राग दरबारी: प्रधानमंत्री का ‘मन’ किसके साथ है?


यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मन की बात करते हैं। मन की बात करते हैं तो मनमर्जी से बात करते हैं। यहां भी कोई परेशानी नहीं है क्योंकि वे और उनकी पार्टी माने या न माने, अपने मनमाफिक बातें करते ही रहते हैं। पिछले दिनों 29 नवंबर को प्रधानमंत्री ने फिर से अपने मन की बात की। यह दिल्ली में शुरू हुए किसान आंदोलन के चौथे दिन सवेरे 11 बजे की बात है। लगभग एक घंटे चली अपनी बात में उन्होंने तरह-तरह की बातें की। दिल्ली में किसान पीटे जा रहे थे, इतनी कड़ाके की ठंड में उनके ऊपर पानी की बौछार की जा रही थी, डंडे पड़ रहे थे, दिल्ली में किसानों का प्रवेश रोकने के लिए राजमार्ग तक को खोद दिया गया था, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस पर कोई बात नहीं की।

अपनी मनमानी की बात में उन्होंने तीन किसानों का उदाहरण दिया और बताया कि किस तरह वे किसानों का भविष्य संवारने पर अमादा हैं। उन्होंने जिन तीन किसानों का नाम लिया उनमें से एक का नाम है महाराष्ट्र के धुले जिले के जितेन्द्र भोई, दूसरे का नाम है राजस्थान के बारां जिले के मोहम्मद असलम और तीसरा आस्ट्रेलिया रिटर्न हरियाणा में रह रहे वीरेन्द्र यादव का। उन्होंने सबसे अधिक फोकस जितेन्द्र भोई के ऊपर किया।

पीआईबी पर मौजूद अपने भाषण के मुताबिक उन्होंने कहा थाः

“भारत में खेती और उससे जुड़ी चीजों के साथ नए आयाम जुड़ रहे हैं। बीते दिनों कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। बरसों से किसानों की जो मांग थी, जिन मांगों को पूरा करने के लिए किसी न किसी समय में हर राजनीतिक दल ने उनसे वायदा किया था, वो मांगे पूरी हुई हैं। काफी विचार-विमर्श के बाद भारत की संसद ने कृषि सुधारों को कानूनी स्वरूप दिया। इन सुधारों से न सिर्फ किसानों के बंधन समाप्त हुए हैं बल्कि उन्हें नए अधिकार भी मिले हैं। इन अधिकारों ने बहुत ही कम समय में किसानों की परेशानियों को कम करना शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र के धुले ज़िले के किसान जितेन्द्र भोई ने नए कृषि क़ानून का इस्तेमाल कैसे किया ये आपको भी जानना चाहिए। जितेन्द्र भोई ने मक्के की खेती की थी और सही दाम के लिए उन्होंने अपनी फ़सल व्यापारियों को बेचना तय किया था। फ़सल की कुल क़ीमत तय हुई करीब 3 लाख 32 हजार रुपये। जितेन्द्र भोई को 25 हज़ार रुपये एडवांस भी मिल गए थे। तय ये हुआ था कि बाक़ी का पैसा उन्हें 15 दिन में चुका दिया जाएगा। लेकिन बाद में परिस्थितियाँ ऐसे बनी कि उन्हें बाक़ी का पेमेंट नहीं मिला। किसानों से फ़सल ख़रीद लो और महीनों पेमेंट न करो, संभवत: मक्का ख़रीदने वाले बरसों से चली आ रही उसी पंरपरा को निभा रहे थे। इसी तरह 4 महीने तक जितेन्द्र भोई का पेमेंट नहीं हुआ। इस स्थिति में उनकी मदद की सितंबर में पास हुए नए कृषि क़ानून ने। वो क़ानून उनके काम आए। इस क़ानून में तय किया गया है कि फ़सल ख़रीदने के तीन दिन में ही किसान को पूरा पेमेंट करना पड़ता है। और अगर पेमेंट नहीं होता है तो किसान शिकायत दर्ज कर सकता है। इस क़ानून में प्रावधान है कि क्षेत्र के एसडीएम को एक महीने के भीतर ही किसान की शिकायत का निपटारा करना होगा। अब जब ऐसे क़ानून की ताक़त हमारे किसान भाई के पास थी तो उनकी ऐसी समस्या का समाधान तो होना ही था। उन्होंने शिकायत की और चंद ही दिन में उनका बक़ाया चुका दिया गया। यानी क़ानून की सही और पूरी जानकारी ही जितेन्द्र की ताक़त बनी।”

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार कुल मिलाकर किसानों के लिए जो तीन कानून संसद द्वारा बनाए गए हैं उससे किसानों को बहुत लाभ मिल रहा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण जितेन्द्र भोई हैं। इसी जितेन्द्र भोई की कहानी का खुलासा 4 दिसंबर के दैनिक भास्कर ने किया है। पहले पेज पर दूसरी लीड के रूप में दीप्ती राऊत ने जितेन्द्र भोई की कहानी को कुछ इस रूप में लिखा है:

जितेन्द्र धूलिया (इसे मोदीजी धूले कहते हैं) जिले के रहने वाले हैं। खेती-बाड़ी करते हैं। उनके पास 15 एकड़ खेत है, जिसमें मक्का, चना, प्याज, गेंहू, सब्जी उगाते हैं। इस साल उनके खेत में 340 क्विंटल मक्का हुआ। मक्का की बोरियाँ लेकर जब जितेन्द्र मंडी पहुंचे तो एमएसपी पर फसल की खरीददारी तो दूर, मंडी वालों ने अनाज ही लेने से इनकार कर दिया। वजह बतायी गयी- कोटा खत्म है। थक-हार कर जितेन्द्र को मंडी से बाहर 1200 रुपये क्विंटल के हिसाब से अपना मक्का बेचना पड़ा, जबकि सरकार ने एमएसपी 1800 रुपया तय किया था।

इतना ही नहीं, औने-पौने दाम में बेचने पर भी पैसा अटक गया। इतना अनाज बेचने के बाद जितेन्द्र के हाथ में सिर्फ 25 हजार रुपये आये। इसके बाद जितेन्द्र का असली संघर्ष शुरू हुआ। बाकी पैसा कैसे निकले, इसके लिए जितेन्द्र का इस ऑफिस से उस ऑफिस का चक्कर शुरू हुआ। जितेन्द्र को अपनी औने-पौने दाम में बेची फसल का दाम निकालने की सलाह उनके रिश्तेदार ने दी। उनके रिश्तेदार ने एसडीएम को शिकायत करने का सुझाव दिया। 29 सितंबर को आवेदन करने के बाद मामले की सुनवाई अगले दिन 30 सितंबर को हुई। एसडीएम ने व्यापारी सुभाष वाणी को शपथपत्र देकर 15 दिन के भीतर ‘पूरे पैसे’ भुगतान करने का आदेश मिला। आखिरकार किश्तों में उन्‍हें पैसे मिल गए, इस चक्कर में जितेन्द्र के 20 हजार रुपए और चार महीने खर्च हो गए।

अब जब पीछे मुड़कर वह देखते हैं, तो पाते हैं कि अगर एमएसपी पर उनकी उपज खरीदी गई होती तो उन्हें दो लाख का नुकसान नहीं हुआ होता। जितेन्द्र भोई के अनुसार ‘मन की बात’ में जब से प्रधानमंत्री ने उनकी कहानी का जिक्र किया है, हर दिन पांच से 10 किसानों का फोन उनके पास आ रहा है। किसी को उत्तर प्रदेश के व्यापारी ने धोखा दिया है तो किसी को राजस्थान के व्यापारी ने धोखा दिया है। जितेन्द्र सहित उनके गांववाले किसानों का कहना है कि उपज का कारोबार मंडी के अंदर हो या बाहर, एमएसपी के तहत ही होना चाहिए। जितेन्द्र भोई ने दिल्ली में चल रहे किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है।

सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की उड़ान में क्या तोते उड़ाए। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री के रूप में वे अर्धसत्य कैसे बोल रहे हैं? हम जानते हैं कि नरेंद्र मोदी अपनी किसी भी बात को साबित करने के लिए हर तरह के तर्क गढ़ते हैं। कभी-कभी तो वह वैसे तर्क गढ़ लेते हैं जो पूरी तरह काल्पनिक होता है।

हम यह भी जानते हैं कि बीजेपी व मोदी कैबिनेट के सभी मंत्री जगह-जगह यह बताते रहे हैं कि किसानों के हित की रक्षा के लिए उनकी सरकार ने किसानों से गहन विचार-विमर्श किया है जबकि वास्तविकता यह है कि उनकी सरकार ने आरएसएस के किसान संगठन भारतीय किसान संघ से भी संपर्क नहीं किया था। इसके उलट पब्लिक डोमेन में जानकारी यह है कि किसान बिल को संसद में लाए जाने से पहले सरकार ने उद्योगपतियों के प्रतिनिधिमंडल से विचार-विमर्श जरूर किया था।

इस प्रकरण का मतलब यह निकलता है कि जब 29 नवंबर को प्रधानमंत्री अपने मन की बात कर रहे थे तो यह बात उनके दिमाग में पूरी तरह साफ थी कि वे किसी भी रूप में किसानों की किसी भी समस्या पर तवज्जो देने नहीं जा रहे हैं। अन्यथा दिल्ली के बॉर्डर पर एक लाख किसान जमा हों तो किसी देश का प्रधानमंत्री सभी माध्यमों से लोगों में यह झूठ फैलाने का निर्णय क्‍यों लेगा कि किसान जितेन्द्र भोई को उसी बिल से मदद मिली है जिस बिल को खत्म करने के लिए किसान आंदोलन कर रहे हैं? इसीलिए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर बार-बार कह रहे हैं कि बिल को बदला नहीं जाएगा।

अर्थात अपनी मनमानी और जिद के आगे प्रधानमंत्री मोदी झूठ और सच में भेद नहीं करते हैं और अपनी लोकप्रियता को हर हाल में कैश कर लेना चाहते हैं क्योंकि लोगों के मन में यह बात वर्षों की परपंरा से बैठा दी गई है कि प्रधानमंत्री के पद पर बैठा आदमी झूठ नहीं बोलता है। हम अच्‍छे से जानते हैं कि अमेरिका में राष्ट्रपति के पद पर बैठे शख्स डोनाल्ड ट्रंप के साल भर के दर्जनों झूठ का पर्दाफाश न्यूयॉर्क टाइम्स ने किया था जबकि हम कई बार यह भूल जाते हैं कि अपने मोदीजी का आदर्श डोनाल्ड ट्रंप ही है।



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