महात्मा गाँधी की ‘नयी तालीम’ के आईने में नयी शिक्षा नीति 2020

गाँधी की नयी तालीम क संदर्भ में तुलनात्मक ढंग से अगर इस नीति की समीक्षा की जाए, तो यह एक प्रकार से पहले से चली आ रही शिक्षा नीतियों में एक अपडेट नोटिफिकेशन की तरह आया है। शिक्षा एवं शिक्षण संबंधी संरचना के अलावे इसमें ऐसा कुछ भी नया या रचनात्मक नहीं है

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गाँधी स्मृति: कितनी दूर, कितनी पास?

मेरे मित्र एवं प्रसिद्ध बुद्धिजीवी अपूर्वानन्द इस प्रश्न को अपनी कई सभाओं में उठा चुके हैं। उनका यह भी कहना है कि दिल्ली के तमाम स्कूलों में उन्होंने यह जानने की कोशिश की और उन्होंने यही पाया कि लगभग 99 फीसदी छात्रों ने इस स्थान के बारे में ठीक से सुना नहीं है, वहां जाने की बात तो दूर रही।

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झारखंड में 60 फीसद अमीरों की जेब में जा रहा है बिजली सब्सिडी का पैसा

करीब 900 परिवारों पर किए गए इस सर्वे के मुताबिक शहरी और ग्रामीण दोनों ही इलाकों में बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी में से कम से कम 60% हिस्सा अमीरों (रिचेस्ट टू फिफ्थ) के पास पहुंच रहा है वहीं सिर्फ 25% भाग गरीबों (पुअरेस्ट टू फिफ्थ) के पास जा रहा है।

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हाथरस कांड के आगे और पीछे सिर्फ और सिर्फ जाति का खेल है, और कुछ नहीं!

हाथरस की घटना दलितों पर होने वाले अत्याचार का आईना मात्र है, लेकिन यह घटना सामूहिक बलात्कार की अन्य घटनाओं से भी आगे बढ़कर है जहां पीड़िता की जीभ को काट दिया गया, रीढ़ की हड्डी को तोड़ दिया गया तथा सामूहिक बलात्कार ने उस लड़की के आत्मसम्मान, स्वाभिमान और मानव गरिमा को धूमिल कर दिया। जहां तक सामाजिक न्याय, सम्मान, विश्वास का सवाल है वह प्रत्येक दिन दलितों के साथ उड़ जाता है।

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बाबरी मस्जिद गिराने की योजना नहीं थी, अचानक गिरी, सारे आरोपित नेता बरी: CBI कोर्ट

जज एसके यादव ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि आरोपितों के खिलाफ़ पर्याप्‍त साक्ष्‍य नहीं हैं। इस तरह राम जन्‍मभूमि के मामले में सौ साल पुराना दीवानी मुकदमा और बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के मामले में 28 साल पुराना फौजदारी मुकदमा हमेशा के लिए समाप्‍त हो गया है।

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कॉमरेड ए.बी. बर्द्धन की याद में भारत के मज़दूर आंदोलन पर एक व्‍यापक नज़र

कॉमरेड ए. बी. बर्धन के 95वें जन्मदिवस तथा श्रम संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस (एटक) की स्थापना के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज द्वारा 25 और 26 सितम्बर को आयोजित ज़ूम मीटिंग का विषय था “भारत के मजदूर आंदोलन की विरासत और आज के संघर्ष”।

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बीमारियों से तबाह दुनिया में बॉलीवुड का नायक कब तक भगवान भरोसे रहेगा?

एक ज़माना था जब सिनेमा एक तरफ डॉक्टर को भगवान दिखाता था और दूसरी ओर मरीजों को भगवान के भरोसे दिखाता था। घर वाले बेचारगी में मंदिर-मंदिर सिर पटकते थे। घंटे से सिर फोड़ते थे। एक ज़माना आज है, जब चिकित्सा व्यवस्था भगवान भरोसे है और मरीज भी भगवान के भरोसे। सिनेमा कॉर्पोरेट भरोसे है।

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एक सदी से पूंजी के जाले में फंसा किसान क्‍या करे?

इस व्यवस्था के जाल में फंसा हुआ किसान इससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। यदि किसानों को इस व्यवस्था के जाल से बाहर निकलना होगा, तो तय है पूंजीपतियों द्वारा जाति धर्म के बुने हुए जाल को खत्म करते हुए देश की संसद पर अपना हक जमाना होगा। मांगें पेश करने भर से काम नहीं चलेगा क्योंकि जो पूरी व्यवस्था है, वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूंजीपतियों के कब्जे में है।

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“सरकार के खिलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा है, अन्ना आंदोलन के सबक और घुसपैठियों के प्रति सतर्क रहें लोग”!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के अधिनायकवादी प्रोजेक्ट के विरुद्ध व्यापक आंदोलन के साथ ही समाज के राजनीतिकरण पर सर्वाधिक जोर देना होगा और सामाजिक संतुलन को बदलना होगा।

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कोयले से होने वाला बिजली उत्पादन कैसे निगल रहा है हमारे बच्चों की ज़िन्दगी?

इस विडियो को बनाने वाली मुख्य संस्थाएं हैं सीआरईए (CREA), डॉक्टर फॉर क्लीन एयर, दिल्ली ट्री एसओएस, एक्स्टिंक्ट रेबेलियन इंडिया, हेल्दी एनर्जी इनिशिएटिव, लेट मी ब्रीथ, माइ राइट टू ब्रीथ, पेरेंट्स फॉर फ्यूचर, वारिअर मॉम्स।

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