इंसानियत के लिए खतरे का लाल निशान है आज जारी UN की जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट

इस रिपोर्ट को आइपीसीसी में शामिल 195 सदस्य देशों की सरकारों ने पिछली 26 जुलाई को शुरू हुए दो हफ्तों के वर्चुअल अप्रूवल सेशन के दौरान शुक्रवार को मंजूरी दी है। वर्किंग ग्रुप 1 की रिपोर्ट आइपीसीसी की छठी असेसमेंट रिपोर्ट (एआर6) की पहली किस्त है।

Read More

बौद्धिकता की ‘शक्ल’ देख कर किये जाने वाले चयनित विरोध और चुप्पियों के खतरे

लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों का कार्यक्रम रद्द होने पर अगर आप चुप रहेंगे तो यह चुप्पी सागर विश्वविद्यालय में भी कार्यक्रम रद्द होने देने में आपका योगदान होगी।

Read More

भाषा चर्चा: जब कंप्यूटर आपकी सही हिंदी को लाल रंग से घेर दे, तो आप क्या करेंगे?

समस्या के विभिन्न आयामों पर अब तक बात हुई है, लेकिन समाधान पर कब बात होगी? कोई समाधान है भी या अंदाज से हवा में लाठी चलायी जाएगी, या केवल समस्याओं को इंगित कर छोड़ दिया जाएगा?

Read More

जातिगत जनगणना क्यों जरूरी है?

इससे सबसे पहले तो सभी राजनीतिक दलों को अपना लोकतांत्रीकरण करने को मजबूर होना होगा। इसके बाद सरकार को नयी श्रेणियों की रचना करनी पड़ सकती है। अनुसूचित जाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/घुमंतू-विमुक्त में शामिल कई जातियां इधर से उधर हो सकती हैं।

Read More

भारत की जेलों में कैद औरतों की अनकही कहानियां

आज़ादी का ख्वाब दिल में पाले देश की जेलों में कैद महिलाओं की अनगिनत कहानियां हैं। इनमें से कितनी गुनाहगार हैं और कितनी बेगुनाह हैं, यह आमतौर पर कानून नहीं, बल्कि पुलिस के गढ़े गये सबूतों के साथ-साथ समाज और अदालतों का पितृसत्तात्मक नज़रिया तय करता है।

Read More

जनसंख्या के विमर्श में धर्म का प्रवेश और प्रस्तावित कानून पर बहस के निहितार्थ

आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव एक ऐसा अवसर है जब जनसंख्या नियंत्रण जैसे आवश्यक मुद्दे का चुनावी उपयोग करने की कोशिश में उसे विवादित और गैर-जरूरी बना दिया गया है। इससे यह बोध होता है कि सरकार जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रति जरा भी गंभीर नहीं है और उसका सारा ध्यान वोटों की राजनीति पर है।

Read More

यूपी में बाकी जातियों की नाराजगी पर क्यों नहीं सवाल कर रहा है मीडिया?

मीडिया जब जाति पर चर्चा करने ही लगा है तो उसे एक जाति-विशेष के बजाय उत्तर प्रदेश की तमाम जातियों की नाराजगी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर चर्चा करनी चाहिए।

Read More

भाषा चर्चा: त्रिभाषा की जगह द्विभाषा फॉर्मूले को रखने में ही क्या दिक्कत थी?

अंग्रेजी के सर्वमान्य आधिपत्य से हमारा फायदा होने की जगह नुकसान अधिक हुआ है, यह तो इतिहास ने ही साबित कर दिया है। आप संपर्क भाषा हिंदी को बनाते और बाकी भारतीय भाषाओं को जरूरत के मुताबिक ‘न्यूमिरो ऊनो’ बनाते।

Read More

भारतीय भाषाएँ, अंग्रेजी और औपनिवेशिक सत्ता के सांस्कृतिक वर्चस्व का सवाल

वर्तमान में अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के सन्दर्भ में जहां हैं वहां इसलिए नहीं है कि भारतीय भाषाएँ अपने मूल रूप में प्रतिगामी हैं, बल्कि इसलिए कि एक तरफ उत्पीड़न का इतिहास है और दूसरी तरफ उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का इतिहास।

Read More

‘जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाये उनकी बला से…’!

वह भली-भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानि बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उन पर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले कुछ थोड़े से पूंजीपति, जमींदार, व्यवसायी ही नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग/मध्यवर्ग (सेवक/नौकर) भी उतना ही दोषी था।

Read More