कवि होने की सादगी-भरी और संजीदा कोशिश
‘वसंत के हरकारे’ में सभी विधाओं पर आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियां और पुस्तक समीक्षा का समायोजन कर एक साथ प्रस्तुत करने का महती दायित्व सुरेंद्र कुशवाह ने गंभीरता से निर्वाह किया है।
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‘वसंत के हरकारे’ में सभी विधाओं पर आलोचनात्मक लेख, टिप्पणियां और पुस्तक समीक्षा का समायोजन कर एक साथ प्रस्तुत करने का महती दायित्व सुरेंद्र कुशवाह ने गंभीरता से निर्वाह किया है।
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मुक्तिबोध की रचनाएं सृजन का विस्फोट हैं। वे सजग चित्रकार की भांति दुनिया का सुंदरतम उकेरना चाहते हैं। वे चाहते हैं उजली-उजली इबारत, मगर अंधेरे बार-बार उनकी राह रोक लेते हैं। अंधेरों के चक्रव्यूह में घिरे वे अभिमन्यु की तरह अकेले ही जूझते हैं अनवरत लगातार। यह युद्ध कभी खत्म नहीं होता, चलता ही रहता है उनके भीतर। वे लड़ते हैं आजीवन क्योंकि उन्हें लगता है कि उन जैसों के हाथ में सच की विरासत है; जिसे उन्हें आने वाले समय को, पीढ़ी को ज्यों का त्यों सौंपना है।
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खुद को कितना बोलने देना है, इस मामले में असंयम बरतने वाले त्रिलोचन, कविता को कितना बोलने देना है, इस मामले में सदैव संयमी रहे। त्रिलोचन जी का वस्तुसत्य व माया और उनकी लंबी बतकही निश्चित ही उनके एक गंभीर नागरिक सोच का जीवंत प्रमाण है।
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एक दिन पहले ही मैंने फोन पर किसी का इंटरव्यू किया था और फोन का रिकॉर्डर ऑन था। दो दिन बाद मैंने देखा कि मेरी और मंगलेश की बातचीत भी रिकॉर्ड हो गयी है। उसे मैंने कई बार सुना- ‘‘आनंद अभी मैं मरने वाला नहीं हूं’’ और सहेज कर रख लिया।
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साम्राज्यवाद की बाढ़ आई। उनकी भावनाओं का फाटक खुला। एक पंक्ति आई। आलमारी से………। साम्राज्यवाद की बाढ़ सब कुछ तबाह कर चली गई, तब उनकी भावनाओं ने कविता का रूप धरा। शीर्षक- बाढ़ आई है।
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