बात बोलेगी: हर शाख पे उल्लू बैठे हैं लेकिन बर्बाद गुलिस्ताँ का सबब तो कोई और हैं…

ये खोज जब तक पूरी नहीं होगी तब तक बेचारे शाख पर बैठे उल्लुओं को ही ‘हर हुए और किए’ का दोषी माना जाएगा। बड़ी चुनौती- शुरू कहाँ से करें? घर से? पड़ोस से? गाँव से? समाज से? प्रांत से या देश से? क्योंकि गुलिस्ताँ का मतलब अब भी काफी व्यापक था।

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तन मन जन: इम्यूनिटी क्या वैक्सीन से ही आएगी?

वैक्सीन का इन्तजार कर रहे लोगों को भी मेरा यही संदेश है कि इम्यूनिटी का वैक्सीन डोज यदि सुरक्षित है तो जरूर लीजिए लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि आप प्राकृतिक इम्यूनिटी के लिए प्राकृतिक जीवन शैली में लौटिए। आपकी टिकाऊ इम्यूनिटी प्रकृति ही दे सकती है। इसलिए प्रकृति को बचाइए ताकि आप भी बच सकें।

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पॉलिटिकली Incorrect: रैदास के बेगमपुरा में किताबों के लंगर भी होते, काश!

दिल्‍ली के बॉर्डरों पर रैदास के असंख्य बेगमपुरा उग आए हैं। बस इस बेगमपुरा में एक चीज़ की कमी खलती है- किताबों की। सिंघु पर कुछ लोगों ने मिल कर भगत सिंह लाइब्रेरी बना दी है, जहां लोग बैठकर पढ़ते हैं। एक-दो किताबों की दुकानें भी अस्थाई डेरे में शामिल हो गई हैं।

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दक्षिणावर्त: लोकतंत्र भी चाहिए और खूंटा भी वहीं गड़ेगा, ऐसे कैसे चलेगा?

वाम विचार किस तरह पक्षपोषण करने वाले दिलफरेब तमाशों को अंजाम देता रहा है, अमेरिका की घटना के तुरंत बाद दुनिया भर में आयी प्रतिक्रियाओं को देखने से समझ में आता है।

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पंचतत्व: गंगा मैया की सवारी को मारने का दोष पूरे समाज के सिर पर है

उनके गांव कोई पोस्टर थोड़े ही लगा था कि यह जीव लुप्तप्राय है और इसको न मारें… और क्या गंगा की डॉल्फिन पर आपने उनकी किताबों में कुछ पढ़ाया था?

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आर्टिकल 19: अंधभक्तों के ज़ोर पर राष्ट्र को महान बनाने की ऐतिहासिक शर्मिंदगी

किसी नेता के पीछे चलती हुई भीड़ से सबसे पहली उसकी चेतना छीन ली जाती है। उसकी समझदारी छीन ली जाती है। उसकी आत्मा से इंसानियत के एहसास को मारकर उसके हाथ में थमा दिए जाते हैं पत्थर, लाठियां, गंड़ासे, गोलियां और बंदूकें।

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बात बोलेगी: जनता निजात चाहती है, निजात भरोसे से आता है, भरोसा रहा नहीं, भक्ति कब तक काम आएगी?

विज्ञान से बेवफ़ाई करने पर सदियों से हमारे सनातनी समाज का कुछ नहीं बिगड़ा, तो छह सौ साल एक बाद प्रकट हुए एक हिन्दू राजा के शासनकाल में विज्ञान की परवाह करने की कौन ज़रूरत आन पड़ी? देखा जाएगा जो होगा सो, लेकिन अभी हमें बनती हुई वैक्सीन के जल्दी से जल्दी बन जाने के लिए ही कामनाएं करनी हैं।

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राग दरबारी: मुद्दों के दौर में सामाजिक न्याय की दिशाहीन राजनीति

क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है। या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो।

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तन मन जन: नीति आयोग का ‘विज़न 2035’ और जनस्वास्थ्य निगरानी के व्यापक मायने

भारत में जन स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर आम लोगों को लग सकता है कि सरकार की यह पहल ‘‘स्वागतयोग्य’’ है लेकिन इसका निहित उद्देश्य और उसके पीछे का सच जानना भी जरूरी है।

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पंचतत्व: नर्मदा के भरोसे ज़िंदा साबरमती और उसकी कोख में पलते जैविक बम

अगर आप कभी अहमदाबाद गये हों तो खूबसूरत दिखने वाले रिवरफ्रंट पर भी जरूर गये होंगे. क्या पता आपने नदी के पानी पर गौर किया या नहीं. जानकार कहते हैं कि साबरमती में बहने वाला पानी अत्यधिक प्रदूषित है.

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