उत्तरी बंगाल: कूच बिहार की घटना बदल सकती है बाकी चार चरणों की तस्वीर

जिस तरीके से कूच बिहार की घटना पर ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया देते हुए सिलीगुड़ी में प्रेस कान्फ्रन्स रख के पत्रकारों के सामने फोन पर गोलीबारी के शिकार एक व्यक्ति से बात करवायी, यह दिखाता है कि अगले चार चरण में तृणमूल अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे दम खम के साथ भाजपा को चुनौती देगी.

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नक्सलबाड़ी का भुला दिया गया परिवार, BJP के ‘मिशन बंगाल’ पर जिसका नमक है उधार!

’मिशन बंगाल’’ की 25 अप्रैल, 2017 को शुरुआत के हफ्ते भर भीतर ही अखबारों ने रिपोर्ट किया कि राजू-गीता ने टीएमसी ज्‍वाइन कर लिया है। अखबारों ने यह भी लिखा था कि ये दोनों पहले भाजपा के कार्यकर्ता थे। चार साल बाद इनसे मिलने पर समझ आता है कि न ये भाजपा के थे, न कभी टीएमसी के रहे।

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जादवपुर की दीवारों तक सिमट कर रह गया CAA-NRC, गाँगीय क्षेत्र में TMC को लील गया अम्‍फन

जादवपुर सीट के आसपास ज्‍यादातर विभाजन के बाद आकर बसे हुए लोग हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन्‍हें अपने प्रचार से यह विश्‍वास दिला दिया है कि मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी इन्‍हें ‘बाहरी’ मानती है।

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तापसी के पिता की खामोशी कह रही है कि सिंगुर का ब्याज अबकी ममता को नहीं मिलेगा!

सिंगुर में 10 अप्रैल को मतदान होना है। इतना तय है कि अगर सिंगुर ने ममता को खारिज कर दिया तो राज्‍य में उनकी वापसी संदेह के घेरे में आ जाएगी। फिलहाल शहीद के पिता की सावधान ज़बान इतना जरूर संकेत दे रही है कि सिंगुर आंदोलन का ब्याज ममता को जितना मिलना था, मिल चुका।

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हिन्दुत्व के जनक तो हुगली में हुए, फिर सावरकर की फोटो लगाकर संघ क्या जाली हिन्दुत्व बेचता रहा?

यह बार-बार कहा जाने वाला झूठ है कि हिंदुत्‍व के जनक विनायक दामोदर सावरकर थे। जब चंद्र नाथ बसु हिंदुत्‍व पर किताब लिख रहे थे, तब हिंदू महासभा और बाद में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की बुनियाद डालने वाले महान व्‍यक्तित्‍वों में वरिष्‍ठतम बीएस मुंजे 20 साल के थे, सावरकर महज नौ साल के थे, हेडगेवार तीन साल के थे और गुरु गोलवलकर तो पैदा भी नहीं हुए थे।

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तोलाबाज़ी और तुष्टीकरण: ममता बनर्जी से व्यापक नाराजगी के दो अहम कारण

बीजेपी के पास चुनाव लड़ने के लिए यहां यही दो मुद्दे हैं – ममता राज में भ्रष्टाचार और मुस्लिम तुष्टीकरण। इन दो मुद्दों को जनता के बीच उतारने में भाजपा सफल रही है, ऐसा दावा किया जा सकता है।

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कथा कलकत्ता: एक बौद्धिक समाज के अवसान के सात दशक की आंखों देखी स्मृतियां

जिस कलकत्ते का मैंने जिक्र किया वह तो विलुप्त हो गया। अब तो बस दो-चार नामलेवा लेखक-कवि रह गए हैं जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। कविता के क्षेत्र में युवा पीढ़ी की संख्या इतनी है कि आप गिन नहीं सकते जबकि इनकी कविता में सबकुछ होता है पर कविता नहीं होती। कहानी लेखन का भी वही हाल है। संस्थाओं और मंचों पर कब्ज़ा ऐसे लोगों का है जो अपने प्रिय और प्रियाओं को मंच देते हैं। गंभीर लिखने वालों को दूर रखते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनको मंच दिया तो इनकी विद्वता की कलई न खुल जाए।

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नंदीग्राम के दो हेवीवेटों के बीच एक सशक्त आवाज़, जिसे मीडिया ने तवज्जो नहीं दी!

नंदीग्राम में वाम मोर्चे की प्रत्याशी मिनाक्षी मुखर्जी के सवालों को, उनके चुनाव लड़ने के तरीकों को भले ही मुख्यधारा की मीडिया ने जगह नहीं दी पर जमीन से जुड़ी मिनाक्षी और उसके सवालों ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ रहे दो दिग्गजों को चिंता में डाल दिया।

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चुनाव बंगाल का, दांव पर राजनीति दिल्ली की!

गौर किया जा सकता है कि ममता बनर्जी इतनी डरी हुईं, घबराई हुईं और आशंकित पिछले एक दशक में कभी नहीं देखी गईं। वे अभी तक तो कोलकाता में बैठकर ही दिल्ली को ललकारती रहीं हैं पर अब दिल्ली स्वयं उनके दरवाज़े पर है और चुनौती भी दे रही है। बंगाल में कुछ भी हो सकता है!

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चुनावों में हस्तक्षेप का निर्णय कर के किसान नेताओं ने कहीं कोई खतरा तो नहीं मोल लिया है?

कहीं किसान नेता अपने आंदोलन को परिणाममूलक बनाने की हड़बड़ी में किसान आंदोलन के अब तक के हासिल (जो किसी भी तरह छोटा या कम नहीं है) को दांव पर लगाने का खतरा तो मोल नहीं ले रहे हैं? क्या किसान नेता संबंधित प्रान्तों के किसानों को उन पर मंडरा रहे आसन्न संकट की बात पर्याप्त शिद्दत और ताकत के साथ बता पाएंगे?

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