तेजी से बढ़ रहा है किसान आंदोलन का राष्ट्रव्यापी आधार
पूरे देश की नज़र कल 30 दिसंबर को 2 बजे विज्ञान भवन में भारत सरकार और 40 किसान संगठनों के बीच बातचीत पर टिकी हुई है ।पहले भी 5 वार्ताएं …
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पूरे देश की नज़र कल 30 दिसंबर को 2 बजे विज्ञान भवन में भारत सरकार और 40 किसान संगठनों के बीच बातचीत पर टिकी हुई है ।पहले भी 5 वार्ताएं …
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रास्ते में हमें टाटा नमक और चिप्स के खाली पैकेट कहीं कहीं जरूर पड़े मिले जिसे देखकर मन में यही बात घूमने लगी कि इसे कॉरपोरेट का दम कहें या सरकार की नाकामी कि आज़ादी के इतने साल बाद भी जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं पहुंच पायी, बिजली नहीं पहुंच पायी, वहां जाने के रास्ते में चिप्स के पैकेट और नमक के पैकेट जरूर पहुंच गये।
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चौधरी चरण सिंह को जनसामान्य ‘किसान मसीहा’ और भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री के तौर पर तो जानता है लेकिन कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व को उनके मूल विचारों और कृतित्व से उलट ही जानता और समझता आया है।
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सरकार ने अब अपने किसान संगठन भी खड़े कर लिए हैं। मतलब कुछ किसान अब दूसरे किसानों से अलग होंगे ! जैसे कि इस समय देश में अलग-अलग नागरिक तैयार किए जा रहे हैं। धर्म को परास्त करने के लिए धर्म और नागरिकों को परास्त करने के लिए नागरिकों का उपयोग किया जाता है।
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उस समय इस संधि को लेकर देश में खासतौर से पंजाब में गंभीर बहस हुई थी। कप्तान अमरिन्दर सिंह ने उस समय इस संधि का खुलकर समर्थन किया था। विश्व व्यापार संगठन का समर्थन करते हुए उन्होंने पंजाब ट्रिब्यूनल में एक लेख लिखा था। अब कांग्रेस पार्टी इस तरह का दिखावा कर रही है कि वह इन जनविरोधी कानूनों के खिलाफ है।
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टीवी इनके पसंदीदा हीरो को दिखाता है। कभी टीवी में दाढ़ी अच्छी लगती है तो कभी कपड़ा! बस रोड पर बैठे छात्र, किसान अच्छे नहीं लगते क्योंकि वही लोग तो इनको ऑफिस जाने में, अस्पताल जाने में, मॉल घूमने जाने में तंग करते हैं।
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भारत में स्वतंत्रता की घोषणा मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने की थी। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह मोहम्मद अली थे जिन्होंने देश के सबसे बड़े नेताओं में से एक सी.आर. दास को आंदोलन में शामिल होने के लिए राजी किया था। इसलिए उनके जीवन और योगदान को समझने के लिए इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता।
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पत्रकारों को अमूल या इंडियन कॉफी वर्कर्स को ऑपरेटिव सोसायटी की तर्ज पर अपना सहकारी संगठन खड़ा करना चाहिए। अगर हमारी दिलचस्पी स्वतंत्र, लोक हितैषी, स्वस्थ पत्रकारिता में है तो वह तभी संभव है जब पत्रकार स्वयं अपने मालिक बनें।
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कहानी की चयन समिति के सदस्य वरिष्ठ दलित-चिंतक प्रो. किशोरी लाल रैगर ने अपनी संस्तुति में लिखा है कि “सुलगती ईंटों का धुआँ” दलित चेतना की सशक्त कहानी है जिसमें कहानीकार ने जातिवाद व सामंती सोच के विरुद्ध मिन्ती जैसे जीवट पात्र की रचना की है।
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साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, अलगाववाद तथा सामाजिक व्यवस्था के विचारहीन पहलू भारतीय एकता को तोड़ रहे थे। जहां उन्हें आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न भारत का निर्माण करना था, वहीं दूसरी ओर एक अभिशप्त सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर न्यायपूर्ण व्यवस्था का सृजन करना था। श्रीमती गांधी ने जीवनपर्यन्त और प्राण देकर भी इसका निर्वहन किया।
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