तस्करी के जाल से निकल के घर लौटी मुड़की को गरीबी के जंजाल से मुक्ति कौन दिलाएगा?

मैं मुड़की से दोबारा बात करने का प्रयास करने लगा। उससे एक अदभुत बात पता चली कि उसे गांव पसंद नहीं आ रहा है। उसे घर में रहना भी पसंद नहीं है। मुड़की बताती है कि दिल्ली में उसका जीवन बेहतर था, वहां उसे बेहतर खाना मिलता था और रहने के लिए भी अच्छी जगह थी।

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19 मार्च का मुजारा लहर संघर्ष: किसान आंदोलन के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना

स्वतंत्रता के बाद भी जमींदारों ने सशस्त्र गिरोहों को रोजगार देना शुरू किया ताकि वे बटाईदारों को नियंत्रित कर सकें। इस अवधि के दौरान रेड पार्टी के नेतृत्व में संघर्षरत किसानों को संगठित किया गया और गाँव किशनगढ़ संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया।

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किसान आंदोलन: सिंघू बॉर्डर पर बनेगा शहीदों का स्मारक, कर्नाटक से आ रही है मिट्टी

संयुक्त किसान मोर्चा ने संज्ञान में लिया कि धरनास्थलों के आसपास अधिक बैरिकेडिंग की जा रही है। हम दिल्ली पुलिस के इस गैरकानूनी और तर्कहीन कार्य की निंदा करते है। एसकेएम मांग करता है कि पुलिस आंतरिक सड़कों सहित ऐसे बैरिकेडिंग को हटाए ताकि स्थानीय लोगों के जीवन को आसान रखा जा सके और उनकी आजीविका की रक्षा की जा सके।

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क्या मोदी के खिलाफ अंग्रेजी में लिखने के चलते मेहता को धोना पड़ा नौकरी से हाथ?

नरेन्द्र मोदी को लेकर थोड़ा बहुत शक तब भी देश के लिबरल लोगों में था। इस शुबहे को रामचंद्र गुहा, प्रताप भानु मेहता और आशुतोष वार्ष्णेय जैसे लोगों ने फासिस्ट न होने का सर्टिफिकेट देकर खारिज कर दिया। परिणामस्वरूप जिस नरेन्द्र मोदी की स्वीकृति पढ़े-लिखे जेनुइन लिबरल लोगों के घरों में नहीं थी, वहां भी हो गई।

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अनामिका-अकादमी, हंस-निशंक के रास्ते हिंदी साहित्य में हिंदू नाजीवाद का स्वीकरण

अगर मान लिया जाय कि अनामिका का पुरस्कार लेना उनका निजी मामला है तो भी यह सवाल तो बनता ही है कि असहिष्णुता के उत्तर-काल में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की कोई नैतिक अपील बची भी है? अगर हां तो कोई बात नहीं. राम राज में सब माफ़ है. और अगर नहीं तो अनामिका के पुरस्कार को निजी ही रहने देना चाहिए. यह हिंदी भाषा और संस्कृति के लिए सार्वजनिक जश्न का मुद्दा कतई नहीं होना चाहिए.

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चुनावों में हस्तक्षेप का निर्णय कर के किसान नेताओं ने कहीं कोई खतरा तो नहीं मोल लिया है?

कहीं किसान नेता अपने आंदोलन को परिणाममूलक बनाने की हड़बड़ी में किसान आंदोलन के अब तक के हासिल (जो किसी भी तरह छोटा या कम नहीं है) को दांव पर लगाने का खतरा तो मोल नहीं ले रहे हैं? क्या किसान नेता संबंधित प्रान्तों के किसानों को उन पर मंडरा रहे आसन्न संकट की बात पर्याप्त शिद्दत और ताकत के साथ बता पाएंगे?

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शहीदों की याद में तीन राज्यों से 18 मार्च को निकलेगी किसान-मजदूर पदयात्रा, 23 को पहुंचेगी दिल्ली

एक पदयात्रा 18 मार्च को लाल सड़क हांसी से शुरू होकर 23 मार्च को टीकरी बार्डर पहुंचेगी. दूसरी पंजाब के खटकड़ कलां से शुरू हो कर पानीपत आएगी और हरियाणा के जत्थे से मिलकर पैदल 23 मार्च को सिंघू बार्डर पहुंचेगी. तीसरी मथुरा से शुरू होकर पलवल पड़ाव पर पहुंचेगी.

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गृहिणियों को पगार देने का चुनावी वादा और सार्वजनिक दायरे में बराबरी के अवसर का सवाल

चुनावी वादे कितने पूरे होते हैं यह तो हम सभी जानते हैं इसलिए इस पर बात ना करें तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इन घोषणाओं तथा समझदारियों से हम स्त्री के मुद्दे पर समझ के बारे में चर्चा जरूर कर सकते हैं।

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भाजपाई राज्यों के लोकल रोजगार कानूनों और अखंड भारत के बीच फंसी संवैधानिकता

जब केंद्र की भाजपा सरकार एक राष्ट्र-एक टैक्स, एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड जैसी नीतियों को लेकर आगे बढ़ रही हो, जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा छीन एक विधान के बात की गई हो और वहां की नौकरियों को समस्त भारतीयों के लिए खोला जा रहा हो, तब हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार संविधान से परे जाकर हरियाणा से बाहर की जनता के लिए बेगानी क्यों बन रही है?

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इस अविश्वास प्रस्ताव ने किसानों के खिलाफ राजनीतिक दुरभिसंधि का परदाफाश कर दिया

हरियाणा में विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में कांग्रेस के 30 व 2 निर्दलीय यानी कुल 32 विधायकों ने वोट किया जबकि‍ जजपा समर्थित भाजपा सरकार को हलोपा (1), निर्दलीय (5), जजपा (10) व भाजपा के 39 मिला कर कुल 55 विधायकों का समर्थन मिला!

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