“भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां तानाशाह नहीं चलेगा”: इमरजेंसी की 45वीं बरसी पर रामबहादुर राय


दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा डूडा के फेसबुक पेज पर इन दिनों रचनात्मक और ज्ञानवर्धक कंटेंट के साथ देश-विदेश के अपने क्षेत्रों में विद्वानों का वेबिनार करवाया जा रहा है। इसी श्रृंखला में आपातकाल की 45वीं बरसी पर वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रमुख रामबहादुर राय ने ‘इंदिरा और इमरजेंसी’ विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे।

आखिर 45 साल बाद इमरजेंसी पर बात करना क्यों जरूरी है? क्या उस समय इमरजेंसी लगाया जाना जरूरी था? क्या परिस्थितियां इतनी ज्यादा बेकाबू हो चुकी थी कि इमरजेंसी ही एकमात्र रास्ता थी? आखिर क्यों लगाई गई इमरजेंसी? इन सभी प्रश्नों पर रामबहादुर राय ने विस्तार से बात की।

रामबहादुर राय जेपी आंदोलन को इमरजेंसी का कारण मानने से इनकार करते हैं और इस कारण से अपनी असहमति जताते हैं। वह बताते हैं कि इमरजेंसी इसलिए लगाई गई क्योंकि इंदिरा गांधी सत्तालोलुपता के कारण प्रधनमंत्री पद नहीं छोड़ना चाहती थीं इसलिए उन्होंने अपने पद और अपनी कुर्सी को बचाने के लिए इमरजेंसी का रास्ता चुना। वे पूछते हैं, “देश में पहले से ही एक इमरजेंसी चल रही थी। 3 दिसंबर 1971 को जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया उसके प्रतिउत्तर में ही इंदिरा सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी तो ऐसी स्थिति में दूसरी इमरजेंसी की क्या जरूरत थी?”

राय 25 जून, 1975 की दो घटनाओं का जिक्र करते हैं जो इमरजेंसी का तात्कालिक कारण बनीं। पहली घटना रामलीला मैदान की है जहां जयप्रकाश नारायण ने बहुत बड़ी सभा को संबोधित किया। उस सभा में आगे के संघर्ष की घोषणा की गई। लोक संघर्ष समिति बनाई गई जिसके सचिव नानाजी देशमुख थे। यह समिति इसलिए बनाई गई थी ताकि इंदिरा को लोकतांत्रिक रास्ते पर लाया जा सके। अपने अवैध रूप से चुनाव जीतने के लिए वे जनता से माफी मांग लें और अपना इस्तीफा दे दें।

दूसरी घटना रिव्यू पिटिशन से जुड़ी थी। 24 जून को रिव्यू पेटिशन का फैसला आया और उस फैसले में लिखा था कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर रह सकती हैं परन्तु लोकसभा के रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती। इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी को अपनी हार साफ-साफ दिखाई दे रही थी और उन्होंने अपने पद को बचाने के लिए इमरजेंसी का रास्ता चुना।

इमरजेंसी के दौरान उन्होंने संविधान का दो तिहाई हिस्सा बदलवाया। संसद का कानून बदलवाया। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अपने पक्ष में करवाया। दुनिया के इतिहास में पहली बार यह देखने को मिला कि कोई नेता अपनी कुर्सी को बचाने के लिए संविधान की प्रस्तावना से भी छेड़छाड़ कर सकता है। राय के अनुसार इंदिरा ने संविधान की प्रस्तावना में सेकुलरिज्म और सोशलिज्म को जोड़ने का जो आदेश दिया, ऐसा कर के अम्बेडकर और नेहरू का उन्होंने अपमान किया क्योंकि सर्वधर्म और समानता में ही ये शब्द आ जाते हैं।

आपातकाल का 19 महीने का समय भारतीय इतिहास में डार्क फेज़ माना जाता है। रामबहादुर राय के मुताबिक़ इस फेज़ को तीन चरणों में देखा जा सकता है। पहला चरण वह था जिसमें सरकार द्वारा लोगों को यह बताया गया कि इमरजेंसी से सारी चीजें ठीक हो गई हैं। रेल समय पर चलने लगी है, सरकारी कर्मचारी बिना रिश्वत के काम कर रहे हैं। दूसरे चरण में लोगों ने अपने को संगठित किया और संघर्ष करना शुरू किया। उस संघर्ष ने पूरी दुनिया को बताया कि इंदिरा गांधी का विरोध शुरू हो चुका है और इस विरोध का प्रभाव इंदिरा गांधी पर भी हुआ। इस प्रभाव का नतीजा यह हुआ कि इंदिरा ने फिर से चुनाव कराने के बारे में सोचना शुरू कर दिया।

तीसरे चरण की बात करते हुए रामबहादुर राय अपना अनुभव साझा करते हैं। वे बताते हैं कि उनकी मुलाकात जेपी सहित बड़े नेताओं से हुई। उस समय चारों तरफ चुनाव में इंदिरा की वापसी से जुड़ी खबरें सुनाई पड़ रही थी। एक तरफ इंदिरा गांधी अपने चुनाव की तैयारी कर रही थीं तो दूसरी तरफ जेपी जनता पार्टी बनाने की कोशिश में लगे थे। इंदिरा ने विपक्ष के नेताओं को कमजोर करने के लिए उन्हें तोड़ने की पूरी कोशिश की। 18 जनवरी 1976 को लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई। एक ओर इंदिरा को भ्रम था कि उनकी लोकप्रियता शीर्ष पर है और इमरजेंसी में चुनाव होगा तो एक बार फिर वही भारी बहुमत से जीतेंगी। दूसरी तरफ विपक्ष सहमा हुआ था। उनके पास चुनाव लड़ने के लिए न साधन थे और न ही आर्थिक मजबूती परन्तु विपक्ष ने हार नहीं मानी। विपक्ष जेल में रहकर भी अपने आंदोलन को गति प्रदान कर रहा था। पूरे देश में एक ही आवाज़ गूंज रही थी- ‘जेल का ताला टूटेगा मेरा भाई मेरा नेता छूटेगा’।

लोगों ने इंदिरा को अस्वीकार कर दिया। यहीं से हवा अपना रुख बदलती है और 2 फरवरी को कांग्रेसी नेता जगजीवन राम कांग्रेस से अपना इस्तीफा देते हैं और विपक्ष में शामिल होते हैं। तत्पश्चात जेपी और जगजीवन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और जनता पार्टी की जीत हुई। इंदिरा गाँधी और संजय गांधी की हार हुई।

लोग आज भी इमरजेंसी के काले समय को नहीं भूल पाये हैं। रामबहादुर राय कहते हैं कि अब कोई प्रधानमंत्री इमरजेंसी लगाने की भूल या दुस्साहस नहीं करेगा। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए यहां तानाशाह नहीं चलेगा और अगर तानाशाह की प्रवृत्ति नज़र आती है, तो लोग उससे लड़ने के लिए तैयार रहेंगे।


रिपोर्ट: रामानंद शर्मा और शशि शर्मा

छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय
संस्थापक DUDA


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