मनरेगा: रोजगार से कहीं ज्यादा, आजादी का एक अनुभव
इन क़ानूनों के बाद मजदूरों का सरकार से विश्वास टूटना स्वाभाविक है। यही टूटा हुआ विश्वास आने वाले समय में एक बड़े मजदूर आंदोलन में बदलेगा- हमें इस पर पूरा भरोसा है।
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इन क़ानूनों के बाद मजदूरों का सरकार से विश्वास टूटना स्वाभाविक है। यही टूटा हुआ विश्वास आने वाले समय में एक बड़े मजदूर आंदोलन में बदलेगा- हमें इस पर पूरा भरोसा है।
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व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए शायद यह पहला नया बरस है और पहली क्रिसमस है जब मैं बहुत खुश हूँ। इसकी वजह है फ़लस्तीन से आया एक ईमेल जिसमें बेतेलहेम की एक दोस्त ने एक वीडियो भेजा है और साथ ही बताया है कि दो साल से ग़ज़ा में हो रहे नरसंहार के चलते बेतेलहेम में और सारे फ़लस्तीन में क्रिसमस नहीं मनाया गया था। इस बार बेतेलहेम में क्रिसमस ट्री सजाई गई और क्रिसमस मनायी गई।
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जो समूह आज देश में प्रभावी है, उसका मुख्य उद्देश्य जनता को अलग-थलग करना और सभी संभावित धन (खनिज धन, भूमि पूंजी और अवसर) पर कब्जा करना है, जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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सदियों से इस धरती पर – जिसे हम आज भारत कहते हैं – परस्पर विरोधी विचारों, मान्यताओं और दर्शनों का सहअस्तित्व था, उनके बीच गर्मजोशी से बहसें हुआ करती थीं और ये तमाम बहसें किन्हीं स्वीकार्य तौर-तरीकों के तहत की जाती थीं। मतलब, दूसरे पक्ष की बात को सुनना, उसके खण्डन के लिए तर्क देना और फिर अपनी बात रखना … यह बेहत सख़्ती से लेकिन खुद की और प्रतिपक्षी की गरिमा को बनाए रखते हुए किया जाता था।
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सरकार की प्राथमिकताएँ अभी भी यूपी को आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र बनाने की है और इसीलिए महाकुंभ और दीपोत्सव जैसे कार्यक्रम को यूपी की पहचान बनाने की कोशिश सरकार करती है। इससे क्या यूपी का कोई उज्ज्वल भविष्य हो सकता है?
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किसी देश के लिए कितनी शर्म की बात है कि देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश के ऊपर जूता फेंका जा रहा है और लाखों लोग इसका जश्न मना रहे हैं। ये सोचने की बात है कि ऐसे लोग फिर किस मुँह से न्याय माँगेंगे और किस हक से न्याय व्यवस्था पर विश्वास करेंगे?
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भारत या दुनिया के किसी भी पर्यटन स्थल की ख़ूबसूरती उसकी मौलिकता में होती है। वो जैसे हैं वैसे ही बने रहें। जब हर जगह बाज़ार घुसेगा, हर खूबसूरत जगह का बाज़ारीकरण होगा तो कितने दिन बचे रह पाएँगे ये नदी-पहाड़, ये झील-झरने, ये समंदर और उसकी मौलिकता।
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यूजेनिक्स की सूक्ष्म छाया अभी भी टिकी हुई है। मीडिया और विज्ञापनों में ‘सुंदर, शुद्ध, आकर्षक’ गुणों को अभी भी “अच्छे जनुक” के रूप में दिखाया जाता है। यूजेनिक्स आज नकार दी गई है, फिर भी उसके नीचे भेदभाव की जड़ें अभी भी समाज में हैं। ‘गुड जींस’ ये आज सहज बोले जाने वाले शब्द हैं लेकिन उनके पीछे यूजेनिक्स के भयंकर वारिसे का इतिहास है।
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यदि भारत सच में एक जीवंत लोकतंत्र है, तो उसे राहुल गांधी के उठाए सवालों को सुनना और समझना चाहिए। सत्ता जब सवालों से डरने लगे, तो वह संवादहीनता और आत्ममुग्धता की दिशा में बढ़ती है। लोकतंत्र का क्षरण वहीं से प्रारंभ होता है।
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भूमि अधिग्रहण कानून के समानांतर इस नई नीति के माध्यम से पंजाब के 17 बड़े शहरों के आसपास की कृषि भूमि का उपयोग बदल कर सतत शहरी विकास के लिए उनका अधिग्रहण किया जाना है। इस योजना को लागू करने के लिए सरकार किसानों को ‘समझाने’ में लगी है।
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