थाईलैंड: तानाशाही के खिलाफ़ महीनों से प्रदर्शन कर रहे युवाओं से घबरायी सरकार, इमरजेंसी लागू


थाईलैंड में बुधवार को कठोर इमरजेंसी लागू कर दी गयी। वहां की तानाशाह सरकार ने यह फैसला तब लिया जब प्रदर्शनकारी युवाओं ने हज़ारों की संख्‍या में गवर्नमेंट हाउस को घेर लिया, जो प्रधानमंत्री और कैबिनेट का आधिकारिक कार्यालय है।

इमरजेंसी लगाने के पीछे आधिकारिक कारण यह बताया गया है कि प्रदर्शनकारियों ने राजा के काफिले को रोक लिया था। इसकी एक तस्‍वीर निक्‍केइ एशिया ने जारी की है।

इस बीच प्रदर्शनकारियों से पुलिस की झड़प हुई है। कई पर राजद्रोह के मुकदमे हुए हैं और कई को गिरफ्तार किया गया है। बैंकॉक में पांच लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गयी है।

अंतरराष्‍ट्रीय मीडिया में चलने वाली इससे जुड़ी खबरें लोगों तक न जाने पाएं, इसके लिए सबसे बड़े केबल ऑपरेटर ट्रू विज़ंस ने हर अंतरराष्‍ट्रीय कवरेज को सेंसर कर दिया है।

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इस जून-जुलाई से ही थाईलैंड के कॉलेज और हाईस्कूल के छात्र सड़कों पर हैं। वे पूर्व जनरल और प्रधानमंत्री प्रयुत चान ओचा के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। 

हंगर गेम्स और हैरी पॉटर के पात्रों से प्रभावित तीन उँगलियों का सैल्‍यूट (three fingers salute) या फिर जादू की छड़ी (magic wand), उजली पट्टी (white ribbon) का इस्तेमाल छात्र मिलिट्री और राजा की तानाशाही के खिलाफ कर रहे हैं और एक सही जनतंत्र की मांग कर रहे हैं। तमाम खतरों के बावजूद पहली बार खुल कर राजा की भूमिका और जरूरत के बारे में वे बात कर रहे हैं। #WhyDoWeneedAKing जैसे अहम सवाल उठा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि नया संविधान बने और चुनाव हो ताकि एक जनतांत्रिक सरकार का गठन हो। 

बुधवार को इन्‍हीं मांगों ने उग्र रूप ले लिया और युवाओं से घबरायी सरकार ने आधिकारिक इमरजेंसी लगा दी।

जनपथ पर अपने स्‍तम्‍भ देशान्‍तर में मधुरेश कुमार ने पिछले ही महीने विस्‍तार से थाईलैंड में चल रहे आंदोलन की पृष्‍ठभूमि और इतिहास पर एक लंबा आलेख लिखा था। उन्‍होंने बताया था:

अगर ध्यान से देखें तो हाल में हो रहे प्रदर्शन कई मायने में पुरानी राजनीति से बढ़कर एक नयी राजनीति का आगाज़ हैं। जनतंत्र की लड़ाई पहले राजनैतिक दल अपने-अपने नेताओं और राजनैतिक कार्यक्रम और मुद्दों पर लड़ रहे थे। अभी के प्रदर्शन बिना किसी एक या चुनिंदा नेताओं के और एक ग्रुप के द्वारा लीड किये जा रहे हैं। आंदोलन पूर्ण तौर पर छात्रों के द्वारा लीड किया जा रहा है, उसमें राजनीति की नयी भाषा है, समझ है और समाज में मौजूदा राजनैतिक और वर्ग के भेदों से आगे बढ़कर वह तीन साफ़ मांगों से प्रेरित है। पहला, मौजूदा सरकार इस्तीफा दे। दूसरा, नया संविधान बने और तीसरा, उसके तहत एक नयी चुनी हुई जनतांत्रिक सरकार बहाल हो। इसके साथ राजनैतिक बंदियों की रिहाई और राजा की भूमिका पर एक प्रश्नचिन्ह भी है।“  


About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

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