प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 जुलाई को कहा कि उन्होंने जंतर-मंतर पर मां की गाली देने वाले युवाओं को माफ कर दिया। आंदोलन खत्म होने के बाद से ही वहां पर युवाओं के द्वारा दी गई गालियों का लगातार पोस्टमार्टम हो रहा है। एक पक्ष द्वारा इसके जरिये भारत के ‘सांस्कृतिक विचलन’ पर चर्चा की जा रही है। मुझे इस पर लिखने का कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन मोदी जी की माफ़ी की बात सुनकर मैं लिखने बैठ गया।
मुझे लगता है देश का सांस्कृतिक पतन हो चुका है या नहीं यह एक अलग मसला है, लेकिन बौद्धिक पतन जरूर हो गया है। इस आंदोलन ने भारत के इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी से संपन्न समाज में पले-बढे युवाओं में यह जोश भर दिया कि अदम्य साहस और सामूहिकता के बल पर इस फासिस्ट हुकूमत को झुकाया जा सकता है। इस पर चर्चा न होकर गालियों पर चर्चा हो रही है। आखिर सरकार और उसके चाटुकार मीडिया की प्रधानमंत्री को दी गई गालियों में इतनी रुचि क्यों पैदा हो गई? जो मीडिया संस्थान प्रधानमंत्री मोदी की अवतारी पुरूष जैसी छवि गढ़ने में दिन-रात लगे रहते हैं उन्हें प्रधानमंत्री को दी गई गालियों का लेखा-जोखा करने में इतनी रुचि क्यों आ रही है? क्या वे युवा पीढ़ी जिसे जेन-जी कहा जा रहा है उसकी चिंताओं, परेशानियों, अनिश्चित भविष्य से उपजी निराशा का विश्लेषण करेंगे या उनकी यह रुचि भी मोदी-विरोधियों को कोसने और देश में एक झूठे किस्म का डर फैलाने की कवायद ही है?
मोदी सरकार के 12 साल के शासनकाल में हम यह देख चुके हैं कि जब भी मोदी सरकार की आलोचना करते हुए और अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिए कोई आंदोलन खड़ा होता है तो मोदी सरकार उसका हिंसात्मक दमन करती है और उसके बाद ये चाटुकार मीडिया संस्थान एक फर्ज़ी कॉन्सपिरेसी थ्योरी गढ़कर देश में डर का माहौल पैदा करने में लग जाते हैं, जैसे कि मोदी सरकार तो बड़ी देशभक्त है और बड़ी देशभक्ति का काम कर रही है पर यह कुछ लोग देश को तोड़ने में लगे हैं। क्या जेन जी के आंदोलन का और उनके द्वारा प्रधानमंत्री को दी गई गालियों का विश्लेषण इसी कॉन्सपिरेसी थ्योरी का अगला कदम है?
जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक
आज़ाद हिंदुस्तान में यह पहला आंदोलन था जिसमें सभी वर्गों की लड़कियों, छात्राओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस पर बहस क्यों नहीं हो रही है? क्योंकि महिलाओं की विभिन्न समस्याओं, भेदभावपूर्ण जीवन और बंधनों के ख़िलाफ़ विद्रोह ना हो जाए। भ्रष्ट और पितृसत्तात्मक शासन व्यवस्था इससे डरती है। इस आंदोलन ने जेन अल्फा के युवाओं में भी जोश भर दिया। नतीजन उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से, राजस्थान और बिहार से भी स्कूली छात्र-छात्राओं ने भी अपने स्कूल की अव्यवस्था के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। कई जगह हुकूमत को झुकना पड़ा। इस पर कोई वैचारिक विमर्श इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि ‘सांप्रदायिक क्रूरता और कॉर्पोरेट कट्टरता’ की मिश्रित रसायन इस फासीवादी हुकूमत के खिलाफ इस तरह की जागरूकता से ऐसा आंदोलन होगा जिससे अंधभक्तों के भगवान को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है।
कहा जा रहा है कि जिस तरह से लड़कियों ने सड़क पर आकर सरकार और मोदी व उनकी टीम के खिलाफ गालियों की बौछार की है, उससे सांस्कृतिक और चारित्रिक पतन हो गया है। ऐसी लड़कियां अपने मां-बाप का नाम बदनाम कर रही हैं। अतिचरित्रवान हीरोइन और भाजपा सांसद कंगना राणावत ने कहा कि यह लड़कियां ‘गटर छाप’ हैं। हिन्दुत्ववादी विचारक नाम से आजकल चर्चा में आया एक गालीबाज टी.जी. मोहनदास कहता है कि ये लड़कियां ‘बलात्कार करवाने के उद्देश्य’ से ही जंतर-मंतर पर गयी थीं। इसका यह भी कहना है कि उसके पास सत्ता होती तो वह जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर कर्फ्यू लगवाकर गोलियां चलवा देता। इन लोगों के इन बयानों से इनकी नैतिकता और चरित्र का पता चलता है। क्या वाकई में ऐसा है कि लड़कियों द्वारा खुलेआम गाली देने से समाज दुष्प्रभावित हो गया है?
जिस देश में पढ़ने-लिखने की परंपरा लगभग विलुप्तप्राय हो, वहां पर ऐसे ही ‘गटर छाप’ चर्चा होगी। अपनी टीआरपी रेटिंग बढ़ाने तथा सत्ता की दलाली करने के चक्कर में मीडिया में किसी भी बहस में समस्या के मूल कारण के बजाय इधर-उधर की ऊपरी बातों पर ही चर्चा होती है। अगर सांस्कृतिक पतन रूपी बहस की ईमानदार शुरुआत होती, तब चर्चा इस बात पर होती कि 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद पांच साल के अंदर ही केबल टीवी के मार्फत रात को ‘रशियन चैनल’ के द्वारा ‘पोर्न फिल्म’ भारत में क्यों दिखाई जाती थी? 1994 में फूलन देवी पर शेखर कपूर द्वारा बनी फिल्म बैंडिट क्वीन की शुरुआत ही गाली से हुई, लेकिन उस समय सबको आनंद आ रहा था। बीड़ी जलईले… गाने पर युवा भारत थिरकता रहा और भाषा का पतन होता रहा।
पिछले दो दशक से मैंने संभवत: कोई फिल्म लगातार नहीं देखी, लेकिन मुझे यह जानकारी है कि 2011 में ‘दिल्ली बेली’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में गाली बकती हुई रानी मुखर्जी, 2012 में ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ पार्ट वन और टू में हर गाली वाले संवाद पर भारत ने खूब मजा लिया। हीरोइन द्वारा गाली देने को स्त्री विमर्श कहा गया। पिछले पांच साल में ‘मिर्जापुर’ जैसे ओटीटी प्लेटफार्म वाली फिल्म में सिवाय गाली के और कुछ भी नहीं है। फेसबुक पर इन फिल्मों के छोटे-छोटे क्लिप देखने से मुझे यही ‘ज्ञान’ प्राप्त हुआ। लेकिन तब यह विमर्श का केंद्र नहीं था। भारत की जनता की ‘सामूहिक मौन सहमति’ के बाद सेंसर बोर्ड ने भी ‘समय की मांग’ को देखते हुए सभी कुछ स्वीकार कर लिया। वैसे भी सेंसर बोर्ड जैसा ढकोसला बोर्ड मैंने कहीं नहीं देखा। जिसको अश्लीलता देखना है, वह नेट के माध्यम से देख ही लेगा, फिर सेंसर बोर्ड का क्या काम?
इस तरह की भाषा से आपको कभी आपत्ति नहीं हुई। आपने हनी सिंह को नहीं रोका। हाल में ही नोरा फतेही ने ऐसे भद्दे गीत गाए कि बाद में उस पर बैन लग गया। एक तरफ कपिल शर्मा, राखी सावंत जैसे फूहड़ गालीबाज, अश्लीलता फैलाने वाले वालों को कॉमेडियन मानते वक्त आपको सांस्कृतिक पतन नहीं दिखा? सपना चौधरी, अंजलि अरोड़ा आदि द्वारा फूहड़ नृत्य होता है या सनातनी परंपरा को बढ़ाया जाता है?
नई पीढ़ी की भाषा पर ज्ञान देने वाले जरा यह बताएंगे कि भारत जिस सामंती मानसिकता का पोषण करता रहा है, वहां पर शहर और गांव के निम्नवर्गीय और गरीब समाज से लेकर ग्रामीण खेतिहर परिवार के कुछ संपन्न परिवारों में भी क्या पिता और भाई के द्वारा सामान्य रूप में गाली नहीं दी जाती है? खेतिहर और शहर की सामान्य गरीब परिवार की महिलाओं के द्वारा भी दशकों से अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ऐसी स्थिति में जेन जी पर ही टारगेट क्यों? इन्होंने होश संभालते ही मोबाइल पर कार्टून देखना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में युवाओं की गलती है या यह व्यवस्थागत दोष के कारण है? आज का युवा अगर बचपन में टेलीविजन देखकर भी बड़ा हुआ है, तो वह केबल टीवी जमाने का युवा है- जिस टीवी में 90 के दशक से ‘विवाहेत्तर संबंध’ सीरियल के केंद्र में रहा है और अब साथ में गाली भी रहने लगी।
पिछले 15 साल से समस्त भारत में ‘आधी आबादी’ आत्मनिर्भर होने के लिए अपनी चारदीवारी को लांघ चुकी है। यह न्यू इंडिया है। बाहर की दुनिया में उसे बस, मेट्रो, ऑटो, चौराहा, चाय-पान की दुकान, स्कूल, कॉलेज आदि में भी मर्दों के द्वारा गालियों को सुनना एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन इस देश के सामंती समाज से लेकर बहुसंख्यक अंधभक्त चाहेंगे कि लड़कियां गाली सुनकर ग़ज़ल गाएं?
आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!
पिछले एक दशक से भारत की 100 करोड़ से अधिक की आबादी बुनियादी आवश्यकताओं के मामले में सड़क पर आ गई है। युवाकाल सबसे जोशीला होता है, यही समय आपके जीवन को नई दिशा दे सकता है। लेकिन जब भारत का युवा देख रहा है कि उसके सामने भविष्य अंधकारमय है, ऐसी स्थिति में अंतर्मन के भाव से निकली स्वच्छंदता (गाली) अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण है। इसे सामान्य रूप में लिया जाना चाहिए। इतिहास गवाह है इस दुनिया में जहां-जहां भी सत्ता विरोधी तीखे आंदोलन हुए हैं जहां पर आंदोलनकारी को लगता है कि उनकी विनम्रता से सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, वहां पर अशिष्ट नारे लगे हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और उनके दलालों के द्वारा ऐसा बताया जा रहा है कि जंतर-मंतर पर सारे आंदोलनकारी बिल्कुल अशिष्ट थे। यहां यह बात समझने की आवश्यकता है कि छात्र संगठन के भीड़ में जहां भी गीत गाए जा रहे थे, वहां पर सभ्य तरीके से सत्ता के खिलाफ नारे लगाए जा रहे थे।
वैश्वीकरण-निजीकरण की आंधी में 90 के दशक के बाद संगठनों का हाल लगातार चिंतनीय हो चुका है। ऐसी स्थिति में भारत के आम युवाओं का राजनीतिक और वैचारिक चरित्र व्यवस्थागत दोष के कारण कमजोर है। इसलिए भावनाओं के प्रकटीकरण के तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन यह भी महसूस होता है कि अगर यह आम युवाओं का आंदोलन नहीं होता? बल्कि किसी राजनीतिक दल या वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े युवाओं का ही केवल आंदोलन होता तो क्या सरकार इसकी ओर ध्यान देती? क्या यह आंदोलन अपनी मांगें मनवाने में सक्षम हो पाता? नरेंद्र मोदी और उनकी टीम को पता था कि यह आक्रोश केवल उनके वैचारिक विरोधियों का ही नहीं है, बल्कि इसमें भारत का वह आम जनमानस है, जिसने उसे तीसरी बार सत्ता में बैठाया है। यही प्रमुख कारण था, जिसके कारण हुकूमत को झुकना पड़ा। वैचारिक हथियार से लैस केवल उनके विरोधी युवा का आंदोलन होता, तो सत्ताधारी दल द्वारा शुरुआत में ही कुचल दिया जाता।
प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा ने कहा था कि ‘सत्ता का सारा षड्यंत्र इस बात पर निर्भर है कि मनुष्य चिंतनशील ना हो सके’। दुर्भाग्य है कि 90 के दशक के बाद की व्यवस्था और जीवन-शैली भारत के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए वह स्पेस समाप्त कर देने पर तुली है, जिसके तहत आम जनमानस को जागरूक किया जा सके। नरेंद्र मोदी जानते हैं कि युवाओं में इस बात पर कोई आत्मग्लानि नहीं है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से गाली दी। जिन युवतियों द्वारा पिछले दो-तीन दिनों से सोशल मीडिया पर माफी मांगी जा रही है, वह दबाव में उनसे कहलवाया जा रहा है। भाजपा-आर.एस.एस का समूह भी ट्रोलिंग और हिंसा द्वारा ऐसा करने के लिए दबाव बना रहे हैं। दूसरी तरफ़ चूंकि उन्हें राजनीति करनी है, इसलिए वह कथित तौर पर युवाओं को माफ करने की नौटंकी कर रहे हैं। आखिर आपसे माफ़ी मांगी किसने? क्या उन्होंने अमित शाह की पुलिस को भी माफ कर दिया, जिन्होंने लड़कियों के प्राइवेट पार्ट को छूने से लेकर उनके नाजुक अंगों पर डंडे से प्रहार किया? महिला पुलिस द्वारा भी महिला आंदोलनकारी पर इस तरह का क्रूर व्यवहार पहले नहीं देखा गया।
एक पक्ष के द्वारा कहा जा रहा है कि महिला स्वतंत्रता के दौर में अगर महिलाएं अपने अधिकार के लिए हक मांगती हैं, तो उन्हें इस तरह की घटनाओं से दो-चार होना पड़ेगा। यह बात सही हो सकती है लेकिन आंदोलनकारी स्त्री हो या पुरुष, किसी के साथ भी मानवाधिकार हनन की घटनाएं इस प्रकार नहीं होनी चाहिए, जैसा इस आंदोलन के दौरान पुलिस के द्वारा दिखा।
सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न
व्यक्तिगत रूप से मुझे मर्दों के बीच आने वाला ‘गालीबाज माहौल’ कभी रास नहीं आया। जाहिर सी बात है पिछले 15-20 साल से स्त्रियों का पढ़ा लिखा वर्ग भी जिस तरह की अशालीन भाषा का इस्तेमाल करता है, मैंने उसको कभी पसंद नहीं किया। इलाहाबाद की एक प्रतियोगी छात्रा ने चंद वर्ष पहले मुझसे कहा था कि यहां पर तथाकथित मध्यमवर्गीय संस्कारी लड़कियां आपस में गाली के रूप में ‘दुष्ट’ शब्द का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन अब इस शहर का भी माहौल विकृत हो गया है। अब आप इसके लिए व्यवस्था की मुख्य कमी को उजागर कर उस पर प्रहार करेंगे या हवा-हवाई तरीके से केवल गाली देने वाली लड़कियों पर कटाक्ष करेंगे, वह भी तब जब आप उनकी विरोधी हो गई हों।
इसके लिए भारत की सामंती मानसिकता वाली जीवन शैली में सुधार करना होगा, समाज को प्रगतिशील बनाना होगा, शिक्षा जिसे केवल ‘आर्थिकी’ से जोड़ दी गई है उसे 24 कैरेट का ‘वैचारिक’ बनाना होगा। ‘गालीमुक्त’ समाज के लिए पहले मर्दों की भाषा पर लगाम लगानी होगी। छात्र जीवन में उत्तेजित होकर कभी-कभी मुंह से अपशब्द निकलने पर मुझे उस वक्त भी तकलीफ होती थी। लेकिन मेरे तमाम शिक्षक, एसोसिएट प्रोफेसर मित्र आदि को आज भी गाली देने में कोई आत्मग्लानि नहीं होती। इसे भारत की सामान्य जीवन शैली का अंग मान लिया गया है। लेकिन यहां पर केवल युवतियों पर केवल कटाक्ष किया जा रहा है?
भारत का सत्ता प्रतिष्ठान यह बताएगा कि पुलिस विभाग में गाली वाला माहौल कब समाप्त होगा जिसके कारण महिला पुलिस भी उसकी आदी होती जा रही हैं? क्या यह बात सही नहीं है कि पिछले 25 साल से भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता सोनिया गांधी सहित परिवार के अन्य लोगों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं? पिछले 12 साल से राहुल गांधी देश के सबसे प्रमुख नेताओं में रहे हैं। चंद साल से वह विपक्ष के नेता हैं और उन पर ‘पप्पू’ का तमगा लगाने में अरबों रुपया खर्च किया गया। 2014 के बाद पंडित नेहरू का चरित्रहनन और महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन नाथूराम गोडसे का महिमामंडन कर युवाओं के मन में गाली रूपी मानसिकता किसने डाली? क्या यह भाषा संसदीय है? लेकिन जब इस तरह का कटाक्ष भाजपा समर्थक युवतियां करती हैं, तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती।
सच तो यह है कि कॉर्पोरेटी जीवन शैली के साथ समझौता करके पिछले एक दशक से इस सरकार ने ‘आतंकी मीडिया’ के बल पर भाषा को जिस प्रकार भ्रष्ट करने का काम किया है, इसका असर भविष्य में सरकार बदलने के बाद भी कई वर्षों तक रहेगा।

