राग दरबारी: जिन्ना के बाद पहली बार भारत में नयी करवट लेती मुस्लिम सियासत

चूंकि हिन्दू नेतृत्व मुसलमानों की सुरक्षा करने में लगातार असफल हो रहा है इसलिए ओवैसी में भारतीय मुसलमान अपना भविष्य देखने लगा है। शायद ओवैसी भारत में एक अलग तरह की राजनीतिक शब्दावली और बिसात बिछाने की ओर अग्रसर हैं।

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तन मन जन: कोरोनाकाल में डायबिटीज़ का जानलेवा कहर!

इस कोरोनाकाल में मधुमेह रोगियों की ज्यादा उपेक्षा हो रही है। प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल ‘द लान्सेट’ के एक अध्ययन के अनुसार ज्यादा उम्र के डायबिटिक लोगों की स्थिति कोरोनाकाल में जानलेवा है। यह अध्ययन चीन के वुहान के दो अस्पतालों में 191 मरीजों पर किया गया।

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पंचतत्वः हे सौरा माय, कनी हौले बहो…

ब्रिटिश छाप लिए बिहार के शहर पूर्णिया में एक नदी है, सौरा. यह नदी बेहद बीमार हो रही है. सूर्य पूजा से सांस्कृतिक संबंध रखने वाली नदी सौरा अब सूख चली है और लोगों ने इसके पेटे में घर और खेत बना लिए हैं. भू-माफिया की नजर इस नदी को खत्म कर रही है और अब नदी में शहर का कचरा डाला जा रहा है.

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बात बोलेगी: जीत के सौ अभिभावक और हार का अनाथ हो जाना

क्या बिहार के चुनाव में उन मुद्दों का कोई मतलब नहीं था, जिनसे राष्ट्रीय राजनीति की दशा-दिशा बनती बिगड़ती है? इन मुद्दों को उठाने की कीमत कांग्रेस ने न केवल बिहार, बल्कि तमाम राज्यों में चुकायी है, लेकिन प्रादेशिक चुनाव को महज़ स्थानीय तो नहीं बनाया जा सकता है न?

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तन मन जन: कोरोनाकाल में कैंसर के उपेक्षित रोगी

कोरोनाकाल में कैंसर रोगियों की उपेक्षा ने न केवल कैंसर बल्कि अन्य भयावह रोगों की गिरफ्त में फंसे असहाय लोगों के ज़ख्म पर नमक छिड़कने का काम किया है। साथ ही अमानवीयता के उदाहरण भी पेश किए हैं।

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दक्षिणावर्त: अपने ब्रह्म और आत्‍म से दूर होता हिंदू

सनातन संस्कार में समय का टुकड़ा, जिसे हम काल के नाम से जानते हैं, वह बहुत ही दूसरे अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है, यदि इसे हम टाइम या समय के संदर्भ में देखें तो। यही वजह है कि आपको भारतवर्ष के शताब्दियों से गर्वोन्नत मंदिरों, स्थापत्य के चमत्कार गगनचुंबी धरोहरों के निर्माताओं का नाम कहीं नहीं मिलेगा।

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पंचतत्वः पुरुष नद, स्त्री नदियां और इनकी गोद में छुपा हमारा लोक-इतिहास

नदियों के नाम के साथ जुड़े किस्से बहुत दिलचस्प हैं. हर नाम के पीछे एक कहानी है और एक ही नाम की नदियां देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद हैं.

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तिर्यक आसन: परिवार और सामुदायिकता में लगा परजीवी स्टेट का कीड़ा

अपने प्रतिनिधियों की सरकार और अपने आविष्कारों पर जनता की निर्भरता देख स्टेट चिंतामुक्त हो गया है। हमारी चेतना पर वो तमाम पट्टियाँ बाँध चुका है। एक पट्टी खुलती है, तब तक राजनीति और धर्म के प्रतिनिधियों के सहयोग से नई पट्टी बाँध देता है।

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बात बोलेगी: मैं दुनिया के मेयार पर खरा नहीं उतरा, दुनिया मेरे मेयार पर खरी नहीं उतरी…

अदालत थोड़ा मुहज्ज़िब लहज़े में मुनव्वर से पूछती है कि ज़रा अपनी पेशानी पर बल डालो और याद करो कि देश में इतने मासूमों की लिंचिंग के बाद भी कभी ज़ी न्यूज़ का कोई पत्रकार हिन्दी के किसी ऐसे कवि से उसकी प्रतिक्रिया लेने गया जो मोहब्बत के, श्रृंगार के गीत रचता है? क्या हिंदी के छपास कवियों से उसने कभी यह पूछा कि आपके धर्म के एक बंदे ने सरेआम एक गरीब मुसलमान को जला दिया है, आपको क्या कहना है?

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तन मन जन: चुनावी लहर के बीच उभर चुकी कोरोना की दूसरी लहर पर कब बात होगी?

चुनाव के दौरान नेताओं के लिए जनता का उमड़ना लाजिमी है। बिहार चुनाव में तो कोरोना कहीं लग ही नहीं रहा। आश्चर्य है। न कोई गाइडलाइन न कोई परहेज। मास्क की बात तो क्या करें लोगों को नंगे बदन बूथ पर वोट डालने के लिए घंटों कतार में लगे देख लें।

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