काबुल: अभी असल सवाल सभी जातियों और कबीलों को मिला के सरकार बनाने का है
पिछले 200 साल में ब्रिटेन, रूस और अमेरिका को पठान धूल चटा चुके हैं। अब शायद चीन की बारी है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर यदि अब चीन अपनी चाल चलेगा तो वह भी मुँह की खाएगा।
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पिछले 200 साल में ब्रिटेन, रूस और अमेरिका को पठान धूल चटा चुके हैं। अब शायद चीन की बारी है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर यदि अब चीन अपनी चाल चलेगा तो वह भी मुँह की खाएगा।
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भारत सरकार की अफगान नीति वे मंत्री और अफसर बना रहे हैं, जिन्हें अफगानिस्तान के बारे में मोटे-मोटे तथ्य भी पता नहीं हैं। हमारे विदेश मंत्री इस समय न्यूयार्क में बैठे हैं और ऐसा लगता है कि हमारी सरकार ने अपनी अफगान-नीति का ठेका अमेरिकी सरकार को दे दिया है। वह तो हाथ पर हाथ धरे बैठी है।
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तालिबान पाकिस्तान के प्रगाढ़ ऋणी हैं लेकिन वे भारत के दुश्मन नहीं हैं। उन्होंने अफगानिस्तान में भारत के निर्माण-कार्य का आभार माना है और कश्मीर को भारत का आतंरिक मामला बताया है। हामिद करजई और डॉ. अब्दुल्ला हमारे मित्र हैं। यदि वे तालिबान से सीधी बात कर रहे हैं तो हमें किसने रोका हुआ है?
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प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव समाजवाद की उदार विचारधारा और अपने पिछले कार्यकाल के ठोस कामों में भरोसा जताते हैं। उनका मानना है कि इस बार का चुनाव 2017 की तरह फर्जी नहीं, असली मुद्दे पर होगा। लखनऊ में तमाम मुद्दों पर उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी की हुई लंबी बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।
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वेस्ट इंडियन द्वीपों को उनकी भाषा और संस्कृति उतना एक नहीं करती जितना गुलामी का वह साझा अभिशाप करता है, जिसकी जड़ें औद्योगिक खेती की उत्पीड़नकारी अर्थव्यवस्था में हैं। हैती और क्यूबा दोनों इसी ज़ाती मसले के उत्पाद हैं। बस अंतर इतना है कि एक ने 1804 में ही गुलामी की बेडि़यां तोड़ दी थीं जबकि दूसरा करीब डेढ़ सदी के बाद आज़ाद हुआ।
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सत्तारूढ़ दल के लिए विपक्षी दलों के साथ-साथ जनता की भूमिका को भी संदेह की नज़रों से देखने की ज़रूरत का आ पड़ना इस बात का संकेत है कि वह अब अपने मतदाताओं को भी अपना विपक्ष मानने लगा है।
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रविशंकर प्रसाद के कहे के बाद एक नया डर उत्पन्न हो गया है। वह यह कि किसी दिन कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति खड़े होकर यह बयान नहीं दे दे कि अगर दुनिया के 167 देशों के बीच ‘पूर्ण’ प्रजातंत्र सिर्फ़ तेईस देशों में ही है और सत्तावन में अधिनायकवादी व्यवस्थाएं क़ायम हैं तो भारत को लेकर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है?
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कोरोनाकाल की दूसरी लहर के दौरान भगीरथी गंगा द्वारा अपने कोमल शरीर पर बहती हुई लाशों की यंत्रणा बर्दाश्त कर लिए जाने के बाद अपनी पहली यात्रा में प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के कोरोना प्रबंधन को अभूतपूर्व घोषित करते हुए इतनी तारीफ़ की कि वहां उपस्थित मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी भी भौचक्के रह गए होंगे।
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हिंदी को बस हिंदी रहने देना चाहिए। इसको क्लिष्ट और आसान के खांचों में काहे बांटना। हिंदी सहज-सरल तौर पर विदेशी भाषा के शब्दों को ग्रहण करती आयी है और यही किसी भाषा के सामर्थ्यवान होने का भी द्योतक है।
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जिसने भी यह कहा था कि, ‘जिस तरह तू बोलता है, उस तरह लिख’- इस कथन को बिना समझे सतही रूप से हिंदी पर लागू करने के दुष्परिणाम आज हमारे सामने हैं।
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