“बनारस में रह कर मैं बनारस से कितना दूर था और गिरीश कितने पास”!


बात 1990 के दशक की है जब मैं प्रो. इरफ़ान हबीब के एक आमंत्रण पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास, उच्च अध्ययन केंद्र में एक माह की विज़िटरशिप के लिए गया हुआ था. इत्तफ़ाक़ से उन्हीं दिनों गिरीश जी भी अपने एक नाटक को जीवंत और तथ्यपरक बनाने के लिए प्रो. हबीब के पास आये हुए थे.

इरफ़ान साहब ने मेरा परिचय बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के नौजवान इतिहासविद और कम्युनिज्म तथा कांग्रेसियत के अद्भुत समावेशी व्यक्तित्व के रूप में उनसे कराया, तो कार्नाड ने मुस्कुराते हुए कहा कि इस विविधता पर तो कब का ज़ंग लगनी शुरू हो चुकी है. “तुम किस दुनिया से आये हो भाई?”

फिर एक लंबी सांस खींचते हुए उन्होंने कहा, “हां, समझ में आ गया. ग़ालिब भी तो आपके शहर में जाकर गंगा स्नान करके इसी समावेशी तहजीब का शिकार हो चला था और दारा शिकोह, वली अहद से इंसान बन बैठा था!”

इतिहास की उनकी समझ बहुत व्यापक थी. अजीब-अजीब सवाल उनके मन में उभरते थे एक एक्टिविस्ट की तरह. वाकई, उनका पूरा जीवन ही एक्टिविज्म करते बीता. व्यवस्था के खिलाफ उनका संघर्ष मित्र और अमित्र में भेद नही करता था. वे तो सिर्फ बेहतर समाज बनाने और विरासत को बचाये रखने वाले अपराजित योद्धा थे. माध्यम कभी कविता, संगीत, कभी नाटक, कभी अभिनय, तो कभी सामाजिक सरोकारों के विभिन्न मंच रहे जहां वे निर्भीक खड़े होकर हम जैसे अनेक लोगों का मार्गदर्शन करते रहे.

इतिहास को देखने का उनका नज़रिया वैज्ञानिक और खोजी था. चलते-चलते उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “एक मुलाकात आपसे शाम की तनहाई में होनी चाहिए, आपको भी कुछ जान-परख लेते हैं”.

मैंने कहा कि सर, इरफ़ान साहब से तथ्य आधारित बातचीत के एक लंबे दौर के बाद बचता ही क्या है बताने के लिए, और मैं भी तो इरफ़ान साहब का एक अदना सा विद्यार्थी हूं.

गिरीश जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाई, इतिहासकार तथ्यों की मौलिकता को बचाये रखते हुए अपनी परिस्थितियों और वातावरण के अनुकूल व्याख्या करता है. आपके शहर और आपके उस्तादों के नज़रिये ने आपको इतिहास देखने परखने की जो दृष्टि दी है वो दृष्टिकोण भी हमारे लिए बहुत मायने रखता है”.

सहमति के बाद उस रात देर तक एकांत चर्चा चलती रही. कार्नाड जी मुहम्मद तुग़लक़, कबीर, अकबर, औरंगज़ेब और बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में तमाम जानकारियों पर बहस करते रहे. उन्हें गांधी, नेहरू, इंदिरा गांधी, अन्नादुरै और देवराज अर्स में भी दिलचस्पी थी. उनका इतिहास ज्ञान अद्भुत था और जिज्ञासा तो शांत ही नहीं होती थी. कई बार अनुत्तरित भी कर देते थे. शंकराचार्य, बनारस, कबीर और रैदास के नज़रिये की अद्भुत व्याख्या गिरीश ने की और ऐसा लगा कि बनारस में रहकर मैं बनारस से कितना दूर हूं और दूर रहकर भी गिरीश कितना नज़दीक.

गिरीश कार्नाड की लेखनी में जितना दम था, उन्होंने उतने ही बेबाक अंदाज़ में अपनी आवाज़ को बुलंदी दी. तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका के साथ-साथ धर्म की राजनीति और भीड़ की हिंसा के प्रतिरोध में भी कार्नाड ने हिस्सा लिया. कार्नाड ने सीनियर जर्नलिस्ट गौरी लंकेश के मर्डर पर बेबाक अंदाज़ में आवाज़ उठायी. गौरी लंकेश के मर्डर के एक साल बाद हुई श्रद्धांजलि सभा में वे गले में प्ले कार्ड पहनकर पहुंचे थे जबकि उनके नाक में ऑक्सीजन की पाइप लगी थी.

गिरीश कार्नाड सामाजिक वैचारिकता के प्रमुख स्वर थे. उन्होंने अपनी कृतियों के सहारे उसके अंतर्विरोधों और द्वन्द्वों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है. उनकी अभिव्यक्ति हमेशा प्रतिष्ठानों से टकराती रही है, चाहे सत्ता प्रतिष्ठान हो या धर्म प्रतिष्ठान. कोई भी व्यक्ति जो गहराई से आम आदमी से जुड़ा हुआ हो उसका स्वर प्रतिरोध का ही स्वर रह जाता है क्योंकि सच्चाई को उकेरने पर इन प्रतिष्ठानों को खतरा महसूस होता है.

गिरीश कार्नाड अब हमारे बीच नहीं हैं परन्तु उन्होंने जिन्दगी को जिस अर्थवान तरीके से बिताया वह हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है.

अलीगढ़ से वापसी के बाद हम सब अपनी-अपनी दुनिया में लौट आये और खो गये, पर गिरीश जी को ये बात याद रही. जब 1994-95 के दौरान दिल्ली में “तुग़लक़” नाटक का मंचन होने वाला था तो एक दिन उनका फोन आया और मैं चौंक पड़ा क्योंकि उन दिनों मेरे पास फोन नहीं था और मैं अपने पड़ोसी सज्जन के लैंडलाइन फोन पर सन्देश मंगाया करता था. उन्होंने न केवल हमारा सम्पर्क सूत्र पता किया बल्कि सम्मानजनक ढंग से हमें आमंत्रित करना न भूले. यह थी उनकी रिश्तों की समझ.

आज हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब इतिहास के तथ्य रोज तोड़े-मरोड़े जा रहे हैं और अप्रशिक्षित राजनीतिक हमें इतिहास पढ़ा रहे हैं. गिरीश, आज तुम्हारा होना नितांत आवश्यक था. तुम चले गये और हमें ये जिम्मेदारी देकर कि हम इतिहास की मूल आत्मा को मरने न दें. बड़ा गुरुतर भार देकर और अपनी पारी बेहतरीन और खूबसूरत खेलकर गये हो.

उनके जाने से उपजे खालीपन का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि समकालीन कला जगत में उनके आसपास तो कोई है भी नहीं. इस खाली जगह को भरना आसान नहीं दिखता. गिरीश, इतिहास सदैव तुम्हें याद रखेगा.


डॉ. मोहम्मद आरिफ़ जाने-माने इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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9 Comments on ““बनारस में रह कर मैं बनारस से कितना दूर था और गिरीश कितने पास”!”

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