एक और हार! क्या अकाली दल की पंथक राजनीति फिर से अपना गौरव हासिल कर पाएगी?

अब पंजाब के स्थानीय निकाय नगर निगम नगर पंचायत के हुए चुनाव में राज्य की राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट उभर आई है। पंजाब में लगभग तीन साल के आम आदमी पार्टी के शासन का प्रभाव किस किस क्षेत्र में किस प्रकार का है इन चुनावों के परिणामों से यह स्पष्ट हो गया है। साथ ही अकाली दल की एक और बड़ी हार ने पंथक राजनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।  

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हरियाणा: आधी सीटों पर प्रत्याशी बदलना क्या भाजपा के संकट को दिखलाता है?

भाजपा के लिए अबकी बार हरियाणा में चुनौतियां गंभीर हो गई हैं। मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री काल के लाभ को करनाल में भाजपा भुना कर सीट को अपने खाते में लाना चाहती है। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि एक एक सीट भाजपा के लिए जीत सुनिश्चित करने के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।

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क्या हरियाणा में परिवर्तन की नई संभावना होंगी कुमारी शैलजा?

कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के सन्देश को प्रदेश में 90 विधानसभा तक पहुँचाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस यात्रा में जिस तरह लोग कड़ाके की ठंड में बाहर आए हैं और देर रात तक सड़कों पर दिखाई दिए, ऐसी उम्मीद शायद एसआरके गुट को भी न रही होगी।

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राजस्थान विधानसभा चुनाव: कांटे की टक्कर में कांग्रेस-भाजपा

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपनी सरकार की योजनाओं व खुद के किए कामों को लेकर आश्वस्त हैं कि प्रदेश में दोबारा कांग्रेस की जीत होगी। दूसरी ओर भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले फिर से अपनी राजनीतिक जमीन हासिल करने की भरपूर कोशिश में है। भाजपा के लिए राजस्थान की 25 लोकसभा सीटें 2024 में केंद्र में अपनी सत्ता बनाने के लिए अतिमहत्वपूर्ण हैं।

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हरियाणा में इस बार किस फिराक में है बहुजन समाज पार्टी?

बसपा सुप्रीमो ने हरियाणा में समय से पहले चुनाव की आशंका को देखते हुए एक और चुनावी बाजी के लिए पदाधिकारियों को इसी वर्ष जुलाई में सचेत किया था। दिल्ली मीटिंग में मायावती ने हरियाणा के चुनाव को लेकर खास निर्देश भी दिए थे। मायावती की रणनीति अबकी बार ‘सर्व समाज’ को साथ ले कर हरियाणा में चुनाव में उतरने की है।

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खेतिहर समाज में असंतोष को बढ़ाएगा बजट में किसानों के साथ किया गया छल

बजट में कृषि मद में पिछले वर्षों की अपेक्षा अबकी बार अधिक प्रावधान किये जाने की उम्मीद थी जिससे सरकार द्वारा 2016 में किये गए किसानों की आय को 2022 तक दुगना करने के वायदे को सार्थक किया जा सकता था, लेकिन इसके विपरीत कई कटौतियां कर दी गयीं।

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सत्ता-प्राप्ति पर केंद्रित चुनाव बनाम लेबर चौक पर खड़ा लोकतंत्र: कुछ जरूरी सवाल

लेबर चौक पर खड़ा लोकतंत्र का नुमाइंदा क्या चेहरों को देख कर ही इस बार भी मतदान करेगा या कुछ और भी सोच पाने की स्थिति में इन गर्दिशों के दौर में आ चुका है? बार-बार ठगे जाने को कहीं अपनी नियति मान एक दिहाड़ी के एवज में नीतियों को नकार कर अपने भाग्य को कोसता रहेगा या जूझने की ताकत और यकीन को फिर से गिरवी रख देगा?

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किसान अन्दोलन का एक साल: प्राप्तियों का मूल्यांकन

संयुक्त किसान मोर्चा एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है जिसका राजनीतिक दल अभी मूल्यांकन नहीं कर पा रहे हैं। किसान अन्दोलन ने जहां एक ओर जनता को उनकी ताकत का अहसास करवा दिया है तो दूसरी ओर सत्‍ता की जवाबदेही को भी सुनिश्चित कर दिया है।

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ऐलानाबाद : किसान आंदोलन के प्रति जनता में कायम विरोधाभासों का संकेत है भाजपा का प्रदर्शन

किसान अन्दोलन के कारण अनुकूल परिस्थितियों में अभय चौटाला की जीत अपेक्षित थी, लेकिन भाजपा प्रत्याशी गोविन्द कांडा को जितने मत प्राप्त हुए उनसे साफ होता है कि किसान बहुल क्षेत्र में भाजपा की पैठ कितनी गहरी हो चुकी है और कृषि कानूनों के प्रति जनता कितने विरोधाभासों में है।

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पंजाब-हरियाणा: पवार की राह पर कैप्‍टन, आंदोलन की नाव से पार उतरने की कोशिश में चौटाला!

किसान आंदोलन के दस महीने पूरे होने पर पंजाब और हरियाणा की राजनीति में जो उथल-पुथल देखी जा रही है, वो इस बात का गवाह है कि पंजाब और हरियाणा के शांतिपूर्ण किसानों की जिद के आगे सत्‍ता के गलियारों में भयंकर बेचैनी है। ये बेचैनी क्‍या शक्‍ल अख्तियार करेगी यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे लेकिन दोनों राज्‍यों में हो रही सियासी हलचलों को समझना जरूरी है। दो अलग-अलग टिप्‍पणियों में पंजाब और हरियाणा के सियासी माहौल का जायज़ा ले रहे हैं वरिष्‍ठ टिप्‍पणीकार जगदीप सिंह सिंधु।

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