आर्टिकल 19: TRP की नपाई रोकने के पीछे Zee और BARC का बाप-बेटा कनेक्शन!


टीवी देखने वालों के लिए एक राहत की खबर आयी है कि अगले तीन महीने तक टीआरपी नहीं नापी जाएगी। आपको लग रहा होगा कि इससे टीवी को आत्मशुद्धि का मौका मिलेगा; जनता से जुड़ी खबरें दिखायी जाने लगेंगी; सरकार से उसकी नाकामियों पर सवाल पूछा जाने लगेगा; क्योंकि जब टीआरपी ही नहीं आएगी तो पत्रकारिता के रास्ते का रोड़ा ही खत्म हो जाएगा। अगर आपको दूर-दूर तक ऐसा लग रहा है तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। इसे जितनी जल्दी दूर कर लीजिए उतना ही अच्छा है। सबसे पहले समझ लीजिए कि किस्सा क्या है टीआरपी का।

मुंबई पुलिस ने टीआरपी से छेड़छाड़ करने वाले एक गिरोह का 8 अक्टूबर को भंडाफोड़ करने का दावा किया था। मुंबई के पुलिस कमिश्नर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके खुद कहा था कि ये गिरोह अर्णब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी और दो मराठी चैनलों के लिए रुपया बांटकर टीआरपी के बक्से में घपला करता था। रिपब्लिक कहता है कि ये बात झूठ है। बाकी सारे चैनल कह रहे हैं ये बात सच है। सच और झूठ के इस खेल में ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल यानी बार्क ने जो कहा है, उस पर गौर किये जाने की जरूरत है। उसने कहा कि हम तीन महीने तक अपने टीआरपी सिस्टम को अस्थायी तौर पर निलंबित करते हैं। गौर कीजिए, उसने साफ-साफ अस्थायी तौर पर निलंबित शब्द का इस्तेमाल किया है। मतलब आने वाले दिनों में टीआरपी तो आएगी ही आएगी। तो इस नाटक का मतलब क्या है?

इस तीन महीने के निलंबन का खेल तीन कारणों से खेला गया है। इसको ठीक से समझिए। पहला कारण- आंच अर्णब पर आयी है। अर्णब सरकार का प्यारा पत्रकार है, लेकिन इतना भी प्यारा नहीं है कि उसे बचाने के लिए बार्क सारे चैनलों की नाराज़गी मोल ले। तो ये तीन महीने कूलिंग ऑफ पीरियड हैं। दूसरा कारण- लगातार दो महीने तक दर्शकों के बाजार में भूचाल के बाद पुरानी रेस के चैनलों को ये फैलाने का मौका मिलेगा कि वे ही सबसे तेज हैं, वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ही आपको आगे रख रहे हैं। अब तीसरा और सबसे बड़ा कारण- टीआरपी में घपलेबाजी के कारण बार्क टीवी चैनलों के निशाने पर नहीं है। वो निशाने पर है बड़ी-बड़ी कंपनियों के। उनको लगता है कि विज्ञापन पर जो भारी-भरकम रकम उन्होंने खर्च की है उसमें धोखाधड़ी की गयी है।

एक बात ध्यान से समझ लीजिए- टीआरपी नापने वाला जो बार्क है, वो चैनलों के फायदे के लिए टीआरपी नहीं नापता है; दर्शकों की समझदारी लिए भी टीआरपी नहीं नापता है; खबरों की गुणवत्ता के लिए भी टीआरपी नहीं नापता है। वो टीआरपी नापता है सिर्फ और सिर्फ उन कंपनियों के मुनाफे के लिए जो विज्ञापनों पर करोड़ों रुपया खर्च करती हैं।

क्रोनोलॉजी को समझिए। बार्क विज्ञापन देने वालों के लिए टीआरपी नापता है। टीआरपी के हिसाब से विज्ञापन का रेट तय होता है। मोटा रेट मतलब मोटी कमाई। मोटी कमाई के लिए चाहिए वो खबर जिस पर जनता टूट पड़े और टीआरपी छप्परफाड़ आये। इसीलिए बिना ड्राइवर की कार चलायी जाती है। इसीलिए हवा में गाय उड़ायी जाती है। इसीलिए हिंदू-मुस्लिम किया जाता है। इसीलिए तबलीग और जमात किया जाता है। ये पूरा का पूरा खेल फिक्स है, जिसको नूराकुश्ती कहते हैं।

अब जरा इस खेल की बड़ी तस्वीर को देखिए: टीआरपी की चोरी के पीछे विज्ञापन और कमाई का खेल दूसरे नंबर का मामला है। पहले नंबर पर ये नैरेटिव सेट करने यानी विमर्श तय करने का मामला है। रिपब्लिक ने आठ हफ्ते तक नंबर एक की गद्दी हथियाकर यह संदेश दे दिया है कि जनता यही देखना चाहती है- हंगामा, तमाशा, हुल्लड़बाजी, झूठ, फरेब, चीखना, चिल्लाना। पहले हफ्ते में आजतक, एबीपी, ज़ी, टीवी18, सबको लग रहा था कि ये तुक्का है। दूसरे हफ्ते में भी वे इसी मुग़ालते में जीने की कोशिश करते रहे, लेकिन तीसरे हफ्ते से उनके सर्वश्रेष्ठ, सबसे तेज़, सबसे आगे जैसे सारे हथकंडों का कचूमर निकल चुका था। ‘सोच बदलो देश बदलो’ और ‘आओ देश बदलें’ का नारा उछालने वाले खुद बदल चुके थे। हर चैनल के भीतर अर्णब गोस्वामी की खोज तेज़ हो चुकी थी और एक से एक चमकते हुए चेहरे अर्णब के फूहड़ नकलची में तब्दील होते जा रहे थे। यही असल मकसद था- टीवी पत्रकारिता के पूरे नैरेटिव को बदल देना। और वो बदल चुका है। टीआरपी तो इसका रास्ता था, मंजिल नहीं।

खेल टीआरपी नहीं है साहब। खेल है हिंदुत्व। ये पत्रकारिता और तमाशे की लड़ाई नहीं है। ये लड़ाई है छोटे तमाशे और बड़े तमाशे की। लड़ाई है पत्रकारिता की गली में गुंडागर्दी के वजूद की। किसी भ्रम में मत रहिए कि ये टीवी में पत्रकारिता की वापसी की यह शुरुआत है। बार्क के इंडिया बोर्ड का चेयरमैन कौन है? उनका नाम है पुनीत गोयनका। पुनीत गोयनका ज़ी न्यूज के संस्थापक और एस्सेल समूह के मालिक सुभाष चंद्रा के सुपुत्र हैं। सुभाष चंद्रा को बीजेपी ने राज्यसभा का सांसद बनाया है। खबरों का डीएनए जांचने वाले सुधीर चौधरी, पुनीत गोयनका के चाचा-पापा-ताऊ के मुलाजिम हैं। कुछ समझ पा रहे हैं?

इतने समय से हिंदुत्व का झंडा लेकर घूम रहे सुधीर चौधरी का तंबू अर्णब ने एक झटके में उखाड़कर फेंक दिया है। रजत शर्मा अदालत लगाते रह गये और अरुण पुरी सफाईगीरी दिखाते रह गये। अर्णब गोस्वामी ने छह महीने के भीतर सबको धूल में मिला दिया। इसलिए मामला अर्णब बनाम ऑल हो गया है। वर्ना कर तो सब छह बरस से वही कर रहे थे जो अर्णब छह महीने से कर रहे हैं।

बार्क के चेयरमैन पुनीत गोयनका के बयान के निहितार्थ को समझने की कोशिश कीजिए। तीन महीने तक टीआरपी की बंदोबस्ती खत्म करने पीछे उनकी बचकानी दलील सुनिए- उन्होंने कहा कि “मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए ये फैसला लेना बेहद जरूरी हो गया था। बोर्ड का मानना है कि बार्क को अपने पहले से ही कड़े प्रोटोकॉल की समीक्षा करनी चाहिए और इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए कि फर्जी टीआरपी जैसी घटनाएं फिर सामने न आएं।”

मतलब बार्क  इंडिया ने मान लिया है कि टीआरपी में फर्जीवाड़ा हुआ है। वो नहीं बताते कि फर्जीवाड़ा हुआ है या होता रहता है। बार्क के सीईओ सुनील लुल्ला कहते हैं कि हम ऐसे और विकल्प तलाश रहे हैं, जिससे इस तरह की गैर-कानूनी गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगायी जा सके।

पिता और पुत्र: सुभाष चंद्रा और उनके दो पुत्र अमित और बार्क वाले पुनीत

अब सुनिए असली खेल। टीआरपी में फर्जीवाड़ा नहीं है। पूरा टीआरपी ही अपने आप में फर्जीवाड़ा है। आप हैरान रह जाएंगे, लेकिन जितना छोटे-मोटे चैनल को चलाने का पूरा खर्च है उससे ज्यादा रुपया बड़े चैनल वाले केवल डिस्ट्रिब्यूशन पर फूंक देते हैं। यह रकम महीने में करोड़ों होती है। यह रकम इसलिए खर्च की जाती है ताकि वो अपने चैनल को प्राइम बैंड में दिखा सकें। दो बड़े चैनलों के बीच रख सकें। रिपब्लिक ने तो अपने चैनल को लैंडिंग पर डाल दिया था। मतलब जैसे ही आप अपना टीवी सेट चलाएंगे आपको वही चैनल चलता हुआ मिलेगा। और अगर आप रिमोट नहीं दबाते तो वही चलता रहेगा। इस पर बहुत मोटी रकम खर्च करनी होती है और ये सब कानूनी तौर पर होता है। इस खेल को खेलने वाले खिलाड़ी बहुत बड़े-बड़े उद्योगपति हैं, कंपनियां हैं, मीडिया हाउस के मालिक हैं।

इसलिए रिपब्लिक को आईना दिखाने वालों को कहिए कि पहले आप अपनी सूरत तो देख लीजिए। तब तो आप रुपया फेंककर टीआरपी-टीआरपी खेल रहे थे, कह रहे थे कि दाग अच्छे हैं। आज अर्णब ने आपको आपके खेल में पीट दिया तो धर्मराज युधिष्ठिर बन गये? ये तो अच्छा नहीं है, राजा!



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