पुस्तक संस्कृति का ह्रास
आज लेखक अपने पैसों से पुस्तकें छपवा कर स्वप्रचार कर रहे हैं। यह एक दयनीय स्थिति है। इस स्थिति में साहित्य के नाम पर लेखन, सृजन आत्मभिव्यक्ति भर ही है।
Read MoreJunputh
आज लेखक अपने पैसों से पुस्तकें छपवा कर स्वप्रचार कर रहे हैं। यह एक दयनीय स्थिति है। इस स्थिति में साहित्य के नाम पर लेखन, सृजन आत्मभिव्यक्ति भर ही है।
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प्रत्येक विद्यालय में पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक है और न ही प्रत्येक कक्षा के लिए शिक्षक ही है। बेशर्मी देखिए, बात जब छात्र-शिक्षक अनुपात की होती है तो अनुपात के सही होने का ढिंढोरा पीटा जाता है, वो भी सदन में। विद्यालयों में नियुक्त शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को जब वेतन और सुविधा देने की बात आती है तो ये संविदाकर्मी और अनट्रेंड कर्मी की श्रेणी में आते हैं लेकिन बात जब अपनी जवाबदेही की आती है तो सदन में वही शिक्षामित्र और अनुदेशक छात्र-शिक्षक अनुपात सही करने के हथियार भी बना लिए जाते हैं। कोई भी शिक्षक भर्ती प्रक्रिया न तो ससमय प्रारंभ होती है न ही संपन्न। दो से चार वर्ष के समयान्तराल पर भी नहीं।
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आजाद भारत का निजाम भी दादा शंभूनाथ को रास नहीं आया। ब्रिटिश सत्ता से लड़ते हुए जो शोषणविहीन समाज बनाने का सपना बुना था जनक्रांति के उस सपने को पूरा करने के लिए ताऊम्र शिद्दत से जुटे रहे। अविवाहित रहते हुए उन्होंने अपने जैसे क्रांतिधर्मी साथियों की याद में अपने कचौरा घाट स्थित घर को स्मारक बना दिया। बेहद गरीबी की हालत में 76 वर्ष की अवस्था में 12 अगस्त 1985 में यह महान क्रांतिकारी रात दस बजे गहरी नींद में सो गया।
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कहानी की और भी परिभाषाएँ उद्धृत की जा सकती हैं पर किसी भी साहित्यिक विधा को वैज्ञानिक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता क्योंकि साहित्य में विज्ञान की सुनिश्चितता नहीं होती। इसलिए उसकी जो भी परिभाषा दी जाएगी वह अधूरी होगी।
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जब बाबूराव बागुल की आत्मकथा सबसे पहले उनकी मातृभाषा मराठी में प्रकाशित हुई थी तो उसने मराठी साहित्य और समाज को झकझोर दिया था। भारतीय समाज में जाति पर आधारित दमन और अपमान की साहसभरी कथा कहने कहने वाली यह पुस्तक अब एक क्लासिक मानी जाती है और दलित साहित्य में मील का पत्थर।
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जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं। नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है। यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं।
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टैगोर की विलक्षण प्रतिभा से नाटक और नृत्य नाटिकाएं भी अछूती नहीं रहीं। वह बंगला में वास्तविक लघुकथाएं लिखने वाले पहले व्यक्ति थे। अपनी इन लघुकथाओं में उन्होंने पहली बार रोजमर्रा की भाषा का इस्तेमाल किया और इस तरह साहित्य की इस विधा में औपचारिक साधु भाषा का प्रभाव कम हुआ।
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कम्युनिज्म को नाकाम ठहराने की ये सारी कोशिशें मजदूर वर्ग के जबर्दस्त डर से पैदा होती हैं। दुनिया भर के क्रांतिकारियों ने रूस, चीन, कोरिया, वियतनाम, क्यूबा और तमाम दूसरे देशों में यह दिखा दिया है कि पूंजीवादी राज सुरक्षित नहीं है। मजदूर जीत सकते हैं।
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उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राय के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका आंबेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज में हलचल मचा गया।
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उनको विश्वास था कि छोटी जातियों के लोग सामाजिक समानता के लिए अवश्य संघर्ष करेंगे। ज्योतिबा की तरह और भी वयस्क लोग थे लेकिन ज्योतिबा के पास जो साहस और संकल्प था वह और किसी के पास नहीं था। 21 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र को एक नये ढंग का नेतृत्व दिया।
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