क्या भाजपा और संघ ने 2024 की पटकथा लिख दी है?

नतीजों से साफ है कि इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस अपने मतदाताओं को जोड़े रखने में सफल रही है जबकि भाजपा ने अन्य दलों अथवा निर्दलीय के समर्थन में जाने वाले मतदाताओं को प्रभावित कर अपने पाले में लाने में सफलता प्राप्त की है। मगर, न ही कांग्रेस और न ही दीगर दलों के नेताओं को यह नजर आ रहा है। वे आज भी इस तथ्य पर गौर न करते हुए ईवीएम को कोसने में मशगूल हैं।

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छत्तीसगढ़: ‘छोटे मोदी’ का नरम हिन्दुत्व और भोंपू मीडिया असली के सामने हार गया है!

पांच साल पहले भाजपा को ठुकरा कर जनता ने कांग्रेस को मौका दिया था कि वह भाजपा की सांप्रदायिक-कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों का विकल्प पेश करे, लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने ‘नरम हिंदुत्व’ की राह पर चलने और आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर स्वामित्व छीनने की ही राह अपनाई।

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यूपी में भाजपा के सियासी समीकरण की रोशनी में ‘नेताजी’ को मिला पद्म विभूषण

मोदी सरकार द्वारा मुलायम सिंह को सम्मानित करने का भले ही भाजपा को तत्काल कोई फायदा नहीं मिले, लेकिन अखिलेश यादव और समूची सपा द्वारा जिस तरह से इस सम्मान पर एक सतही विरोध दिखाया गया उसने मुसलमानों में भाजपा के खिलाफ सपा के रवैये पर एक और आशंका जरूर पैदा की है।

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याराना पूंजीवाद की पराकाष्ठा: भाजपा की चुनावी कामयाबी और चुनावी बॉन्ड का रिश्ता

। 2020-21 के अंत तक सभी राष्ट्रीय दलों को चुनावी बांड से मिले चंदे का 80 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला और सभी राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय दलों को मिलाकर मिले चंदे का 65 प्रतिशत भाजपा को मिला। जाहिर है कि भाजपा चुनावी बांड योजना की सबसे बड़ी लाभार्थी है और उसके कुल चंदे का लगभग दो-तिहाई अब चुनावी बांड के माध्यम से आ रहा है।

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दिल्ली में धर्मांतरण: भाजपा और आप दोनों डरपोक

भाजपा से भी ज्यादा डरपोक निकली आप पार्टी! उसने अपने मंत्री को इस्तीफा क्यों देने दिया? वह डटी क्यों नहीं? उसने वैचारिक स्वतंत्रता के लिए युद्ध क्यों नहीं छेड़ा? क्योंकि भाजपा, कांग्रेस और सभी पार्टियों की तरह वह भी वोट की गुलाम है। हमारी पार्टियों को अगर सत्य और वोट में से किसी एक को चुनना हो तो उनकी प्राथमिकता वोट ही रहेगा

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विपरीत परिस्थितियां ही क्रांति को जन्म देती हैं! विधानसभा चुनावों के नतीजों से निकलते सबक

रोचक बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने विपक्षियों को ही ‘सांप्रदायिक’ बता दिया। नेता और जनता के बीच शानदार ‘कनेक्टिविटी’ रखने वाले नरेंद्र मोदी का मतदाताओं पर असर दिखा भी जब मुझे कुछ मतदाताओं के द्वारा कहा गया कि जब मुसलमान समाजवादी पार्टी के पक्ष में एक हो सकते हैं, तो हम लोग बीजेपी के पक्ष में एक क्यों न हो?

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छह चरण बाद भाजपा के तरकश के तीर खतम होते नज़र आ रहे हैं!

भाजपा को 10 मार्च को एक सदमे के लिए तैयार रहना चाहिए। उसे एक ऐसा नेता परास्‍त करने वाला है जिसकी उम्र भाजपा के राज्य व केन्द्र के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की औसत उम्र से कम है।

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चौथा चरण: दूसरे दल पहले भाजपा की नकल कर रहे थे, अब कहानी पलट चुकी है!

भाजपा को समझ आ गया है कि उसके साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वाले पारम्परिक मुद्दे इस बार काम नहीं कर रहे और अंततः उसे वही बातें करनी पड़ रही हैं जो पहले से ही अन्य मुख्य विपक्षी दल कर रहे हैं। यह विपक्षी दलों की उपलब्धि है कि अभी तक वे भाजपा की नकल करने की कोशिश कर रहे थे, अब भाजपा उनकी नकल कर रही है।

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बिना नतीजे आए ही बहुत कुछ कह गया है उत्तर प्रदेश का चुनाव

भाजपा की उग्र हिंदुत्ववादी सोच ने मुसलमानों को संगठित होने के लिए मजबूर किया है किंतु इसका प्रस्तुतिकरण इस प्रकार से किया जा रहा है कि संगठित मुसलमान भारी मतदान द्वारा सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं और हिन्दू यदि उनके षड्यंत्र को न समझे तो बहुसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों की अधीनता उन्हें स्वीकार करनी होगी।

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भाजपा और संघ की असली समस्या कांग्रेस और ‘परिवार’ नहीं बल्कि देश की जनता है!

‘विश्व गुरु’ बनने जा रहे भारत देश के प्रधानमंत्री को अगर अपना बहुमूल्य तीन घंटे का समय सिर्फ़ एक निरीह विपक्षी दल के इतिहास की काल-गणना के लिए समर्पित करना पड़े तो मान लिया जाना चाहिए कि समस्या कुछ ज़्यादा ही बड़ी है।

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