Article 21 पर यह संजीदा होने का वक्‍त है, ताकि दफ़न न होने पाएं बेगुनाहों को मिले ज़ख्‍म


कोई न कोई ज़रूर जोसेफ के बारे में झूठी सूचनाएं दे रहा होगा, वह जानता था कि उसने कोई गलत काम नहीं किया है लेकिन एक अलसुबह उसे गिरफ्तार किया गया।

The Trial, Franz Kafka

यह शुरुआती पंक्तियां बहुचर्चित उपन्यासकार फ्रांज़ काफ्का के उपन्यास ‘द ट्रायल’ की हैं जो लगभग एक सदी पहले 1925 में प्रकाशित हुआ था। उपन्यास किन्हीं जोसेफ के इर्द-गिर्द घूमता है, जो किसी बैंक में मुख्य कैशियर है, जिसे उसकी तीसवीं सालगिरह पर दो अपहचाने लोगों द्वारा अचिह्नित अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है।

उपन्यास उसकी उन तमाम कोशिशों पर केन्द्रित है जिसमें वह उस पर लगे आरोपों का पता करने की कोशिश करता रहता है, जो कभी स्पष्ट नहीं होते। उपन्‍यास उसके उन बदहवास प्रयासों की बात करता है जहां वह उन आरोपों से मुक्त होने की कोशिश करता है। उपन्यास का अंत उसके 31वें जन्मदिन के महज दो दिन पहले शहर के बाहर एक खदान के पास उसकी हत्या में होता है।

मालूम हो कि यह महान लेखक- जिसे बीसवीं सदी के विश्व साहित्य की अज़ीम शख्सियत समझा जाता है, जो बहुत कम उम्र में चल बसे (1883-1924) चाहते थे कि उनकी तमाम पांडुलिपियां- जिसमें उनका यह अधूरा उपन्यास भी शामिल था- उनके मरने के बाद जला दी जाएं। यह अलग बात है कि उनके करीबी दोस्त मैक्स ब्रॉड, जिसे उन्होंने यह जिम्मा सौंपा था, उन्होंने उनके निर्देशों को नहीं माना और जिसका नतीजा था एक कालजयी रचना, जो असंवेदनशील और अमानवीय नौकरशाही तंत्र के सामने एक साधारण व्यक्ति के संघर्ष के बहाने उसको बेपर्द करती है और नागरिक अधिकारों के व्यापक अभाव की स्थिति को रेखांकित करती है।

अगर हम अपने करीब देखें तो ऐसे तमाम लोग मिल सकते हैं जो इसी तरह व्यवस्था के निर्मम हाथों का शिकार हुए- मामूली अपराधों में न्याय पाने के लिए उनका लम्बे समय तक जेलों में सड़ते रहना या फर्जी आरोपों के चलते लोगों का अपनी जिन्दगी के खूबसूरत वर्षों को जेल की सलाखों के पीछे दफना देना।

आमिर को अपनी जिन्दगी के 14 साल नकली आरोपों के लिए जेल में गुजारने पड़े थे

पता नहीं लोगों को एक युवक आमिर का वह प्रसंग याद है कि नहीं जिसे अपनी जिन्दगी के 14 साल ऐसे नकली आरोपों के लिए जेल में गुजारने पड़े थे, जिसमें कहीं दूर-दूर तक उसकी संलिप्तता नहीं थी। उस पर आरोप लगाया गया था कि दिल्ली एवं आसपास के इलाकों में हुए 18 बम विस्फोटों में वह शामिल था। यह अलग बात है कि यह आरोप जब अदालत के सामने रखे गए तो एक-एक करके अभियोजन पक्ष के मामले खारिज होते गए और आमिर 2012 में बेदाग रिहा हो गया।

यह अलग बात है कि इन चौदह वर्षों में उसके पिता का इन्तक़ाल हो चुका था और मां की मानसिक हालत ऐसी नहीं थी कि वह बेटे की वापसी की खुशी को महसूस कर सके। आमिर को जिस पीड़ादायी दौर से गुजरना पड़ा, जिस तरह संस्थागत भेदभाव का शिकार होना पड़ा, पुलिस की साम्प्रदायिक लांछना को झेलना पड़ा, यह सब एक किताब में प्रकाशित भी हुआ है। ‘फ्रेम्‍ड ऐज़ ए टेररिस्ट’ शीर्षक से 2016 में प्रकाशित इस किताब के लिए जानी-मानी पत्रकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्त्री नंदिता हक्सर ने काफी मेहनत की है।

कुछ दिन पहले डॉ. कफ़ील खान की हुई बेदाग रिहाई, जब उन्हें सात माह के बाद रिहा किया गया, दरअसल इसी बात की ताईद करती है कि अगर सरकारें चाहें तो किसी मासूम व्यक्ति के जीवन में कितना कहर बरपा कर सकती है। याद रहे, उच्च न्‍यायालय के सख्त एवं संतुलित रवैये के बिना यह रिहाई मुमकिन नहीं थी, जिसने डॉ. कफ़ील खान के खिलाफ खड़े किए गए इस केस को ही ‘अवैध’ बताया।

सरकारें जब एक खास किस्म के एजेण्डा से भर जाती हैं और लोगों की शिकायतों के प्रति निर्विकार हो जाती हैं तो ऐसे ही नज़ारों से हम बार-बार रूबरू होते हैं।

कफ़ील खान को रिहा हुए तीन सप्ताह से अधिक वक्त़ गुजर गया है- इसलिए किसी को यह चर्चा थोड़ी पुरानी लग सकती है- फिर भी उनकी ‘अवैध’ गिरफ्तारी और उन्हें झेलनी पड़ी यातना की बात करना ज़रूरी है क्योंकि ऐसा किस्सा किसी के साथ भी हो सकता है। हमारी पुलिस एवं न्याय प्रणाली में कफ़ील खान का प्रसंग अपवाद नहीं है। उनका नाम कभी इफ्तिखार गिलानी भी हो सकता है, जिन्हें कभी ‘ऑफिशियल सिक्रेटस एक्ट’ के तहत जेल में डाल दिया गया था और फिर बाइज्जत रिहा किया गया या उस स्थान पर छत्तीसगढ के किसी आदिवासी का नाम भी चस्पां हो सकता है, जिसे इसी तरह सालों साल जेल में गुजारने पड़े हों और फिर बिना किसी सबूत के अभाव के बरी कर दिया गया हो।

मालूम हो कि डॉ. कफ़ील खान को उस भाषण के लिए गिरफ्तार किया गया था जो उन्होंने दिसम्बर में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के सामने दिया था, जब सीएए के खिलाफ पूरे मुल्क में आन्दोलन खड़ा हुआ था। इस भाषण के दो माह बाद पुलिस ने उन्हें ‘शांतिभंग’ के आरोप में बन्द किया था। उपरोक्त व्याख्यान को जिसने भी सुना था वह जानता था कि कफ़ील खान के भाषण के चुनिन्दा हिस्सों के आधार पर ही उन्हें प्रताड़‍ित किया जा रहा है क्योंकि उनका पूरा भाषण देश की एकता एवं अखंडता की रक्षा की बात करता था, अमन चैन भाईचारा बनाये रखने की बात करता था। उच्च अदालत ने डॉ. कफ़ील खान के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा लगाये गये आरोपों को खारिज करते हुए जो लिखा है वह पूरा पढ़ा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि इस भाषण को पूरा सुनने के बाद कहीं से भी नहीं लगता कि वक्ता नफ़रत को बढ़ावा दे रहा है। ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि जिला मजिस्ट्रेट ने भाषण के मूल मकसद की उपेक्षा करके उसमें उल्लेखित चुनिन्दा बातों पर ही गौर किया है।’’

सवाल यह उठता है कि आखिर इस बात को कैसे सुनिश्चित किया जाए कि आने वाले वक्त़ में किसी निरपराध को डॉ. कफ़ील खान या आमिर जैसी स्थिति से गुजरना न पड़े? क्या तरीका हो सकता है कि इन बेगुनाहों को झूठे आरोपों के इस बोझ के साये से- भले ही वह कानूनन मुक्त हो गये हों- मुक्ति दिलायी जाए?

शायद सबसे आसान विकल्प है ऐसे लोगों को- जिनके साथ व्यवस्था ने ज्यादती की- आर्थिक मुआवजा देना, जैसा कि पिछले माह राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने किया जब उसने छत्तीसगढ़ सरकार को यह निर्देश दिया कि वह उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विदूषियों को मुआवजा प्रदान करे जिन पर वर्ष 2016 में झूठी एफआइआर दर्ज की गयी थी। मालूम हो कि अध्यापकों, कार्यकर्ताओं का वह दल- जिसमें प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, प्रो. अर्चना प्रसाद, कामरेड विनीत तिवारी, कामरेड संजय पराते आदि शामिल थे- मानवाधिकारों के हनन की घटनाओं की जांच करने वहां गया था।

मानवाधिकार आयोग ने कहा कि ‘‘हमारी यह मुकम्मल राय है कि इन लोगों को इन झूठे एफआइआर के चलते निश्चित ही भारी मानसिक यातना से गुजरना पड़ा, जो उनके मानवाधिकार का उल्लंघन था और राज्य सरकार को उन्हें मुआवजा देना ही चाहिए।’’

क्या ऐसा मुआवजा वाकई उन वर्षों की भरपाई कर सकता है, उस व्यक्ति तथा उसके आत्मीयों की मानसिक पीड़ा को भुला दे सकता है? निश्चित ही नहीं!

मुआवजे की चर्चा चल रही है तो बरबस एक तस्वीर मन की आंखों के सामने घूम गयी जो पिछले दिनों वायरल हुई थी। इस तस्वीर में एक अश्वेत व्यक्ति को बेंच पर बैठे दिखाया गया था, जिसके बगल में कोई श्वेत आदमी बैठा है और उसे सांत्वना दे रहा है। ख़बर के मुताबिक श्वेत व्यक्ति ने उसके सामने एक खाली चेकबुक रखा था और कहा था कि वह चाहे जितनी रकम इस पर लिख सकता है, मुआवजे के तौर पर।

अश्वेत आदमी का जवाब आश्चर्यचकित करने वाला था।

‘‘सर, क्या वह रक़म मेरी पत्नी और बच्चों को लौटा सकती है, जो भयानक गरीबी में गुजर गये जिन दिनों मैं बिना किसी अपराध के मैं जेल में सड़ रहा था?’’

ध्यान रहे कि गलत ढंग से फंसाये गये बेगुनाहों को मुआवजा देने की बात यहां कानून की किताबों में दर्ज नहीं हो सकी है।

याद करें कि तत्कालीन आंध्र प्रदेश सरकार ने मानवाधिकार समूहों द्वारा निरंतर डाले गये दबाव के बाद वर्ष 2007 के मक्का मस्जिद बम धमाका केस में पकड़े गये 16 बेगुनाहों को मुआवजा देने का ऐलान किया था। मुआवजे का भुगतान इस बात की ताईद कर रहा था कि उन्हें गलत ढंग से फंसाया गया था।

मुआवजा दिये जाने के डेढ़ साल के अन्दर ही उच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और इस मुआवजे के आदेश को खारिज किया और कहा कि जिन लोगों को मुआवजा दिया गया है, उसकी वापसी करवायी जाए। अदालत का कहना था कि ‘‘आपराधिक केस से दोषमुक्त हो जाना या बरी हो जाना, यह कोई आधार नहीं हो सकता मुआवजा प्रदान करने का।’’

दरअसल, हम सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य फैसले को (2014) याद कर सकते हैं जिसने मुआवजे की तमाम दलीलें इस वजह से सिरे से खारिज की थीं कि उसका कहना था कि इससे एक गलत नज़ीर कायम हो सकती है।

तय बात है कि ऐसी तमाम गैरकानूनी गिरफ्तारियों एवं यातनाओं से अगर छुटकारा पाना हो तो जनतंत्र के विभिन्न खंभे, वे तमाम संस्थागत प्रणालियां जिन्हें संविधान के निर्माताओं ने कायम किया है- जिसमें एक दूसरे के बीच संतुलन पाने की भी कोशिश है- वे सही ढंग से काम करते रहें, यही हो सकता है। अगर कार्यपालिका किसी के मानवाधिकार का उल्लंघन करती दिखती है तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है या विधायिका मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपने प्रभावों का इस्तेमाल कर सकती है।

भटकी बेगम/ The Wire

यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये तमाम प्रणालियां आसानी से सुगम और पारदर्शी बनी रहें ताकि भटकी बेगम जैसी कोई महिला को 19 साल से न्याय के इन्तज़ार में भटकते न रहना पड़े।

मालूम हो कि मीडिया में कश्मीर के रफियाबाद के टागपोरा की सत्तर साल की उम्र की भटकी बेगम की ख़बर छपी है जिसका 28 साल का बेटा मंजूर अहमद वानी सेना की हिरासत से ही लापता हो गया था (2001)। हाल में ही एक इखवानी (सरेंडर्ड मिलिटेण्ट) जो उनके बेटे के अपहरण में शामिल था, उसे इस अपराध के लिए दंडित किया गया है।

दरअसल, एक न एक दिन इस मुल्क की विधायिका को ऐसे तमाम अधिकारियों के बारे में- जो व्यक्तियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन में शामिल पाये जाते हैं- एक फैसला लेना ही होगा और यह तय करना होगा कि उन्हें अनुशासित करने के लिए वह क्या कदम उठाने वाली है। निश्चित ही यह एक चुनौती भरा काम है जिसे अक्सर यह कहते हुए खारिज किया जाता है कि इससे पुलिस या नौकरशाही का मनोबल गिर जाएगा।

शायद वक्त़ आ गया है कि हम संविधान की अनुच्‍छेद 21 के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का नये सिरे से इज़हार करें जो इस बात को रेखांकित करता है कि ‘कानून द्वारा सम्मत प्रक्रिया के अपवाद को छोड़ कर किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन से या उसकी निजी आज़ादी से वंचित नहीं किया जाएगा’।

क्या इस मुल्क के कर्णधार इसके लिए तैयार हैं?


लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार, अनुवादक और वामपंथी कार्यकर्ता हैं

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