मोदी दशक में हिंदी सिनेमा: सॉफ्ट पावर बना सॉफ्ट टारगेट

सांस्कृतिक वर्चस्व की इस लड़ाई में आज हमारे समाज की तरह बॉलीवुड भी खेमों में बंट गया है। यहां भी हिन्दू-मुस्लिम आम हो चुका है और पूरी इंडस्ट्री जबरदस्त वैचारिक दबाव के दौर से गुजर रही है।

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हरियाणा: आधी सीटों पर प्रत्याशी बदलना क्या भाजपा के संकट को दिखलाता है?

भाजपा के लिए अबकी बार हरियाणा में चुनौतियां गंभीर हो गई हैं। मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री काल के लाभ को करनाल में भाजपा भुना कर सीट को अपने खाते में लाना चाहती है। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि एक एक सीट भाजपा के लिए जीत सुनिश्चित करने के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।

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भाजपा के दस फीसद वोट बढ़ने का दावा कर के गृहमंत्री क्या देश को डराना चाह रहे हैं?

भाजपा को 2019 के मुकाबले दस प्रतिशत अधिक मत मिलने का मतलब यही होगा कि 2024 के चुनावों में विपक्ष डेढ़ सौ से भी कम सीटों पर सिमट जाएगा। अमित शाह जो कह रहे हैं अगर वही सत्य है तो यह अभी से मान लेना चाहिए कि 2029 के चुनावों के बाद तो संसद पूरी तरह से विपक्षमुक्त हो जाएगी और एक पार्टी की हुकूमत देश पर क़ाबिज़ हो जाएगी। क्या यह ‘मुमकिन’ हो पाएगा?

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क्या भाजपा और संघ ने 2024 की पटकथा लिख दी है?

नतीजों से साफ है कि इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस अपने मतदाताओं को जोड़े रखने में सफल रही है जबकि भाजपा ने अन्य दलों अथवा निर्दलीय के समर्थन में जाने वाले मतदाताओं को प्रभावित कर अपने पाले में लाने में सफलता प्राप्त की है। मगर, न ही कांग्रेस और न ही दीगर दलों के नेताओं को यह नजर आ रहा है। वे आज भी इस तथ्य पर गौर न करते हुए ईवीएम को कोसने में मशगूल हैं।

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छत्तीसगढ़: ‘छोटे मोदी’ का नरम हिन्दुत्व और भोंपू मीडिया असली के सामने हार गया है!

पांच साल पहले भाजपा को ठुकरा कर जनता ने कांग्रेस को मौका दिया था कि वह भाजपा की सांप्रदायिक-कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों का विकल्प पेश करे, लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने ‘नरम हिंदुत्व’ की राह पर चलने और आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर स्वामित्व छीनने की ही राह अपनाई।

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यूपी में भाजपा के सियासी समीकरण की रोशनी में ‘नेताजी’ को मिला पद्म विभूषण

मोदी सरकार द्वारा मुलायम सिंह को सम्मानित करने का भले ही भाजपा को तत्काल कोई फायदा नहीं मिले, लेकिन अखिलेश यादव और समूची सपा द्वारा जिस तरह से इस सम्मान पर एक सतही विरोध दिखाया गया उसने मुसलमानों में भाजपा के खिलाफ सपा के रवैये पर एक और आशंका जरूर पैदा की है।

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याराना पूंजीवाद की पराकाष्ठा: भाजपा की चुनावी कामयाबी और चुनावी बॉन्ड का रिश्ता

। 2020-21 के अंत तक सभी राष्ट्रीय दलों को चुनावी बांड से मिले चंदे का 80 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला और सभी राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय दलों को मिलाकर मिले चंदे का 65 प्रतिशत भाजपा को मिला। जाहिर है कि भाजपा चुनावी बांड योजना की सबसे बड़ी लाभार्थी है और उसके कुल चंदे का लगभग दो-तिहाई अब चुनावी बांड के माध्यम से आ रहा है।

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दिल्ली में धर्मांतरण: भाजपा और आप दोनों डरपोक

भाजपा से भी ज्यादा डरपोक निकली आप पार्टी! उसने अपने मंत्री को इस्तीफा क्यों देने दिया? वह डटी क्यों नहीं? उसने वैचारिक स्वतंत्रता के लिए युद्ध क्यों नहीं छेड़ा? क्योंकि भाजपा, कांग्रेस और सभी पार्टियों की तरह वह भी वोट की गुलाम है। हमारी पार्टियों को अगर सत्य और वोट में से किसी एक को चुनना हो तो उनकी प्राथमिकता वोट ही रहेगा

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विपरीत परिस्थितियां ही क्रांति को जन्म देती हैं! विधानसभा चुनावों के नतीजों से निकलते सबक

रोचक बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने विपक्षियों को ही ‘सांप्रदायिक’ बता दिया। नेता और जनता के बीच शानदार ‘कनेक्टिविटी’ रखने वाले नरेंद्र मोदी का मतदाताओं पर असर दिखा भी जब मुझे कुछ मतदाताओं के द्वारा कहा गया कि जब मुसलमान समाजवादी पार्टी के पक्ष में एक हो सकते हैं, तो हम लोग बीजेपी के पक्ष में एक क्यों न हो?

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छह चरण बाद भाजपा के तरकश के तीर खतम होते नज़र आ रहे हैं!

भाजपा को 10 मार्च को एक सदमे के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे एक ऐसा नेता परास्‍त करने वाला है जिसकी उम्र भाजपा के राज्य व केन्द्र के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की औसत उम्र से कम है।

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