जनहित की ‘राजनीति’ बनाम निर्वाचित सरकार का ‘राजहठ’
क्या यह ऐसी परिस्थिति है जिसका हल व्यापार की सोच और भाषा से होगा?
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क्या यह ऐसी परिस्थिति है जिसका हल व्यापार की सोच और भाषा से होगा?
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यहां सवाल सिर्फ संवैधानिक संकट से बचने का नहीं है और जिसे हम सिर्फ एक मुख्यमंत्री के किसी सदन के सदस्य न बनने के रूप में देख रहे हैं, वह इतनी छोटी बात नहीं है. अगर इसे बड़े फलक पर देखें तो पता चल सकता है कि यह संकट क्यों इतना गहरा है.
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