पर्यावरण दिवस पर ओडिशा का नारा- ‘मिट्टी बेचने के लिए नहीं, पहाड़ मुनाफे के लिए नहीं’!

सिजिमाली का पूरा इलाका फरवरी के बाद से ही संघर्ष का क्षेत्र बन चुका था। आसमान में ड्रोन उड़ रहे थे, सड़कों पर पुलिस की गाड़ियां गश्‍त लगा रही थीं और गांवों में  पुलिस मार्च कर रही थी। सिजिमाली में वेदांता और कुटरुमाली में अदाणी को तीन साल पहले जब बॉक्साइट के भंडार पट्टे पर दिए गए थे, तभी से लोगों का लगातार दमन जारी है और उनके ऊपर मनगढ़ंत मुकदमे थोपे गए हैं।

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तटीय इलाकों में गहरा रहा है जलवायु परिवर्तन का संकट: रिपोर्ट

 महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाके एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संक्रमण के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। इससे मुंबई उपनगर के गर्मियों के समय के अधिकतम तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होने का अनुमान है। यह गर्मी से बचने की योजनाओं की बढ़ती जरूरत पर जोर देता है।

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भोपाल गैस कांड: पर्यावरण मंत्री के बयान की पीड़ित संगठनों द्वारा कड़ी निंदा

भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की रशीदा बी ने कहा, “मंत्री का दावा सच्चाई से बहुत दूर है। वास्तविकता यह है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से 400 मीट्रिक टन से भी कम जहरीला कचरा हटाया गया है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह भोपाल में फैक्ट्री परिसर के अंदर और बाहर दबे कुल खतरनाक कचरे का मात्र 1 प्रतिशत है।”

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इंदौर: आजादी के आंदोलन में आम लोगों की हिस्सेदारी रेखांकित करता नाटक

नाटक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर 1947 में देश की आजादी तक के कई आंदोलनों के बारे में दर्शकों को बताता है। नाटक आंदोलन के दौरान तीन अलग- अलग स्थानों पर जनता के संघर्ष की अनजानी सी पर सच्ची घटनाएं भी दर्शकों के सामने लाता है।

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भोपाल : वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट तथा उभरते विकल्पों पर परिचर्चा

‘जोशी-अधिकारी इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़’, ‘हम सब’ और ‘गांधी भवन’ द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में श्रोताओं की उपस्थिति उत्साहजनक रही, जिनमें राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, राम प्रकाश त्रिपाठी, पलाश सुरजन, आरती, बालेंदु परसाई, शैलेंद्र शैली, सुधीर सजल, उपासना बेहार, स्मिता सत्यमेव आदि शामिल रहे।

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काशी के कुशवाहा ‘कान्‍त’: साहित्य में खामोश कर दिए गए एक अध्‍याय का 75वें साल में जगना

विजय विनीत ने सितम्‍बर 2022 में पहली बार कुशवाहा ‘कान्‍त’ को इतिहास की धूल से निकाला और उनके ऊपर न्‍यूजक्लिक पर एक लंबी कहानी लिखी थी। उसके बाद से ही वे कान्‍त पर किताब लिखने में लगे हुए थे।

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काशी के धर्मगुरुओं और रोजेदारों ने एक ही दस्तरखान पर किया रोजा इफ्तार

बिशप हाउस में सजाए गए दस्तरखान पर ईसाई धर्मगुरुओं ने अपने हाथों से रोजेदारों के लिए थालियां परोसी। अजान होने के बाद रोजेदारों के साथ सभी ने खजूर, शर्बत, जूस, कटलेट आदि तमाम व्यंजनों से इफ्तार किया।

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दिल्‍ली: फलस्तीन, ज़ायोनी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व, और बदलती भू-राजनीति पर चर्चा

डॉ. क़मर आगा ने स्थिति की ऐतिहासिकता और अमेरिका और इज़राइल की विस्तारवादी नीति के षड्यंत्रों को ज़ाहिर किया। उन्होंने कहा कि साम्राज्यवादी शक्ति के माध्यम से अमेरिका और इज़रायल दशकों से दूसरे देशों में हस्तक्षेप कर अपना विस्तार कर रहे हैं। ज़ायोनी शासन बाइबिल में उल्लेखित भू-भागों में बसने की अपनी ‘ग्रेटर इज़राइल’ योजना पर निर्माण का और उन इलाक़ों पर कब्ज़ा कर अपने में मिलाने का काम कर रहा है।

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जहां अस्तित्व ही प्रतिरोध है: प्रलेस के आयोजन में छलका फलस्तीन का दर्द

यह अवसर था प्रगतिशील लेखक संघ की भोपाल इकाई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम का जिसका शीर्षक था ‘जहां अस्तित्व ही प्रतिरोध है। कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ कवि-कथाकार कुमार अम्बुज ने अपने विशिष्ट और नपेतुले अंदाज में बहुत सलीके से विषय को श्रोताओं के सामने खोला।

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चला गया चौरंगी का रखवाला: स्मृतिशेष मणिशंकर मुखर्जी

आज जब उनके जाने की खबर फैल रही है, तो शाहजहां होटल की छवि मन में लौटती है। गलियारे शायद थोड़े धुंधले हैं। मेज़ पर घंटी रखी है। लिफ्ट अब भी चल रही है। पात्र अब भी बहस कर रहे हैं। यही साहित्य का विरोधाभास है। सर्जक चला जाता है, सृजन रह जाता है।

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