प है, इससे केवल काम चलाया जा सकता है, यह पूर्ण समाधान नहीं है।

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